स्त्री
2.5/5
पर्दे पर : 31 अगस्त 2018
डायरेक्टर : अमर कौशिक
संगीत : केतन सोढा
कलाकार : राजकुमार राव, अपारशक्ति खुराना, अभिषेक बनर्जी, पंकज त्रिपाठी, श्रद्धा कपूर
शैली : हॉरर कॉमेडी
यूजर रेटिंग :
0/5
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Stree Movie Review: इंटरवल में फिल्म छोड़कर चले जायेंगे तो आपको लगेगा 'स्त्री' बहुत अच्छी फिल्म थी

फर्स्ट हाफ में फिल्म अच्छी लगेगी. दूसरे हाफ में चुड़ैल डराएगी. क्लाइमैक्स में निराशा होगी. सिनेमा से निकलते हुए गुस्सा आएगा.

Avinash Dwivedi | News18Hindi
Updated: August 31, 2018, 1:00 PM IST
Stree Movie Review: इंटरवल में फिल्म छोड़कर चले जायेंगे तो आपको लगेगा 'स्त्री' बहुत अच्छी फिल्म थी
राजकुमार राव की 'स्त्री' 31 अगस्त को रिलीज हुई.
Avinash Dwivedi | News18Hindi
Updated: August 31, 2018, 1:00 PM IST
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मौत के बाद कई सारी अफवाहें पूर्वी उत्तरप्रदेश के क्षेत्रों में फैलीं. इनमें से कुछ अफवाहें थीं कि वे चांद में बैठकर सूत कातती हैं और लोगों के घरों में छत से सीढ़ियों के सहारे उतरती हैं. इसी अफवाह के दौरान कुछ गांवों में ठंड के दिनों में रात में कुछ बूढ़ी महिलाओं को भीड़ की हिंसा का शिकार होना पड़ा था. लेकिन अगर इस मसले पर फिल्म बनानी हो तो क्या निर्देशक दर्शक को बूढ़ी बड़ी इंदिरा गांधी दिखाएगा? नहीं, कभी नहीं. लेकिन स्त्री ऐसा ही करती है. और यह देखकर बेहुदा लगता है.

वैसे फिल्म शुरूआत में ही डिस्क्लेमर भी दे देती है कि फिल्म बेहूदा विषय पर आधारित है. वैसे सही भी है, भारत में अफवाहों की समृद्ध परंपरा रही है. रूढ़ियां हमारी कोशिकाओं में पैठी हुई हैं. ऐसे में सिनेमा में वे क्यों नहीं उभरेंगी? लेकिन यह तरीका गलत है. दिल्ली- 6 का तरीका सही था. कई दर्शकों ने बाद में कहा कि वे इस दौर में ऐसी फिल्म एक्सपेक्ट नहीं कर रहे थे. उन्हें नहीं लगा था कि अभी भी ऐसी 'चुड़ैलें' दिखाई जायेंगीं.

साथ में सारी चीजें होने के बावजूद एक चुड़ैल से आगे नहीं बढ़ी है फिल्म. हाल ही में नेटफ्लिक्स पर भी एक भूतिया सिरीज आई थी 'ग़ूल' उसका जिक्र भी यहां होना चाहिए. क्योंकि ग़ूल की तरह ही स्त्री में भी जबरदस्त एलिगरि यानि रूपकों (व्यंजना) का प्रयोग हुआ है. हालांकि ग़ूल में रूपकों का प्रयोग बेहद घटिया था. स्त्री की कहानी चंदेरी में बेस्ड है. डायलॉग में कई जगह ऐसे शब्द आते हैं जिनके राजनीतिक निहितार्थ हैं और बड़ी ही चतुराई से उन्हें प्रयोग किया गया है. चाहे वे मोर के आंसू हों, घरवापसी, अंध भक्त, इमरजेंसी, आधार लिंक, नया भारत या आजादी. इसके अलावा आज्ञाकारी होना, पढ़ी-लिखी चुड़ैल और लोगों के भगवा गमछे भी अपनी भूमिका निभाते हैं. फिल्म में सारी बातें स्त्री चुड़ैल की एंट्री से पहले तक अच्छी होती हैं. और क्लाइमैक्स ऐसा है कि लगता है कि अच्छा खाना खाते हुए आखिरी निवाले में कंकड़ आ गया हो.

फिल्म में भाषा पर कलाकारों ने जबरदस्त पकड़ दिखाई है. राजकुमार राव एक बार फिर से अपनी अदाकारी से मोहते हैं. अपारशक्ति खुराना भी अच्छा करते हैं. लेकिन जिस किरदार पर आपका ध्यान सबसे ज्यादा जाता है वो है 'जना' यानि अभिषेक बनर्जी. पंकज त्रिपाठी अपने उसी अंदाज के साथ एक नए किरदार में थे और उनका स्क्रीन पर होना ही दर्शकों के लिए खुशी का सबब हो जाता है. हालांकि भाषा पर काम के मामले में उनसे और अपेक्षा की जा सकती थी. एक सीन के लिए विजयराज भी फिल्म में हैं. श्रृद्धा कपूर भी फिल्म में अच्छी एक्टिंग कर रही हैं. वक्त के साथ उनके काम में बहुत सुधार हुआ है.

जिस बात के लिए फिल्म की तारीफ जरूर की जानी चाहिए वह है सागर माली का आर्ट डायरेक्शन. इतने अच्छे से मध्यप्रदेश और चंदेरी को फिल्म में दिखाया गया है कि दर्शकों का दिल बाग-बाग हो जायेगा. साथ ही छोटे ऐतिहासिक शहर कैसे संक्रमण से गुजर रहे हैं यह भी बखूबी दिखाया गया है. फिल्म देखने जायें तो विक्की बने राजकुमार राव के घर पर जरा अच्छे से नज़र डालियेगा.

फिल्म का म्यूजिक ठीक है और बैकड्रॉप स्कोर अच्छा. आपको सही जगह पर फिल्म डराने में कामयाब हो रही है. डायरेक्टर अमर कौशिक और सिनेमैटोग्राफर अमलेंदु चौधरी ने जबरदस्त काम किया है. सिर्फ फिल्म की कहानी और स्क्रिप्ट पर भी थोड़ी मेहनत और कर ली जाती तो एक बेहतरीन फिल्म हो सकती थी. राज निदिमोरू और कृष्णा डीके दो लोगों का नाम स्टोरी और स्क्रीनप्ले के क्रेडिट में है. फिर भी वही फिल्म का सबसे कमजोर पक्ष है. आपको ठीक-ठाक हॉरर कॉमेडी देखनी हो तो आपको स्त्री देख लेनी चाहिये. और अगर आप स्त्री को एक अच्छी फिल्म के रूप में याद भी रखना चाहते हों तो आपको आधी फिल्म के बाद उठकर सिनेमाहॉल से बाहर चले जाना चाहिए.

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डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
2/5
स्क्रिनप्ल :
2/5
डायरेक्शन :
4/5
संगीत :
3.5/5
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