द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर
2.5/5
पर्दे पर : 11-जनवरी-2019
डायरेक्टर : विजय गुट्टे
संगीत : सुदीप रॉय, साधु तिवारी
कलाकार : अनुपम खेर, अक्षय खन्ना, सुज़ैन बर्नर्ट
शैली : पॉलिटिकल बायोपिक
यूजर रेटिंग :
0/5
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MOVIE REVIEW : मेकअप और स्टाइलिंग पर जबर्दस्त काम लेकिन नहीं बांध पाई फिल्म

फिल्म के हीरो अक्षय खन्ना है और भले ही प्रोमो में वो कुछ देर ही दिखे. फिल्म में वो एक सूत्रधार से बहुत ज्यादा हैं.

News18Hindi
Updated: January 11, 2019, 5:19 PM IST
MOVIE REVIEW :  मेकअप और स्टाइलिंग पर जबर्दस्त काम लेकिन नहीं बांध पाई फिल्म
मनमोहन सिंह के किरदार में अनुपम खेर कमाल लगे हैं
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Updated: January 11, 2019, 5:19 PM IST
फिल्म समीक्षक - प्रियंका सिन्हा झा

लगभग सभी लोग इस बात से सहमत हो जाते हैं कि भारतीय सिनेमा में राजनीतिक बायोपिक फिल्मों का जहां तक सवाल है तो सर रिचर्ड एटनबरो ने 'गांधी' फिल्म से उम्मीदों को बहुत ऊंचा कर दिया है. वो महात्मा गांधी को उनकी तरफ से दी गई एक श्रद्धांजलि थी और आज तक कोई भी भारतीय राजनीतिक फिल्म उस स्तर तक नहीं पहुंच पाई.

जब The Accidental Prime Minister का ट्रेलर पहली बार आया था ऐसी उम्मीद जगी थी कि हमारे पास अब उस स्तर की फिल्म हो सकती है. ऐसा लगा था कि ये एक विश्वसनीय राजनीतिक फिल्म होगी जो असल घटनाओं को सिनेमाई पर्दे पर उकेर पाएगी. संजय बारु, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान रहे मीडिया अडवाइज़र के संस्मरण पर आधारित इस फिल्म ने आते ही दर्शकों के ख्यालों और उम्मीदों को पर दे दिए थे.



लेकिन अफसोस, पहली बार फिल्म निर्देशन में उतरे विजय गुट्टे इस पॉलिटिकल ड्रामा को उस कशमकश के साथ दिखाने में सफल नहीं हो पाते और फिल्म प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल के इर्द गिर्द छींटाकशी करते हुए ही नज़र आते हैं. एकसीध में चलती कहानी और साथ साथ क्रमवार तरीके से चलते सूत्रधार के रुप में अक्षय खन्ना भी फिल्म की मदद नहीं करते.

फिल्म में कॉस्ट्यूम, मेकअप और स्टाइलिंग पर जबर्दस्त काम हुआ है लेकिन ये मेहनत सिर्फ तीन किरदारों अक्षय खन्ना (संजय बारु), अनुपम खेर (मनमोहन सिंह) और सुज़ैन बर्नर्ट (सोनिया गांधी) तक ही सीमित है. इन तीन किरदारों के अलावा बाकी किरदार बस यूहीं हैं. फिल्म में आए जयराम रमेश और अहमद पटेल तो कुछ ऐसे दिखते हैं जैसे उन्हें बस विग लगाकर ही सेट पर खड़ा कर दिया गया.

एक बात जो इस फिल्म को खास बनाती वो है इस फिल्म में मनमोहन सिंह के निजी जीवन की झलक दिखना. हमारे समय के सबसे रहस्यमयी और गलत समझे गए प्रधानमंत्री को समझने की कोशिश ये फिल्म करती है.

साल 2004 में जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बतौर प्रधानमंत्री अपनी शपथ ली थी उन्होंने एडिटर गिल्ड ऑफ इंडिया के साथ एक बैठक की थी जिसमें मैं भी मौजूद थी. कई सारे राजनीतिक सवालों के बीच जब मुझे मौका उनसे सवाल पूछने का मौका मिला तो मैंने उनसे 'हॉट सीट' पर बैठने का अनुभव पूछा जिसका जवाब डॉक्टर मनमोहन ने एक मुस्कुराहट के साथ देते हुए कहा था, "कोई पल ऐसा नहीं था जो निराशाजनक रहा हो".
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मनमोहन सिंह के उस सेंस ऑफ ह्यूमर की झलक फिल्म में मिलती है. लेकिन फिल्म इस बात पर अधिक चर्चा करती है कि कैसे उनके हाथ बंधे थे और वो एक सशक्त प्रधानमंत्री नहीं बन पा रहे थे.

फिल्म लगातार यूपीए सरकार के 10 साल के कार्यकाल पर फोकस रखती है लेकिन वो सतह पर ही दिखती है. फिल्म का मुख्य भाग मनमोहन सिंह और संजय बारु के बीच की बातचीत और बारु की उन मामलों की समझ के इर्द गिर्द ही घूमता है.

विजय गुट्टे, मयंक तिवारी, आदित्य सिन्हा और कार्ल डन की फिल्म मनमोहन सिंह की उस पसोपेश को बहुत गहराई से नहीं दिखाती. इस फिल्म में किरदारों के पास बहुत कुछ था, सिनेमा में ये संभव है कि आप अपने किरदारों से वो करवा सकें जो असल ज़िंदगी में मुमकिन नही. आप उनके अंदर के पसोपेश को बाहर लाकर दिखा सकें लेकिन The Accidental Prime Minister इस मामले में पीछे रह जाती है.

हां फिल्म में अनुपम खेर का मेकअप एक कमाल की बात है. उन्होंने अपनी चाल और आवाज़ को जिस तरह से ढाला है वो काबिल ए तारीफ है. मनमोहन सिंह की चाल ढाल में एक कठपुतली का सा आवरण है जो निर्देशक और अनुपम खेर ने बखूबी पेश किया है. हालांकि सोनिया गांधी के किरदार में सुज़ैन बिल्कुल सटीक बैठी हैं पर उनको स्क्रीन पर उतना टाइम नहीं दिया गया.

फिल्म के हीरो अक्षय खन्ना है और भले ही प्रोमो में वो कुछ देर ही दिखे. फिल्म में वो एक सूत्रधार से बहुत ज्यादा हैं. हालंकि फिल्म में बहुत कुछ हो सकता था लेकिन इस फिल्म के लीड की ही तरह फिल्म अपना वादा पूरा नहीं करती.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
3/5
स्क्रिनप्ल :
2.5/5
डायरेक्शन :
3.5/5
संगीत :
2/5
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