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FILM REVIEW: फिल्म 'पिंक' देखी हो तो, 'वकील साब' में कुछ खास नहीं लगेगा

'वकील साब' के किरदार में हैं सुपरस्टार पवन कल्याण.

'वकील साब' के किरदार में हैं सुपरस्टार पवन कल्याण. निजी जिंदगी में सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों पर पवन काफी सक्रिय रहते हैं.

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फिल्म: वकील साब
भाषाः तेलुगू
ड्यूरेशनः 156 मिनट्स
ओटीटीः अमेजन प्राइम वीडियो

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और तापसी पन्नू अभिनीत और अनिरुद्ध रॉय चौधुरी द्वारा निर्देशित 'पिंक' तकरीबन सभी ने देख ली है. सभी को ये फिल्म पसंद भी आयी और इसे कई अवॉर्ड्स भी मिले. स्वाभाविक था कि इस कहानी पर अन्य भाषाओं में भी फिल्म बनाई जाती. तमिल में बनी "नरकोंडा पारवाई" और अब तेलुगू में "वकील साब". पिंक में अमिताभ बच्चन ने एक बुज़ुर्ग वकील का किरदार निभाया था और उनकी आवाज़, भावरहित आंखों और कानूनी दांव पेंचों पर उनकी पकड़ की वजह से फिल्म में न सिर्फ वज़न आया था बल्कि पूरी फिल्म का मूल भाव अमिताभ के ज़रिये समझाया जा सका था. तेलुगू फिल्म 'वकील साब' का मामला यहां थोड़ी मात खा जाता है.

'वकील साब' के किरदार में हैं सुपरस्टार पवन कल्याण. निजी जिंदगी में सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों पर पवन काफी सक्रिय रहते हैं और लोगों की समस्याओं को लेकर वो सरकार को कटघरे में खड़ा करने से नहीं हिचकिचाते. फिल्मस्टार चिरंजीवी के सबसे छोटे भाई पवन कल्याण की अपनी राजनैतिक पार्टी है और उनके फैंस के अलावा बहुत से लोग उन्हें उनकी राजनीतिक विचारधारा के लिए भी फॉलो करते हैं. पवन की खूबी ये है कि वो हमेशा आम आदमी की आवाज़ बनने की कोशिश करते हैं और उन्हीं के लिए लड़ते रहते हैं. उन्होंने अपने भाई चिरंजीवी के साथ राजनीति में कदम रखा लेकिन जब चिरंजीवी ने अपनी पार्टी का विलय कॉंग्रेस में कर दिया तो पवन ने राजनीति से कुछ दिनों की दूरी बना ली. उन्होंने अपनी पार्टी लॉन्च की और भारतीय जनता पार्टी के साथ तेलंगाना के मामले पर काफी काम किया. आपसी मतभेदों के चलते उन्होंने बीजेपी से भी दूरी बना ली और लेफ्ट फ्रंट की पार्टियों के साथ चुनाव लड़ा जहां उनकी पार्टी को करारी शिकस्त मिली. अब वो पुनः बीजेपी के साथ मिल कर 2024 चुनावों की तैयारी कर रहे हैं.

वकील साब में तेलुगु फिल्मों का मसाला मौजूद है और खास कर पावर स्टार पवन कल्याण की छवि का ख़ास ख्याल रखा गया है. पवन और उनकी गर्लफ्रेंड की भूमिका में श्रुति हसन की लव स्टोरी भी है. जनता की आवाज़ उठाने वाले स्टूडेंट लीडर और बाद में वकील बने पवन हमेशा मज़लूमों की लड़ाई लड़ते हैं और उनके विरोधी इसी वजह से उनकी पत्नी श्रुति की हत्या कर देते हैं. पवन शराब का सहारा लेकर अपनी ज़िम्मेदारी भूल जाते हैं. किस्मत से वो एक कॉलोनी में रहने आते हैं जहां एक मकान में रहने वाली तीन लड़कियों के साथ एक संसद सदस्य का बेटा और उसके दोस्त ज़बरदस्ती करते हैं. इन सब में एक लड़की, शराब की बोतल, सांसद पुत्र के सर पर दे मारती है और शुरू होता है पुलिस और लड़कियों की इज़्ज़त को भरे बाजार उछालने वाले किस्सों का सिलसिला. वकील पवन किसी तरह इस केस को लेने के लिए राज़ी होते हैं और फिर कई उतार चढाव के बाद, वो केस जीत कर लड़कियों को इन्साफ दिलाते हैं.

चूंकि पवन की अपनी एक इमेज है, इसलिए उनके साथ एक हीरोइन और कुछ रोमांटिक गाने डाले गए हैं जिस वजह से फिल्म लम्बी हो जाती है. पिंक की खासियत थी की फिल्म का मूड बहुत जल्दी सेट हो जाता है और अमिताभ का इंटेंस कैरेक्टर उस मूड को अंत तक बनाये रखता है, जब वो केस जीत जाते हैं तब भी. वकील साब में ऐसा नहीं नहीं है. पूरी फिल्म में अलग अलग मूड हैं. स्टूडेंट लीडर पवन, कॉलेज की राजनीति करते पवन, श्रुति हसन के प्यार में गिरफ्तार पवन, अचानक वकील बनने का निर्णय लेते पवन, गुंडों की धुलाई करते पवन, शराबी पवन, शराब न मिलने पर गुंडों को पीटने वाले पवन, अचानक एक दिन सब कुछ छोड़ कर फिर से वकालत करने वाले पवन, वकील होते हुए भी जिरह के दौरान कुर्सी का हत्था उखाड़ने वाले पवन और सड़कछाप मवालियों की तरह कोर्ट में जिरह करते पवन. कुल जमा, फिल्म पवन के ऊपर केंद्रित हैं और तकरीबन सभी कुछ पवन के माध्यम से ही कहलवाया गया है. इस बीच में पवन, फिलॉसॉफिकल डायलॉग भी मारते रहते हैं. यह इस फिल्म की ताक़त है और इस फिल्म की कमज़ोरी भी. पूरी फिल्म पवन कल्याण के कन्धों पर हैं जैसा की उनकी हर फिल्म होती है. इस फिल्म में लड़कियों के किरदार, उनके साथ होती ज़बरदस्ती और उन पर पुलिस द्वारा की गयी ना-इंसाफ़ी बहुत ही सतही तरीके से रखी गयी है. पूरी फिल्म में एक बार भी किसी भी प्रताड़ित के प्रति दया या सहानुभूति की भावना नहीं जागती. फिल्म यहां गलती कर जाती है.

पिंक की खासियत थी हर किरदार की अहमियत. तापसी पन्नू का सशक्त किरदार. अमिताभ का शांत, संयत और गुस्से को जज़्ब करता बूढ़े वकील का किरदार. मगर वो पिंक थी. उसमें कहानी का महत्त्व था. वकील साब का नाम ही ये बताने के लिए काफी है कि फिल्म में कहानी दूसरे नंबर पर है, क्योंकि सबसे आगे तो पवन कल्याण हैं. निवेदिता थॉमस एक प्रतिभाशाली अभिनेत्री हैं. शक्तिशाली और परिपक्व अभिनय से वो सबका ध्यान खींच ले जाती हैं. प्रकाश राज और मुकेश ऋषि का किरदार फिल्म में बहुत कम है और इनका इस्तेमाल बेहतर हो सकता था. बाकी कलाकार अपनी अपनी भूमिका में ठीक ही हैं. इस फिल्म में किरदारों की बैकस्टोरी में समय जाया किया गया है जिस वजह से ये कोर्ट रूम ड्रामा के तौर पर नहीं देखी जा सकती. क्लाइमेक्स से पहले पवन कल्याण जिस तरह मेट्रो में गुंडों से लड़कियों की रक्षा करते हैं वो हिंदी फिल्म के दर्शकों को अजीब लगेगा.

लेखक निर्देशक वेणु श्रीराम ने पिंक की कहानी पर सही मायनों में तेलुगु ऑडियंस को पसंद आने वाली फिल्म बनाई है. डायलॉग भी उसी तर्ज़ पर हैं और पवन कल्याण की लार्जर दैन लाइफ इमेज को भुनाने का पूरा पूरा मसाला रखा है. दर्शकों को बहुत मज़ा आया होगा. अनिरुद्ध रॉय चौधुरी, शूजित सरकार और रितेश शाह ने 'पिंक" लिखने में जो मेहनत की, उसके एक एक सीन और एक एक डायलॉग पर काम किया, वेणु ने उसका तेलुगुकरण करने में ज़रा भी संकोच नहीं किया. पवन की फैन फॉलोइंग देखते हुए किसी तरह की कोई रिस्क लेना ठीक भी नहीं होता.

पहली बार पवन कल्याण की किसी फिल्म में एस थमन को संगीतकार के तौर पर काम करने का मौक़ा मिला है और उन्होंने इस मौके को पूरी तरह से बनाया है. फिल्म में 4 गाने हैं. गाने फिल्म रिलीज़ होने के पहले ही यूट्यूब पर धूम मचा चुके थे. फिल्म में गाने बड़े अच्छे से कहानी में पिरोये गए हैं और पवन कल्याण की हीरो वाली इमेज को चार चांद लगाते हैं.सिनेमेटोग्राफी और एडिटिंग ठीक हैं, कोई कमाल नहीं करते.

फिल्म की कहानी पर पवन कल्याण बहुत भारी पड़ते हैं. मूल कहानी से भटकने के बाद जैसे तैसे कोर्ट में जिरह शुरू होती है तो वहां भी पवन अपनी रोलेक्स घडी घुमाते हैं या कुर्सी का हैंडल उखाड़ देते हैं. स्टार, कहानी पर भारी पड़ा है और इसलिए पिंक जैसा इम्पैक्ट नहीं पैदा हुआ. मसाला फिल्म की तरह देख कर इस फिल्म का आनंद लेना चाहिए. और विषय के गाम्भीर्य को समझने के लिए और कहानी के साथ निर्देशक कैसे न्याय करता है ये देखने के लिए आप "पिंक" दोबारा देख सकते हैं. वकील साब कभी भी पिंक नहीं बनने वाले थे और न ही बन सकते थे.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी:
/5
स्क्रिनप्ल:
/5
डायरेक्शन:
/5
संगीत:
/5