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फिल्म समीक्षा: पैसा वसूल है फिल्म ‘डी-डे’

राजीव मसंद
Updated: July 20, 2013, 8:17 AM IST

'डी डे' ये एक अच्छी थ्रिलर फिल्म है जो 1993 ब्लास्ट के दोषी दाउद को पकड़ने की मुहिम पर है। दाउद का किरदार फिल्म में इकबाल शेख के नाम से चर्चित है।

  • Last Updated: July 20, 2013, 8:17 AM IST
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मुंबई। ‘डी डे’ दाउद जिसकी आखिरी पब्लिक तस्वीर 20 साल पहले की है वो आज भी एक दिलचस्प किरदार बना हुआ है। खासकर फिल्ममेकर्स के लिए जिनके पास इस मोस्टवांटेड टेररिस्ट को लेकर स्क्रिप्ट की कोई कमी नहीं है। इनमें लेटेस्ट निखिल आडवाणी की डी डे। ये एक अच्छी थ्रिलर फिल्म है जो 1993 ब्लास्ट के दोषी दाउद को पकड़ने की मुहिम पर है। दाउद का किरदार फिल्म में इकबाल शेख के नाम से चर्चित है। हम सबसे पहले उनको देखते हैं गोल्डमेन जिसके किरदार में है बड़ी मुछों और गुलाबी रंग के चश्मे पहने ऋषि कपूर। हम सबसे पहले उनको देखते हैं फिल्म के शानदार ओपनिंग सीक्वेंस में जहां वो कराची के होटल में हो रही शादी में आता है, और कड़ी सुरक्षा के बावजूद उसे पकड़ने का प्लान जारी है।

फिल्म का क्रिस्पी फर्स्ट हाफ खुलता है फ्लैश बैक में जो इस ड्रामा को बहुत ही अच्छे से सेट करता है, इंडिया की रिसर्च और एनालिसिस विंग यानी रॉ के अध्यक्ष ऑपरेशन गोल्डमन शुरू करते है। इंडिया में हुए एक और ब्लास्ट के बाद जिसे अंजाम देने वाले मास्टरमाइंड टेररिस्ट पाकिस्तान में छुपा हुआ है। अंडरकवर एजेंट्स की टीम इकबाल को ढूढ़ने निकली है जो अपने बेटे की शादी में जाने के लिए तैयार हो रहा है।

इस अंडरकवर एजेंट्स की टीम में शामिल हैं वाली यानी इरफ़ान खान, रूद्र यानी अर्जुन रामपाल, जोया यानी हुमा कुरेशी और असलम यानी आकाश दहिया ।फैक्ट्स और फिक्शन के साथ खेलती हुई ये फिल्म थ्रिल्स के लिए लॉजिक को भुला देती है, तेज़ गति से आगे बढ़ रही स्क्रिप्ट कहीं पर धीमी पड़ जाती है वो एजेंट्स को अपनी फैमिली और अपने लवर्स के साथ टाइम बिताती हुए दिखाते हैं। रूद्र की मुलाकात होती है रेड लाइट डिस्ट्रीक्ट की एक खुबसूरत लड़की से इस किरदार में श्रुति हासन पूरी तरह से कमिटेड हैं। डी डे अपने कड़क एक्शन, हैंड हेल्ड कैमरा वर्क और शार्प एडिटिंग के बावजूद ‘एक था टाइगर’, और ‘एजेंट विनोद’ की टोन को ज्यादा मैच करती है बजाय ‘जीरो डार्क थर्टी’ के फिल्म ट्रैप्स से बच नहीं पाती और रियल तिलिस्म से ज्यादा फ़िल्मी हेरोइस्म दिखाने से नहीं हटती। इसकी कमियों के बावजूद फिल्म का सेकंड हाफ थोड़ा दिलचस्प है, जिसमें शामिल हैं। यहां फिल्म के डायरेक्टर इस इम्पोर्टेंट पॉइंट को भी छूते है की कैसे सरकार अक्सर अपने सीक्रेट एजेंट्स को लेकर अपने हाथ खड़े कर देती है, जब मिशन फ़ेल हो जाता है।

ये कुछ ऐसे मोमेंट्स हैं जो फिल्म को थोड़ा हट कर बनाती है। फिल्म का काफी क्रेडिट जाता है इसकी कमिटेड कास्ट को भी। परिवार और मिशन के बीच फंसने वाली की जतोजहद को इरफ़ान खान बहुत ही खूबी से दर्शाते हैं।और बागी और हमेशा गुस्से से भरे अर्जुन रामपाल अपना सबसे बेहतरीन परफॉरमेंस देते हैं। टैलेंटेड हुमा कुरैशी को यहां पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं किया गया है। पर वो अपना हिस्सा बहुत ही अच्छे से निभाती हैं। और यहां पर मैं नाम लेना चाहूंगा चंदन रॉय संयल का भी जो इकबाल के सनकी भांजे और राईट हैंड मैन के किरदार में बेहतरीन है। और गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले ऋषि कपूर की जितनी तारीफ की जाए कम है, जो फिल्म की दो अलग-अलग टोंस में खुद को बहुत बेहतरीन तरीके से एडाप्ट करते है। डी डे एक परफेक्ट फिल्म से बहुत दूर है, पर एक बॉलीवुड एक्शन थ्रिलर के तौर पर ये पैसा वसूल है, मैं इसे पांच में से तीन स्टार देता हूं। ये देखने लायक है।

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First published: July 20, 2013, 8:17 AM IST
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