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इटली के उस गांव में एक पोस्टमैन रहता था

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: November 7, 2019, 12:45 PM IST
इटली के उस गांव में एक पोस्टमैन रहता था
द पोस्टमैन 1994, इटालियन फिल्म

इस फिल्म को देखने की कई वजहें हैं. याद रखने की एक भी नहीं, क्योंकि इसे याद रखने के लिए कोई कोशिश नहीं करनी होगी. ये खुद ही स्मृतियों में अपनी जगह बना लेगी. इतनी गहरी कि सिर्फ डिमेंशिया ही उस स्मृति को स्मृति से मिटा सकता है.

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  • Last Updated: November 7, 2019, 12:45 PM IST
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द पोस्टमैन 1994, इटालियन फिल्म 

इस फिल्म को देखने की कई वजहें हैं. याद रखने की एक भी नहीं, क्योंकि इसे याद रखने के लिए कोई कोशिश नहीं करनी होगी. ये खुद ही स्मृतियों में अपनी जगह बना लेगी. इतनी गहरी कि सिर्फ डिमेंशिया ही उस स्मृति को स्मृति से मिटा सकता है.

ये लिखे जाने का मकसद फिल्म की कहानी सुनाना नहीं है. फिल्म समीक्षाओं की नई भाषा में जिसे हम स्पॉइलर कहते हैं. इसका मकसद सिर्फ ये बताना है कि इसे देखा जाना क्यों जरूरी है.

1950 का दशक है. समंदर किनारे बसे इटली के एक छोटे से गांव में मारियो नाम का एक मामूली आदमी रहता है, जिसने अपने गांव के बाहर कोई दुनिया नहीं देखी. एक बार उस गांव में पाब्लो नेरूदा आते हैं. राजनीतिक वजहों से चिली से निष्कासित होकर उस गांव में रहने आए हैं. मारियो वो पोस्टमैन है, जो रोज अपनी साइकिल से नेरूदा को चिट्ठियां पहुंचाने जाता है. मारियो को नहीं पता कि कवि होना क्या होता है, कविता क्या होती है. वो बस ये देखकर हैरान है कि इस आदमी के नाम आई चिट्ठियों में से ज्यादातर पर स्त्रियों के नाम हैं. उसे लगता है कि कवि कोई ऐसी चीज होती है, जिसे स्त्रियां पसंद करती हैं. मारियो भी चाहता है कि ज्यादा नहीं तो कोई एक स्त्री तो उसे पसंद करे, लेकिन उसने आज तक किसी स्त्री से हाथ भी नहीं मिलाया है.

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मारियो नेरूदा की कविताएं ढूंढकर पढ़ता है और पढ़कर उसे लगता है कि ये तो उसके ही बारे में है. उसकी जिंदगी की विद्रूपताओं के बारे में, उसकी बेचारगी, उसकी गरीबी, उसकी थकान के बारे में. रोज चिट्ठियां पहुंचाते हुए नेरूदा से उसकी दोस्ती हो जाती है. वो कविता समझना शुरू करता है और कविता उसकी जिंदगी को बदलना.

द पोस्टमैन 1994, इटालियन फिल्म
द पोस्टमैन 1994, इटालियन फिल्म

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दरअसल ये कहानी एक मामूली इंसान के कविताओं को पाने और उसके जरिए खुद को पाने की कहानी है. प्रेम को पाने, प्रेम को कह सकने, प्रकृति को महसूस करने, जीवन को ढूंढने और पा लेने की कहानी.
फिल्म का प्रमुख किरदार पाब्लो नेरूदा सचमुच में थे, लेकिन सचमुच में ऐसा कभी हुआ नहीं कि नेरूदा इटली के उस गांव में रहने गए, जहां वो पोस्टमैन रहता था. कहानी पूरी तरह फिक्शन है, लेकिन उतनी ही सच्ची लगती है कि जितना इस वक्त इसे पढ़ने के बाद आपका उस फिल्म के नाम को गूगल करना. उतनी सच्ची, जितनी वो सारी आवाजें थीं, जो नेरूदा के जाने के बाद मारियो ने रिकॉर्ड करके उन्हें भेजी थीं. कंपकंपाती रात में हवा के चलने की, समंदर की लहरों की, रात के सन्नाटे की, मारियो की पत्नी के पेट में सो रहे बच्चे के धड़कते दिल की. कभी नेरूदा ने उससे पूछा था कि तुम्हारे इस गांव में तुम्हें सबसे सुंदर चीज क्या लगती है. उस वक्त वो जवाब नहीं दे पाया. बाद में ये रिकॉर्डिंग भेजी. उसके गांव की सबसे सुंदर आवाजों की. और अंत में उसकी लिखी एक कविता.

इस फिल्म को देखने के बाद कविता से आपका रिश्ता कैसा होगा, पता नहीं, लेकिन जिंदगी से थोड़ा बेहतर हो जाएगा. थोड़ा ज्यादा विनम्र, ज्यादा कृतज्ञ, ज्यादा आदर और करुणा से भरा.

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First published: November 7, 2019, 12:26 PM IST
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