'मुझे लगता है कि बातें दिल की, होती लफ्जों की धोखेबाजी'

“जब वी मेट” कोई क्लासिक फिल्म नहीं थी, न बॉलीवुड का बेस्ट सिनेमा. लेकिन उस फिल्म और उसके बाद इम्तियाज अली की तमाम फिल्मों ने उस शख्स के प्रति एक विनम्र कृतज्ञता और स्नेह से भर दिया था.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: August 8, 2019, 1:16 PM IST
'मुझे लगता है कि बातें दिल की, होती लफ्जों की धोखेबाजी'
प्रेम के इतने रंग और कहां, जितने इम्तियाज अली के पास हैं
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: August 8, 2019, 1:16 PM IST
इम्तियाज अली को इस वक्त याद करने की कोई खास वजह नहीं है. सिवा इसके कि उन्होंने मुंबई के एक अनजान ऑटो ड्राइवर के बारे में एक पोस्ट लिखी है और वो ट्रेंड भी कर रही है. सियासी उठापटक की तमाम तीखी खबरों के बीच ये खबर बारिश के बाद उठी मिट्टी की सोंधी खुशबू की तरह है. और मेरे लिए ये लिखना ऐसा जैसे चार घंटे कुंभ मेले की धूल-धक्कड़ में भटकने के बाद गंगा नदी में पांव डालकर बैठना.

साल 2007, शहर इंदौर. ज्योति सिनेमा टाकीज में एक नई फिल्म लगी थी. पीजी की किचकिच में लौटने का मन नहीं था तो मैं दफ्तर से सिनेमा देखने चली गई. फिल्मों को लेकर कुछ समझ, कुछ रूझान तब तक बन चुका था. लेकिन उम्र, शहर, तकाजा सबकुछ ऐसा था कि गोविंदा की कोई पिक्चर लगी होती तो भी मैं बिना मुंह बिचकाए देख लेती.

लेकिन मैंने जो देखा, वो मुझे अच्छा नहीं, बहुत अच्छा लगा. “आओगे जब तुम ओ साजना, अंगना फूल खिलेंगे” पर मैं इतना क्यों रोई, ये मुझे तब समझ नहीं आया. न इस बात ने उसी क्षण में अपना अर्थ खोला कि “ना है ये पाना, ना खोना ही है, तेरा ना होना जाने, क्यों होना ही है,” का क्या अर्थ था.

“जब वी मेट” कोई क्लासिक फिल्म नहीं थी, न बॉलीवुड का बेस्ट सिनेमा. लेकिन उस फिल्म और उसके बाद इम्तियाज अली की तमाम फिल्मों ने उस शख्स के प्रति एक विनम्र कृतज्ञता और स्नेह से भर दिया था. अनुराग कश्यप, दिबाकर वगैरह भी उस वक्त काफी अच्छा काम कर रहे थे. हिंदी सिनेमा के इतिहास में शायद ‘बैंडिट क्वीन’ के बाद अनुराग की ‘ब्लैक फ्राइडे’ दूसरी ऐसी फिल्म थी, जिसे देखना तलवार की धार पर चलना था. लेकिन इन लोगों की फिल्में मन के एक ही कमरे में एक साथ बैठकर बतकही नहीं कर सकती थीं. इन्होंने दिल और दिमाग में अपना अलग कोना बनाया था. अनुराग-दिबाकर की फिल्मों का बौद्धिक और सिनेमाई विश्लेषण आसान था. उन पर बात की जा सकती थी और लेख लिखे जा सकते थे, लेकिन वो जो एक कोना था, बिल्कुल अकेला. जहां कोई नहीं था, न दोस्त-यार, न बुद्धिजीवी-कलाकार, न एक्टिविस्ट, न बौद्धिक महफिल, वहां बार- बार “आओगे जब तुम ओ साजना, अंगना फूल खिलेंगे” होता और कभी ये समझ नहीं आता कि जो गीत मिलन की, सुख की बात कर रहा है, उस पर इस कदर रोना क्यों आता है. हम प्रेम में जितने बेबस और अकेले होते हैं, उतने ही अकेले होते उनकी फिल्मों के साथ.

कुछ डूबकर ये राज समझ आया कि रोना जिस बात पर आता था, वो बात वो नहीं थी कि इरशाद कामिल ने जैसे उसे लिखा था, वो बात ये थी कि इम्तियाज अली ने जैसे उसे दिखाया था. प्रेम और विरह के गीत पहले कैसे फिल्माए जाते थे? “रुला के गया सपना मेरा” में वैजन्ती माला अकेली रो ही रही होती थी. प्रेमिका विरह का गीत तभी गाती, जब वो विरह में होती. “मुझे छू रही हैं तेरी नर्म सांसें” में सांसें छूती महसूस नहीं होतीं, पर्दे पर छूती दिखाई देती थीं. हम वही देख रहे होते थे, जो सुन रहे होते. कोई अंतर्विरोध नहीं था.

आओगे जब तुम ओ साजना अंगना फूल खिलेंगे (अमेरिकन चित्रकार माया एन. की पेंटिंग 'लोनली वुमन')
आओगे जब तुम ओ साजना अंगना फूल खिलेंगे (अमेरिकन चित्रकार माया एन. की पेंटिंग 'लोनली वुमन')


लेकिन इम्तियाज ने सब उलट-पलटकर रख दिया. बताया कुछ, दिखाया कुछ, सुनाया कुछ, जताया कुछ. विरह और पीड़ा के सबसे गहरे क्षणों के लिए इम्तियाज ने जो गीत चुना था, वो प्यार और मिलन का गीत था. जब लड़का लड़की को दरवाजे से दुत्कार देता है तो राशिद अली खान सबसे ऊंची तान लेते हैं और गाते हैं, “आओगे जब तुम ओ साजना, अंगना फूल खिलेंगे.” जब वो अपने सामान के साथ ठुकराई हुई अकेली होती है तो कहते हैं, “बरसेगा सावन झूम-झूम के, दो दिल ऐसे मिलेंगे.”
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जो मन में था और जो जीवन में था, वो एक नहीं था. जो सच हमें लगता है और जो होता है, वो एक नहीं है. जो सुख दिखता है, दुख है, जो दुख दिखता है, सुख है. जो रात है, वो उजाला और जो उजाला है, वो रात. जो है, वो नहीं है और जो नहीं है, वही है. इस पहेली को कोई इतनी सरलता से पर्दे पर ऐसे उतार दे कि कत्ल भी हो जाए और खंजर पर दाग भी न लगे. ये करामात इम्तियाज ही कर सकते थे. उन्होंने कर दी और हमने उन्हें अपने एकांत का साथी चुन लिया. अनुराग के बारे में हम महफिलों में बात करते, इम्तियाज के बारे में अपने आपसे.

अपने आप से की गई ये बातें कुछ तीन साल बाद सचमुच में हुई बातें हुईं. अखबार के लिए मुश्किल से 600 शब्दों का एक इंटरव्यू चाहिए था. हम 6000 शब्दों पर भी नहीं रुके. उनके पेशे की मजबूरी है मीडिया से बनाकर रखना. वो इसी औपचारिकता को निभाने की कोशिश कर रहे थे, जब शुरुआती सवालों के जवाब दो-चार लाइनों में देकर खत्म करने की कोशिश की. ये इतना जाहिर था कि इम्तियाज को बिल्कुल मन नहीं था अपनी या अपनी फिल्म की तारीफ सुनने का. वो एकदम नहीं जानना चाहते थे कि मैं या कोई एक्स वाई जेड उनका कितना बड़ा फैन है. फिल्मी इंटरव्यूज का एक विशद मूर्खतापूर्ण संसार था, जिसमें कुछ देर टिककर मुस्कुराते हुए बैठे रहना उनकी मजबूरी थी. नई फिल्म जो रिलीज हुई थी. लेकिन उसमें मन नहीं था उनका. वो अचानक एक झटके से उसमें से बाहर तब निकले, जब मैंने “जब वी मेट” के उस गाने और उसके अंतर्विरोध का जिक्र किया. जैसे कोई नींद से जागा हो. अब उन्हें बात करने में कुछ रुचि आई.

प्रेम अंत में हमारा कल्पनालोक ही है
प्रेम अंत में हमारा कल्पनालोक ही है


इम्तियाज पहले तो बोले कि ये इत्तेफाकन ही था कि वो दृश्य ऐसे फिल्माया गया. लेकिन सच तो ये है कि इत्तेफाकन सड़क पर किसी से मुलाकात हो सकती है, इत्तेफाकन कविता नहीं लिख जाती. कविता का इत्तेफाक भी आत्मा के अनेकों गूढ़ समीकरणों में छिपा होता है. जो कभी सतह पर आ गया, वो भीतर ही कहीं छिपा बैठा होगा. बहुत कुरेदने पर जो वो अपने भीतर उतरने लगे तो इस होने और न होने के दर्शन पर भी बात की. उन्होंने कहा कि प्रेम अंत में हमारा कल्पनालोक ही है. एक ऐसा देश, जो हमने अपने भीतर बसाया. जो भीतर है, वो बाहर नहीं है. भीतर जो प्रेम था, वो बाहर ठुकरा दिया गया है. प्रेम में हमें लगता है कि हमें ठीक वैसे ही समझ लिया जाएगा कि जैसे हम हैं. लेकिन ये होता नहीं.

“जब वी मेट” प्यार का एक पहलू था और “लव आजकल” दूसरा. इंटरव्यू का मजमून तो वही फिल्म थी, जो प्रेम की शाश्वतता की बात करती थी. अपनी तमाम फिल्मी सीमाओं के बावजूद उन्होंने एक बड़ा नरेटिव तो रचा था. इम्तियाज ने कोई दार्शनिक जवाब भी अंतिम जवाब की तरह नहीं दिया. अंत में यही कहते, “आय डोंट नो.” वो ढूंढ ही रहे थे. अब भी ढूंढ रहे हैं. हर नई फिल्म में एक नए कोण से, एक नई दिशा, एक नया अर्थ, प्यार का एक नया नरेटिव.

लेकिन इतने सालों में एक चीज जो नहीं बदली, वो ये कि वो अब भी एकांत के साथी हैं. बेला तार की “ट्यूरिन हॉर्स” के बाद आप “तमाशा” भी दोबारा अकेले देखना चाहते हैं और अकेले में रोना. और किसकी फिल्मों का गीत मुहब्बत को ऐसे डीकोड करता है भला-
“मुझे लगता है कि बातें दिल की, होती लफ्जों की धोखेबाजी”

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First published: August 8, 2019, 11:03 AM IST
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