शेखर कपूर की 'ब्राइड्स' जो कुएं के सूखने की प्रार्थना करती हैं

शेखर कपूर की 'ब्राइड्स' जो कुएं के सूखने की प्रार्थना करती हैं
(तस्वीर : wateraid@youtube.com)

अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर शेखर कपूर की एनिमेशन फिल्म 'Brides of the Well' दिखाती है जल संकट और लड़कियों के जीवन के संबंध को. अगर जल संकट से हम नहीं उभरे तो लड़कियों का जीवन और संकट में पड़ सकता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 11, 2018, 3:06 PM IST
  • Share this:
सरस्वती और पारस, भारत के सुदूर गांव में रहने वाली दो सहेलियां - दोनों उम्रदराज़ पुरुषों से ब्याही गई हैं. इन्हें शादी के दिन पता चलता है कि इनकी किस्मत कहां बांध दी गई है. दरअसल बड़ी उम्र के पति से शादी की कहानी सिर्फ इनकी नहीं, उस गांव में ब्याही गई हर लड़की की है. गांव में जल संकट बहुत तीव्र है और पुजारी यह कहकर परिवार को मनाते हैं कि लड़की की इस गांव में शादी हो जाएगी तो सबका उद्धार निश्चित है. वो तो ब्याह के बाद पता चलता है कि यह जीवन तो किसी नर्क से कम नहीं. अब इन किशोरियों की बाकी की ज़िंदगी अपने पतियों के लिए 8-8 घंटे पैदल चलकर कुएं से पानी लाने में ही बीतती है. इन आठ घंटों में ही यह किशोरियां अपने जीवन के दुख और दर्द बांट लेती हैं, थोड़ा हंस लेती हैं, थोड़ा बोल लेती हैं.

यह कहानी काल्पनिक है लेकिन सच्चाई के काफी करीब. फिल्मकार शेखर कपूर ने एनिमेशन फिल्म 'Brides of the Well' तैयार की है जिसे उन्होंने 'अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस' के मौके पर वॉटर एड संस्था के साथ मिलकर बनाया है. इस फिल्म के ज़रिए शेखर बताना चाहते हैं कि किस तरह पानी का संकट हमारी ज़िंदगियों पर गहरा असर छोड़ता जा रहा है. घर के पास साफ पानी के न होने से महिलाओं और लड़कियों की जिंदगी पर बुरी तरह असर पड़ता है जिनमें से कई तो लंबी दूरी और प्रदूषित स्रोत से पानी लाने के बोझ तले दबती चली जाती हैं. नतीजा यह होता है कि अक्सर लड़कियों को कम उम्र में ही स्कूल को अलविदा कहना पड़ता है. वह शिक्षा के अवसरों को गंवा देती हैं, और कुछ मामलों में तो जल्दी शादी करने के लिए भी मजबूर कर दी जाती हैं.

brides of the well
(तस्वीर : wateraid@youtube.com)




फिल्म में सरस्वती और पारस मन ही मन आज़ादी की कामना करती हैं. वह दिखाती तो हैं कि वह एक आदर्श पत्नी हैं और पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं लेकिन असल में वह जल देवता से प्रार्थना करती हैं कि कुआं जल्दी से जल्दी सूख जाए और उन्हें इस मुश्किल जीवन से मुक्ति मिले, उम्र के आखिरी पड़ाव पर बैठे अपने पतियों से आज़ादी मिले. भगवान मानो उनकी प्रार्थना सुन भी रहा है. कुआं सच में सूख रहा है. भारत में सरस्वती और पारस उन 16.3 करोड़ लोगों का ही प्रतिनिधित्व करती हैं - जिनमें 8.10 करोड़ महिलाएं हैं – जिनके घर के पास साफ पानी उपलब्ध नहीं है.
सरकारी आंकड़ें बताते हैं कि देश में पानी की प्रस्तावित मांग 2030 तक उपलब्ध पानी की आपूर्ति के मुकाबले दोगुना होने वाली है. और यह हाल सिर्फ भारत का नहीं है. जनवरी में केप टाउन की सरकार ‘डे ज़ीरो’ के दस्तक देने की चेतावनी दे चुकी है, यहां लगातार तीन साल तक सूखे की वजह से शहर के नलों को बंद रखना पड़ सकता है. वहीं चीन में हुए पहले जल राष्ट्र गणना में बताया गया कि पिछले 25 सालों में नदी किनारों के 28 हज़ार जल स्रोत गायब हो गए हैं. जबकि भूमिगत जल स्तर भी हर वर्ष एक से तीन मीटर घटता जा रहा है. ऐसे में सरस्वती और पारस की कहानी शायद धीरे धीरे दुनिया भर के उन देशों की बेटियों की कहानी हो जाए जहां पानी की कमी अपना विकराल रूप दिखाने वाली है.



पारस और सरस्वती की यह छोटी सी कहानी जल संकट के भीषण रूप की तरफ इशारा करती है. वह रूप जिसके पास आने से पहले अगर हमने कुछ नहीं किया तो कोसों दूर चलकर कुएं तक जाने के लिए मजबूर यह दुल्हनें और उनके जैसे कई लोग अपनी आज़ादी के लिए ऐसी ही सिरहन पहुंचा देने वाली प्रार्थनाएं करेंगे.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज

corona virus btn
corona virus btn
Loading