स्वरा भास्कर पर गुस्सा तो ठीक, पर मास्टरबेशन कौन नहीं करता?

स्वरा भास्कर
स्वरा भास्कर

वीरे दी वेडिंग फिल्म से किसी 'एक्टिविज़म' की आस लगाए दर्शकों को मायूसी हासिल हो रही है. लेकिन आप क्यों भूल रहे हैं कि ये एक बॉलीवुड कमर्शियल फिल्म है, इसमें सेक्स और ग्लैमर नहीं परोसा जाएगा तो कहां परोसा जाएगा?

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'वीरे दी वेडिंग' को लेकर इस समय सोशल मीडिया और इंटरनेट पर बवाल मचा हुआ है. सबसे ज्यादा चर्चा फिल्म के विवादित सीन को लेकर है, जिसमें स्वरा भास्कर मास्टरबेशन करती दिख रही हैं. आलोचकों का कहना है कि पद्मावती के दौरान स्वरा ने औरत को मात्र योनि समझने के बयान से हंगामा खड़ा किया था और अब वो खुद क्या कर रही हैं?

हमें यह समझने की ज़रुरत है कि क्या वाकई स्वरा ने कुछ ग़लत किया है? स्वरा भास्कर इस मसले पर पूरी तरह से चुप हैं. स्वरा के अनुसार वो ऐसी किसी चीज़ पर बात नहीं करती जो उन्हें निजी तौर पर प्रभावित नहीं करती हो. ज़ाहिर है, इस मुद्दे में स्वरा को ट्रोलर्स से कोई फर्क नहीं पड़ता है और उन्होंने इस विवाद को पेड कैंपेन कह कर खारिज कर दिया.

पर सोचने वाली बात यह है कि हमें 'वीरे दी वेडिंग' से इतनी परेशानी आखिर है क्यों. 'वीरे दी वेडिंग' में बतौर फिल्म ऐसा कुछ नहीं है जिसके लिए आप इतनी देर बहस करें. इस फिल्म की निर्माता एकता कपूर और रेहा कपूर कि फिल्मों से जो कुछ अपेक्षित रहता है, वही इस फिल्म में रहा भी. ज़रा आयशा (2010) याद कीजिए, अमीर लड़कियां जिनकी जिंदगी में एक्के ही मकसद है - ऐय्याशी!



आयशा फिल्म में एक पिता अपनी बेटी के क्रेडिट कार्ड बिल से परेशान था लेकिन फिर भी कोई रोकटोक नहीं थी. वो एक बीटल गाड़ी में घूमती थी और उसके पेट्रोल के लिए कोई चिंता उसे नहीं करनी थी. दरअसल वो समाज का ऐसा हिस्सा है जिसमें हम में से अधिकांश लोग नहीं होते हैं. यह फिल्म सुपर रिच क्लास की लड़कियों के जीवन के हिसाब से रची गई है और दिल्ली की हाई सोसाइटीज़ में आपको ऐसी 'गैंग्स ऑफ गर्ल्स' मिलती हैं जो फेयरवेल के बाद गाला पार्टी करती है, न कि रिश्तेदारों के साथ बैठ कर इस बात पर विमर्श करती हैं कि आगे कोर्स क्या करना है?
बेंटली में गोलगप्पे खाने वालीं, 10 लाख की छुट्टी दोस्तों पर खर्च कर देने वालीं लड़कियां होती हैं लेकिन मुट्ठीभर. सो, शहर की मुट्ठी भर 'सुपर ईलीट' क्लास की कहानी कहने वाली फिल्म पर आप बहस कर रहे हैं यहीं आप ग़लत हो जाते हैं.

इस फिल्म के सिनेमैटोग्राफी की प्रशंसा कीजिए, इस फिल्म में करीना की एक्टिंग की प्रशंसा कीजिए. सोनम कपूर और शिखा तलसानिया के स्तरीय अभिनय की आलोचना कीजिए. लेकिन नहीं, आप तो मास्टरबेशन पकड़ कर बैठेंगे. हे इंटरनेट - लड़कियां सेक्स के बारे में बात करती हैं, फीमेल मास्टरबेशन सत्य है, फ़िरंगी आदमी से शादी के बाद माता पिता से लड़ाई सत्य है, एक लड़की का बिंदास तरीके से पार्टी करना, लड़कों को टाॅय ब्वाॅय रखना सत्य है और सोनम का किरदार तो सबसे काॅमन है कि 30 कि उम्र में शादी का दबाव है और लोग बदनाम कर रहे हैं.

अब क्योंकि ये फिल्म फीमेल लीड थी तो माना गया कि फिल्म एक सर्टेन मैसेज देगी. पर ऐसा कोई मैसेज देने के लिए ये फिल्म नहीं बनाई गई है और इसलिए देती भी नहीं है. आयशा, क्विक गन मुरुगन और नागिन जैसी फिल्में बनाने वाले निर्माता और निर्देशक इस सोसायटी को कोई मैसेज नहीं देंगे. वीरे दी वेडिंग एक औसत और पूर्णत कमर्शियल फिल्म है जिसे आपके ट्वीट, स्टेटस और मीडिया की खबरें, कई मायनों में यह लेख भी चर्चा दे रहे हैं यही निर्माता चाहते भी हैं.

इस फिल्म में संदेश मत ढूंढिए क्योंकि इस फिल्म में सबकुछ वैसा है जैसा एक बॉलीवुड मसाला फिल्म में होगा. भव्य सेट, आर्कषक कॉस्टयूम, सेक्स, स्लीज़िंग...करीना के ईयर रिंग्स देखे?

नहीं, तो देखिए, दोबारा देखिए और समझिए - ये वो सिनेमा नहीं है जो संदेश देगा, ये वो सिनेमा है जो 'हम तो वही दिखाते हैं...' सिद्धांत पर चल रहा है- इस पर माथा मत फोड़िए. मास्टरबेशन के दृश्य को लेकर विवाद करने से पहले सोचिए. उन्होंने क्या ग़लत दिखाया, मास्टरबेशन कौन नहीं करता?

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