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पेड़ों के रक्षक इस शख्स को शादी से एक दिन पहले मारकर लटकाया था, फिल्म में खुलेंगे कई भेद

News18Hindi
Updated: December 28, 2019, 9:11 PM IST
पेड़ों के रक्षक इस शख्स को शादी से एक दिन पहले मारकर लटकाया था, फिल्म में खुलेंगे कई भेद
वन रक्षक को कांस भेजा जाएगा.

'वन रक्षक' नाम की यह फीचर फिल्म पूरी तरह एक फॉरेस्ट गार्ड की ज़िंदगी पर आधारित है. इस फीचर फिल्म को साल 2020 के मई महीने में कान्स फिल्म फेस्टिवल में भेजा जाएगा.

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  • Last Updated: December 28, 2019, 9:11 PM IST
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मंडी. हमारे इर्द-गिर्द तमाम कहानियां मौजूद हैं, जिन कहानियों के अगुवा बहुत अलग होते हैं. ऐसे अगुवा जिनके बारे जानना किसी नए सपने में दाखिल होने से कम नहीं है. जिस सपने में नज़र आने वाले सितारों में जुनून कूट-कूट कर भरा हुआ है, जिन कहानियों की छोटी-छोटी बातें खुद में नज़ीर हैं. यह कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जिसका अगुवा एक फॉरेस्ट गार्ड है. जिसे जंगल माफियाओं ने उसकी शादी के ठीक एक दिन पहले मार कर पेड़ पर लटका दिया.

सारी लड़ाई पेड़ों को बचाने की
'वन रक्षक' नाम की यह फीचर फिल्म पूरी तरह एक फॉरेस्ट गार्ड की ज़िंदगी पर आधारित है. इस फीचर फिल्म को साल 2020 के मई महीने में कान्स फिल्म फेस्टिवल में भेजा जाएगा. इस फिल्म के किदार की कहानी को हिमाचल प्रदेश के मंडी शहर से थोड़ी दूर स्थित जंजैहली नाम की जगह पर फिल्माया गया है. यहां एक आम इंसान की निगाह जितनी दूर तक जाती है वहां तक बस पेड़ ही नज़र आते हैं. हर बड़े पेड़ की कीमत एक करोड़ रुपए से ही शुरू होती है, सारी लड़ाई इन पेड़ों को काटने से लेकर बचाने के बीच की है.

पेड़ों को बचाने की जुगत में फॉरेस्ट गार्ड रहते हैं और खत्म करने की मंशा जंगल माफियाओं की होती है. इस फिल्म के फॉरेस्ट गार्ड का नाम है चिरंजीलाल. जिसके परिवार में ज़्यादा लोग नहीं थे. चिरंजीलाल स्वभाव से भरपूर जुनूनी था और सोच से ईमानदार, अपनी मिट्टी के लिए कुछ भी कर गुज़रने वाला. लेकिन अफसोस सरकार ने जंगल माफियाओं के खिलाफ इतनी अहम लड़ाई में फॉरेस्ट गार्ड को कुछ खास नहीं दिया. दिया तो सिर्फ एक टॉर्च, एक गॉगल, और एक डंडा.

कई बार चुकानी पड़ी कीमत
वह पूरा इलाका ही ऐसा था जहां आने जाने के लिए कोई साधन रखना संभव ही नहीं था. यह अपने आप में एक अलग चुनौती थी, कितनी भी दूरी क्यों न हो सब पैदल ही तय करनी पड़ती थी. हालात इतने बदतर हैं कि फॉरेस्ट गार्ड को वायरलेस तक मुहैया नहीं कराया गया था. जिसके चलते न तो वह प्रशासन से मदद मांग सकते थे और न ही खुद को सुरक्षित रख सकते थे. एक तरफ जंगल माफियाओं का डर तो दूसरी तरफ खूंखार जंगली जानवरों का डर.
forest officerफिल्म में इस बात को भी काफी मज़बूती से उठाया गया है कि चिरंजीलाल ने सरकार से कई बार मदद भी मांगी, हथियार तक मांगे पर कोई मदद नहीं मिली. कई बार जंगल माफिया पेड़ काटने के लिए औरतों का इस्तेमाल करते थे. औरतें पेड़ काटने जातीं और जैसे ही चिरंजीलाल उन्हें पेड़ काटने से मना करता औरतें उस पर आरोप लगा देतीं. छेड़खानी के आरोप, ज़्यादती और बदतमीज़ी के आरोप, कभी-कभी तो बलात्कार के आरोप भी. एक बार चिरंजीलाल को बेबुनियाद आरोपों के चलते निलंबित भी होना पड़ा था.

जब मुख्य किरदार हुए चोटिल
इस फिल्म में चिरंजीलाल का किरदार मधुबनी के रहने वाले एक रंगकर्मी धीरेन्द्र ठाकुर ने निभाया है. धीरेन्द्र ठाकुर ने बातचीत में बताया कि फॉरेस्ट गार्ड के जूते बहुत अलग तरह के होते हैं, उनकी बनावट काफी अलग होती है. जिन्हें पहन कर दौड़ पाना खुद में एक चुनौती थी. फिल्म का एक सीन है जिसमें चिरंजीलाल दौड़ते हुए जंगल माफिया को पकड़ने की कोशिश करता है. सीन को फिल्माते हुए धीरेन्द्र 30-40 फीट नीचे गिरे और उनके सिर में गहरी चोट आई.

फिल्म की सहायक निर्देशक श्वेता दत्त बताती हैं कि गहरी चोट आने के बावजूद धीरेन्द्र ने कहा 'इस सीन को पूरा कर लेते हैं क्योंकि बाद में वह बात नहीं रह जाएगी'. सीन पूरा करने के बाद धीरेन्द्र को सिर पर कई टांके लगे थे. फिल्म में चिरंजीलाल की ज़िंदगी के कुल 3 दौर दिखाए गए हैं, पहला बचपने से लेकर 15-18 साल तक की उम्र. दूसरा 18 साल से लेकर 25 साल तक और तीसरा 25 से लेकर 30-32 साल तक. चिरंजीलाल की हत्या भी खुद में हैरान कर देने वाली थी.

जब लटका मिला चोटिल शरीर
चिरंजीलाल की होने वाली पत्नी भी फॉरेस्ट गार्ड ही थी. दोनों खुश थे कि दोनों की शादी होने वाली है, मेहंदी का दिन था. चिरंजीलाल की होने वाली पत्नी ने पूछा, 'मेरे लिए कोई उपहार नहीं लेकर आए'? जवाब में चिरंजीलाल ने बाद में लेकर आने के लिए कहा, उसकी होने वाली पत्नी ज़रा निराश हुई. यह देख कर चिरंजीलाल का मन बदला और उसने जाने का फैसला लिया. लेकिन उस वक्त तक चिरंजीलाल को बिलकुल नहीं पता था कि वह जंगल माफियाओं की निगरानी में है.forest officer 3

बिना देर किए चिरंजीलाल अपने घर से निकाल गया. थोड़ी दूर जाने पर चेरा ढंके हुए दो लोग आए और रास्ते के बीच से ही उसका अपहरण कर लिया. इस घटना के ठीक 2 से 3 दिन बाद चिरंजीलाल का अधनंगा शरीर एक पेड़ से लटका हुआ मिला था. शरीर पर कई चोट और घावों के निशान भी थे और वहीं से एक सुसाइड नोट भी मिला था. उस नोट में लिखी हुई बातें पूरे मामले को और पेचीदा बनाती हैं. इस मामले पर दावे भले कितने भी हो जाएं पर असलियत यही है कि सच निकल कर नहीं आया है.

सरकार भी नहीं ले रही सुध
इस पूरी फिल्म में जिस बात पर सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया गया है वह है चिरंजीलाल जैसे तमाम फॉरेस्ट गार्ड के साथ होने वाला बर्ताव. इतने मुश्किल हालात झेलने के बावजूद सरकार इन्हें कोई खास सुविधा नहीं देती है. देश के सुदूर जंगलों में ऐसे तमाम वन रक्षक हैं जो हर नए दिन नई तरह की चुनौतियां झेल रहे हैं. लेकिन इतना कुछ होने के बावजूद वह अपने काम में डटे हुए हैं, फिर भी सरकार इनके लिए कुछ नहीं कर रही है.

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फिल्म से जुड़ी ऐसी तमाम बातें हैं जिनका ज़िक्र ज़रूरी है. फिल्म नेशनल अवार्ड की कतार में लग चुकी है और साल 2020 के मई महीने में कान्स में भेजी जाएगी. फिल्म की शूटिंग में लगभग 35 से 40 दिन का समय लगा. फिल्म के क्रू को माहौल और दिक्कतें समझने में कोई परेशानी न हो इसलिए क्रू शूटिंग के तय समय से 7 दिन पहले वहां पहुंच गया था. चूंकि इलाका पहाड़ी था और बड़े-बड़े पेड़ों से घिरा हुआ था इसलिए सूरज की रोशनी के आने-जाने की वजह से भी बहुत मुश्किल हुई.

जिन मुद्दों पर ध्यान नहीं जाता
फिल्म की पूरी कहानी भी मंडी से 70-80 किलोमीटर दूर जंजैहली में ही लिखी गई है. फिल्म के क्रू में लगभग 60 से 70 लोग मौजूद थे. फिल्म लगभग तैयार हो चुकी है, जल्द ही पर्दे पर उतारी जाएगी. फिल्म से जुड़े लोगों का यह भी कहना था कि हम ग्लोबल वोर्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसे अहम मुद्दों पर बात करते हैं. लेकिन उन बड़े मुद्दों की बुनियाद में ऐसे छोटे पर ज़रूरी मुद्दे छिपे होते हैं. जिन मुद्दों की कीमत कभी कभी एक इंसान जितनी होती है लेकिन अफसोस की इन पर कम ही लोगों का ध्यान जाता है.

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First published: December 28, 2019, 9:03 PM IST
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