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avrodh season 2 review sloppy attempt to glorify the decisions taken by government ss

Review: सरकार के निर्णयों को सही ठहराने के चक्कर में उत्पन्न हो गया Avrodh Season 2

अवरोध सीजन 2 SonyLIV पर स्ट्रीम हुआ है.

अवरोध सीजन 2 SonyLIV पर स्ट्रीम हुआ है.

Avrodh Season 2 Review: अवरोध की मूल समस्या ये रही कि शायद वो तय नहीं कर पाया कि उसे सरकार की तारीफ करनी है और अपनी वेब सीरीज की कहानी से समझौता करना है या फिर पहले सीजन की ही तरह एक लगभग ईमानदार कोशिश करनी है. वैसे तो ओटीटी पर बहुत कुछ और भी है देखने को लेकिन अवरोध का दूसरा सीजन देखने से अपने आप को बचा कर ही रखियेगा. ब्रांड प्लेसमेंट इतने खराब तरीके से बहुत कम देखने को मिलता है.

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अमेज़ॉन प्राइम का ‘द फॅमिली मैन’ सफल होने के बाद शायद सभी निर्माता निर्देशक एक फार्मूला तलाश करने में लग गए हैं, एक भारतीय जासूस किस्म के आदमी का, अंडरकवर हो तो और बढ़िया. सोनी लिव की प्रस्तुति अवरोध – ‘द सीज विदिन’ ने पहले सीजन में काफी अपेक्षाएं जगाई थी. करीब दो साल पहले रिलीज़ उस सीजन में कहानी भारत की सर्जिकल स्ट्राइक की थी, कश्मीर की थी, बुरहान बानी जैसे नाम वाले आतंकवादी के खात्मे की थी. ‘उरी – द सर्जिकल स्ट्राइक’ से पनपे देशभक्ति के बुखार की थी और उन दिनों देश की मनोदशा भी कुछ ऐसी थी कि भारत की सेना के महिमा मंडन की कहानी बेहद पसंद की गयी. इस बार वेब सीरीज में इस तरह की कहानी, घटनाओं का नाट्कीयकरण और फिल्मांकन पहले जितने करीब से और नफासत से नहीं दिखाया गया है. पहले सीजन की सफलता की वजह से सोनी लिव ने इसका दूसरा सीजन बनाने का निर्णय लिया जो नोटबंदी की पृष्ठभूमि पर बसाया गया है. इस बार वही गलती हुई जो अक्सर सीजन 2 में देखने को मिलती है. कहानी का मूल उद्देश्य से भटकना और ढ़ेर सारी छोटी-छोटी कहानियों से मूल कथानक को जोड़ने का असफल प्रयास करना. सीजन 2 बहुत ही लम्बा और ठंडा है, सरकारी भोंपू की तरह लगता है.

डिफेन्स जर्नलिस्ट शिव जरूर और राहुल सिंह की लिखी हुई किताब ‘इंडियाज मोस्ट फीयर्ड’ पर आधारित था अवरोध का पहला सीजन. उम्मीद तो ये थी कि दूसरा भी इसी किताब के किसी किस्से को लेकर उसका नाट्य रूपांतरण किया जाता. दुर्भाग्य से इस बार न तो किताब का कोई किस्सा है, न कोई अच्छा केंद्रीय किरदार है, न ही कोई ढंग के अभिनेता हैं, न ही पटकथा में कोई सरपैर नजर आया है. अवरोध सीजन 2 में डीमॉनीटाईज़ेशन का महिमामंडन करने और प्रधानमंत्री की तारीफ करने की बहुत ही सस्ती कोशिश की गयी है. इस वजह से पूरी सीरीज का तो जो होना था वो हुआ ही बल्कि इस निर्णय के पीछे की सोच और प्रक्रिया की गंभीरता को भी बहुत ही उथले तरीके से दिखाया गया है जो की ठीक नहीं लगा. निर्माता निर्देशक की ऐसी क्या मजबूरी रही होगी कि इस सीरीज को बनाने के लिए सेना की कहानियों से हटकर वो एक ऐसे सरकारी निर्णय की तारीफ में लग गए कि वेब सीरीज का असली व्याकरण ही भूल गए. यदि प्रोपोगंडा ही करना था तो कम से कम ठीक से तो करते.

बंगाली फिल्मों में अक्सर शरदिंदु बंदोपाध्याय के किरदार जासूस ब्योमकेश बक्शी का किरदार निभाने वाले अबीर चटर्जी को आर्मी का कैप्टन प्रदीप भट्टाचार्य बनाया गया है जो कवर के तौर पर मुंबई में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में ऊंचे पद पर काम करता है और अक्सर अपने ऑफिस के बजाये फील्ड में किसी केस को सुलझा रहा होता है. जाली नोटों का कन्साइनमेंट पकड़ने के अलावा वो कभी कभी अपनी कुर्सी पर बैठ कर अलग अलग आतंकवादियों के बैंक अकाउंट की डिटेल देख रहा होता है. ये सब सुविधा उसको इनकम टैक्स डिपार्टमेंट देता है या फिर आर्मी की इंटेलिजेंस यूनिट, ये समझना दर्शकों का काम है. उसका परिवार भी है जिस से उसका कोई सम्बन्ध बनता बिगड़ता नहीं है. पिछले सीजन के किरदार एनआइए शैलेश मालवीय (नीरज कबी) जो शब्दों को चबा चबा कर राष्ट्रवाद के बजाये दुश्मन से बदला लो वाला डायलॉग फेंक रहे होते हैं वो इस सीजन में भी हैं. मोहन अगाशे को प्रधानमंत्री के किरदार में देखने कोई मज़ा नहीं आया. इस से बेहतर पहले सीजन में विक्रम गोखले लगे थे. डीमॉनीटाईज़ेशन के फायदे गिनाने के लिए उनके सामने पॉवरपॉइंट प्रेजेंटेशन दिखाया जाता है और वो इसे अप्रैल में लागू करने के लिए कहते हैं ताकि इसको लागू करने की तैयारी जैसे नए नोट छापना, एटीएम कैलिब्रेट करना आदि इत्यादि ठीक से हो सकें. फिर अचानक पाकिस्तान में छपे नकली नोट हिंदुस्तान के आतंकवादियों के पास पहुँचने लगते हैं तो रातों रात निर्णय ले लिया जाता है कि नोटबंदी कर दी जाये.

जैसे पहले फिल्मों में जगदीश राज या इफ्तिखार सिर्फ पुलिस अफसर के रोल में ही नज़र आते थे, वेब सीरीज और टेलीविज़न में राजेश खट्टर अक्सर पाकिस्तान की सेना या आयएसआय के सीनियर अफसर बनते हुए नज़र आते हैं. इतना लचर किरदार बनाया जाता है पाकिस्तान के जनरल का, मानों वहां सब सिफारिश पर ही सेना में उच्च पदों पर पहुँचते हैं और मूलतः मूर्ख होते हैं. सेना किसी भी देश की हो, इस तरह के किरदार तो कहीं देखने को नहीं मिलते. संजय सूरी की शक्ल इतनी मासूम है कि वो कभी भी विलन नहीं लग सकते. वो चाहें भी तो गेटअप बदल कर किसी तरीके से एक शरीफ मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा आदमी की छाया से बाहर नहीं निकल सकते. आहना कुमरा तो फैशन मैगज़ीन या मुंबई-दिल्ली के किसी फैंसी रेस्टॉरंट से लंच कर के निकलती सी लगती हैं और फिर अचानक ही खूंखार आतंकवादियों से आरडीएक्स और नकली नोटों के कन्साइनमेंट लेने के सौदे करती रहती है. इनकी खूबसूरती पर कोई भरोसा करे भी तो कैसे वो भी आतंकवादी. लेखक और निर्देशक की नासमझी इस सीजन का सबसे बड़ा अवरोध बन कर सामने आये हैं.

9 एपिसोड लम्बी इस अझेल गाथा में दर्शक सोचते हैं कि अबीर चटर्जी एक दोहरी लाइफ जी रहा है तो शायद फॅमिली मैन के मनोज बाजपेयी की तरह उसके किरदार की कुछ खासियत होगी. उन्हें लगता है कि इस बार तो कम से कम समझ आ ही जायेगा कि देश की सरकार और खासकर प्रधानमंत्री कोई निर्णय कैसे लेते हैं, उसका पालन कैसे करवाते हैं और खासकर कोई ऐसा निर्णय जिस से पूरे देश की जनता पर असर पड़ने वाला हो, उसकी प्रक्रिया में कौन कौन शामिल होता है. लेकिन दर्शकों के हाथ लगती है निराशा. एक आर्मी अफसर अपने लिए दुश्मन के इलाके में या दुश्मन देश में कॉन्टैक्ट कैसे बनाता है, कैसे थोड़ा ब्लैकमेल और थोड़ी मदद कर के वो किसी को अपना जासूस या अपना मुखबिर बना लेता है, शायद ये समझ आएगा लेकिन ये भी सिर्फ उम्मीद ही रह जाती है. एक भी सीन ऐसा नहीं है जो आपको सीरीज देखने के बाद याद रहे. एक भी सीन ऐसा नहीं है जिस पर मीम ही बन जाएँ. एक्शन के सीन नकली लगते हैं, आतंकवादी गोलियां खाने के लिए उधार बैठे रहते हैं, आर्मी के कमांडो का निशाना कभी चूकता ही नहीं, विलन हमेशा कोई न कोई गलती करता ही है. इतनी भीषण गलतियां और क्लीशे हैं कि दर्शक तरस जाता है एक ढंग के दृश्य के लिए. इसके बावजूद भी निराशा ही हाथ लगती है.

अभिनय तो सबका या तो औसत से नीचे हैं या फिर नाटकीय है. दोनों ही परिस्थिति में किसी पात्र के लिए देखने वालों की कोई सहानुभूति तो छोड़िये कोई कनेक्शन भी नहीं बनता. न हीरो से प्रेम होता है न विलन पर गुस्सा आता है. बस निर्देशक और लेखक पर हंसी आती है जो वेब सीरीज के दर्शकों को मूर्ख समझते हैं. डिज्नी हॉटस्टार पर नीरज पांडेय का स्पेशल ऑप्स देख लें, अमेज़ॉन प्राइम पर राज और डीके का द फॅमिली मैन देख लें तो आपको एहसास होता है कि प्रोडक्शन वैल्यू नाम की भी कोई चीज़ होती है. अवरोध में उस पर भी अवरोध है. निर्माता ने एक एयरोप्लेन का सेट लगाया और थोड़ा बहुत फेर बदल कर के उसे अलग अलग एयरलाइन्स का प्लेन बना दिया. रात की फायरिंग के शॉट दिन में लिए गए थे क्योंकि इंडोर शॉट की लाइट अलग है और आउटडोर शॉट की लाइट अलग, सिर्फ फ़िल्टर डाल कर दिन को रात बना देने से काम नहीं होता. सिनेमेटोग्राफर शानू सिंह राजपूत का काम एकदम ही कमज़ोर है और साथ ही एडिटर शक्ति हसीजा की कैंची में भी कोई धार नहीं है. प्रोडक्शन डिज़ाइनर प्रतिक रेडिज ने सस्ते में काम निपटाया है और शायद इसी वजह से लेखक मण्डली के बृजेश जयराजन और सुदीप निगम ने ऐसे दृश्य रचे हैं जिसमें ज़्यादा पैसा खर्चा करने की स्थिति ही न बने. बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर राज आचार्य ने काफी जानेमाने और सफल निर्देशकों के साथ काम किया है लेकिन खुद ने अवरोध के सीजन 2 में बहुत ही काम चलाऊ निर्देशन किया है.

अवरोध की मूल समस्या ये रही कि शायद वो तय नहीं कर पाया कि उसे सरकार की तारीफ करनी है और अपनी वेब सीरीज की कहानी से समझौता करना है या फिर पहले सीजन की ही तरह एक लगभग ईमानदार कोशिश करनी है. वैसे तो ओटीटी पर बहुत कुछ और भी है देखने को लेकिन अवरोध का दूसरा सीजन देखने से अपने आप को बचा कर ही रखियेगा. ब्रांड प्लेसमेंट इतने खराब तरीके से बहुत कम देखने को मिलता है.

Tags: Ott, Web Series

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