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Modern Love Mumbai Review: प्यार के आधुनिक रंगों में रंगे हैं मुंबई में मोहब्बत के ये किस्से

ये वेब सीरीज अमेजॉन प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हुई है.

ये वेब सीरीज अमेजॉन प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हुई है.

Modern Love Mumbai Review: वेब सीरीज की अधिकांश कहानियां बहुत अच्छी हैं. अभिनय और निर्देशन के साथ मुंबई की नब्ज़ पर भी सुन्दर पकड़ रखी गयी है. इसे देखना चाहिए क्योंकि कहानियां तो यूनिवर्सल हैं, लेकिन मुंबई के मिज़ाज के हिसाब से इनकी खूबसूरती कुछ और ही लगती है. बारिश के बाद धुली हुई मुंबई के जैसी.

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कड़वाहट और मनभेद के दौर में आज प्रेम सबसे बड़ी ज़रुरत है. सामान्य से मनभेद अब हिंसा के रूप में बाहर आता है. मेरी पसंद और तेरी पसंद अब अगर एक न हुई तो तू मुझसे दूर ही रहना नहीं तो परिणाम अच्छे न होंगे. गुस्सा, द्वेष, नाराज़गी अब रूठने तक सीमित नहीं है बल्कि वो अब एक ऐसे रंग में सामने आ रही है जिसे हम खून का रंग कहते हैं. ऐसे माहौल में ये बात ज़रूरी है कि प्रेम की पौध को सींचा जाए, उसे खाद पानी दे कर फलने फूलने दिया जाए ताकि आने वाले समय में हम अगली पीढ़ी को एक ऐसा माहौल दे सकें जहां खून का रंग प्रेम के रंग से रोज़ हारता रहे. इसी कड़ी में अमेज़ॉन प्राइम वीडियो ने गुणी लेखकों और निर्देशकों को साथ ले कर एक अन्थोलॉजी ‘मॉडर्न लव मुंबई; प्रस्तुत की है. कहानियां यूं तो मुंबई में बसी हैं लेकिन आज उन्हें किसी भी शहर में बसा दिया जाए, प्रेम की भाषा तो सब समझ जाते ही हैं. बहुत खूबसूरत कहानियां हैं, बहुत सुन्दर फिल्में हैं. शायद इन्हें देख कर मन का वो कोमल कोना एक बार फिर हमें प्रेम की राह पर धकेल दे.

न्यू यॉर्क टाइम्स के एक कॉलम ‘मॉडर्न लव’ में प्रकाशित किस्सों से प्रभावित हो कर इस अन्थोलॉजी का निर्माण किया गया है और प्रेम की ग्लोबल भाषा से इंसानियत को फिर से रोपने की कोशिश की गयी है. मुंबई में दरअसल कई तरह की बदबू फैली होती हैं. समंदर की, सूखती मछलियों की, कचरे की, आतंकी हमलों से घायल ज़ख्मो में भरे मवाद की और रोज़ाना मुंबई आते हज़ारों लोगों के पल पल मरते सपनों की. मुंबई मायानगरी तो है लेकिन मुंबई एक कब्रिस्तान भी है जहां इच्छाएं, आकांक्षाएं, मनोकामनाएं और महत्वकांक्षाएं दम तोड़ती हैं लेकिन जगह की जद्दोजहद से गुजरता ये शहर फिर भी प्रेम के छोटे छोटे बादलों से छाँह कर ही लेता है. इसका सबूत इन कहानियों में छिपाया गया है.

रात रानी
नीलेश मनियार और जॉन बेलांगर की लिखी और शोनाली बोस द्वारा निर्देशित ये कहानी का शीर्षक “नॉट अलाउड” होना चाहिए था लेकिन रात रानी की महक फातिमा सना शेख के किरदार में थी. कश्मीरी परिवार की लड़की जो ज़्यादा पढ़ नहीं सकती, कॉलेज जा नहीं सकती, प्यार नहीं कर सकती, नीची जात के लड़के से तो प्यार बिलकुल नहीं कर सकती, मुंबई में सी-लिंक पर साइकिल नहीं चला सकती, खुद का काम नहीं कर सकती लेकिन जब मुसीबत आती है तो उसे छोड़ कर गए उसके पति से लेकर अपनी कहवे की साइकिल वाली दुकान चलाने तक के जितने भी काम “नॉट अलाउड” थे, फातिमा सब करती है. मुंबई में दूसरे राज्यों से आकर बसे हर शख्स के सपनों को बुनते, टूटते और फिर किसी नए सपने की ओर चलते देखने की सुन्दर मिसाल है. फातिमा ने कश्मीरी लड़की बनने के लिए कश्मीरी लहजा सीखा. फातिमा को ऐसे रोल करते रहने होंगे ताकि वो फूल की तरह खिल के सामने आ सकें. फिल्म में उसे जेंट्स साइकिल चलाते दिखाया है और इतना सुन्दर प्रतीक किसी कहानी में देखने को नहीं मिला है. गिनी दीवान के शब्दों में छुपी आज़ादी यानि गाने ‘रात रानी’ को राम सम्पत के संगीत की साइकिल मिली और निकिता गांधी की दिलख़ुली आवाज ने इसे पेडल मार कर दिलों तक पहुँचाया है. संजीव कौल का लिखा कश्मीरी गाना जीम कीम भी स्क्रीनप्ले में एकदम खूबसूरती से फिट किया गया है.

बाई
कश्यप कपूर और राघव राज कपूर की लिखी इस कहानी के निर्देशक हैं हंसल मेहता और साथ हैं उनके प्रिय अभिनेता प्रतीक गाँधी और पहली बार किसी फिल्म में अभिनय कर रहे शेफ रणवीर बरार. प्रतीक की प्रतिभा इस बार प्रतीक से दगा करती है और दर्शकों को बताती है कि वो सिर्फ गुजराती रंगमंच के कलाकार नहीं हैं बल्कि वो एक बेहद संवेदनशील, सुलझे हुए और नाट्यशास्त्र को भली भाँति समझने वाले कलाकार हैं. उनके पिता उनसे तिरस्कार करते हैं क्योंकि प्रतीक गे हैं तो प्रतीक भी उन पर ताना मारते रहते हैं. रणवीर बरार को देख कर आकर्षित होते हैं लेकिन डरते भी हैं. उनकी पहली मुलाक़ात के दृश्य एक आहत दिल के डर को दिखाते हैं. एक दृश्य में वो रणवीर से भागना चाहते हैं, लेकिन प्यार के आगे हारना भी चाहते हैं और फिर टूट कर रणवीर की बाहों में बिखर जाते हैं. प्रतीक अपने समकालीन अभिनेताओं को फ़ास्ट लोकल से पीछे छोड़ देते हैं. तनूजा के साथ प्रतीक की आखिरी मुलाक़ात में उनके चेहरे को पड़ते ही समझ आ जाता है कि तनूजा और प्रतीक के बीच जोड़ की टक्कर है अभिनय को लेकर और दोनों ही विजेता हैं. फिल्म में संगीत और खाने के बीच मोहब्बत की डिश बनती है. सोनू निगम का गाया “कैसी बातें करते हो” में जीत गांगुली ने ब्लूज म्यूजिक का कमाल इस्तेमाल किया है. नवोदित शायर समीर राहत का यह गाना बेहतरीन शायरी का नमूना है. पाकिस्तान के बेहतरीन गायक अली सेठी के गाने चांदनी रात को भी इस फिल्म में शामिल किया है और वो फिल्म की आत्मा से जुड़ा हुआ जान पड़ता है.

मुंबई ड्रैगन
इसे लिखा है ज्योत्सना हरिहरन और विशाल भारद्वाज ने और निर्देशक विशाल भारद्वाज ही हैं. क्या मुंबई एक ड्रैगन है जो सब कुछ जला डालता है या मुंबई ड्रैगन का मतलब है मुंबई में आने वाले हर इंसान का मुंबईकरण? नसीरुद्दीन शाह का गेटअप और अभिनय देख कर फिल्मों में सरदार का पात्र निभाने वाले हर अभिनेता को अपने अभिनय पर फिर से मेहनत करनी चाहिए. मुंबई सबको अपने अंदर मिला लेता है और बहुत लोगों पर मुंबई का रंग चढ़ने में वक़्त भी नहीं लगता. इन सबके बावजूद मुंबई में आ कर लोग देर ही सही अपना वजूद ढूंढ ही लेते हैं. चीनी अभिनेत्री यीओ यान यान अद्भुत हैं. अपनी जड़ों से कटने का दर्द है भी तो ज़ाहिर नहीं होने देती. मियांग चंग कम काम करते हैं लेकिन इस फिल्म में बहुत जंचते हैं. वामिका गाबी को स्क्रीन पर देखना सुखद है. हर बार उनका परफॉरमेंस थोड़ा और बेहतर होते जाता है. वामिका, मियांग की गर्लफ्रेंड हैं लेकिन मीट या लहसुन नहीं कहती तो मियांग की माँ के हाथ के बनाये खाने के डब्बे, पेट के बजाये उनके फ्रिज में पहुँच जाते हैं. अपनी फिल्म से विशाल कोई संदेसा नहीं देना चाहते बस, मुंबई सभी की मेहबूबा है ये समझाना चाहते हैं जैसे मक़बूल में समझाया था.

माय ब्यूटीफुल रिंकल्स
अलंकृता श्रीवास्तव (लिपस्टिक अंडर माय बुरखा/ बॉम्बे बेगम्स/ मेड इन हेवन) ने स्क्रीनप्ले लिखा है और फिल्म निर्देशित भी की है. मुंबई में किटी पार्टी का कल्चर बहुत कम देखने को मिलता है क्योंकि सभी लोग काम करते रहते हैं. बड़ी उम्र के औरतों को भी मोहब्बत पाने का हक़ है ये समझाने के लिए अलंकृता ने सारिका के साथ अ सूटेबल बॉय के दानेश रिज़वी को कास्ट किया है. दोनों के बीच एक अजीब सी रिलेशनशिप है. दोनों ही सच जानते हैं और दोनों ही एक दूसरे को समझने की कोशिश करते रहते हैं. आकर्षण ही प्रेम है या प्रेम में आकर्षण ज़रूरी है ये एक ऐसा प्रश्न है जिसका जवाब देना मुश्किल है. मुंबई के जैसा. मुंबई सपनों का शहर है या सपने पूरे करने के लिए मुंबई आना ज़रूरी है. बातचीत थोड़ी बोल्ड है लेकिन जिस परिवेश के किरदार हैं वे सही लगते हैं लेकिन कहानी में अश्लीलता से परहेज़ किया गया है और इसे मुंबई के साउथ बॉम्बे की पुरानी इमारतों की ही तरह अपने अस्तित्व की लड़ाई से बेज़ार सा दिखाया है.

आय लव ठाणे
लेखिका नूपुर पै और निर्देशक ध्रुव सहगल एक दूसरे को शायद नेटफ्लिक्स की एक और सीरीज “लिटिल थिंग्स” के दौरान मिले थे. ध्रुव एक्टर भी हैं और लिटिल थिंग्स काफी पसंद भी की गयी थी. इसके बावजूद ये वाली फिल्म थोड़ी कमज़ोर है. डेटिंग एप्स पर प्यार ढूंढने की मशक्कत मुंबई में बहुत की जाती है क्योंकि किसी के पास दोस्ती करने का समय है नहीं. डेटिंग एप्स पर जितने भी लोग पाए जाते हैं वो सब अपनी एक ऐसी प्रोफाइल बनाते हैं जो हक़ीक़त से दूर होती है और सिर्फ उनके दिमाग में होती है. कूल, लिबरल, वोक और न जाने क्या क्या. मसाबा गुप्ता की अपनी ज़िन्दगी पर मसाबा मसाबा नाम की एक सीरीज नेटफ्लिक्स पर आ चुकी है. वो रियलिटी शो की तरह बनायीं गयी थी और ये वाली पूरी फिक्शन है. मसाबा काफी नेचुरल लगती हैं. बंदिश बैंडिट और द विसल ब्लोअर में अपने काम के लिए सराहे गए ऋत्विक भौमिक अपनी उम्र से काफी बड़े शख्स का किरदार निभा रहे हैं. उनका अभिनय थोड़ा टाइपकास्ट है. मुंबई में रहकर नौकरियां कर रहे लोगों को इस कहानी से थोड़ा ही इत्तेफ़ाक़ होगा क्योंकि ठाणे वैसे तो मुंबई का एक और सबर्ब माना जाता है, लेकिन वो अपने आप में एक पूरा शहर है. मुंबई से अलग. जैसे कि ये कहानी. पूरी सीरीज का हिस्सा है लेकिन है सीरीज से काफी अलग.

कटिंग चाय
देविका भगत की कहानी और नूपुर अस्थाना का निर्देशन, उम्मीद होती है कि थोड़ी मस्ती भरी और ज़िंदादिल सी स्टोरी देखने मिलेगी क्योंकि नूपुर ने टीवी के सबसे सफल सीरियल्स में से एक “हिप हिप हुर्रे” निर्देशित किया था और देविका ने बचना ऐ हसीनों, लेडीज वर्सेस रिकी बहल जैसी फिल्में या फिर 4 मोर शॉट्स प्लीज जैसी वेब सीरीज लिखी है. कटिंग चाय बिलकुल निराश नहीं करती. मुंबई की लोकल ट्रेन और उनके प्लेटफार्म पर मिलने वाली कटिंग चाय. इनका अपना सफर है. इस चाय के चक्कर में लोग ज़िन्दगी के फलसफे तक डिस्कस कर लेते हैं. चित्रांगदा सिंह और अरशद वारसी की जोड़ी बहुत ही अनूठी है. उम्मीद से परे. दोनों ही एक दूसरे के साथ बहुत कमाल अभिनय करते हैं. अरशद इतने बरसों के बाद अब कैमरे के लिए अभिनय नहीं करते और यही उनकी जीत है. मुंबई मेरा ख्याल नहीं रखती ये फीलिंग बहुत लोगों को आती है लेकिन असली बात है कि आप मुंबई से मोहब्बत ही नहीं करते. यही बात चित्रांगदा और अरशद के बीच के रिश्ते की है. शुरू से शुरू गाना जो साशा त्रिवेदी और शंकर महादेवन ने गाया है, इस फिल्म की थीम से एकदम जोड़ देता है. संगीत शंकर एहसान लॉय का है.

वेब सीरीज की अधिकांश कहानियां बहुत अच्छी हैं. अभिनय और निर्देशन के साथ मुंबई की नब्ज़ पर भी सुन्दर पकड़ रखी गयी है. इसे देखना चाहिए क्योंकि कहानियां तो यूनिवर्सल हैं, लेकिन मुंबई के मिज़ाज के हिसाब से इनकी खूबसूरती कुछ और ही लगती है. बारिश के बाद धुली हुई मुंबई के जैसी.

Tags: Amazon Prime Video, Arshad warsi, Fatima Sana Shaikh, Film review, Naseeruddin Shah, Prateek Gandhi

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