पौने तीन लाख लोग बिछड़ चुके हैं इस बार के कुंभ मेले में!

कोई इसलिए रो रहा है क्योंकि उसकी बूढ़ी मां कुंभ की भीड़ में खो गई है। कोई इसलिए रो रहा है कि उसका बच्चा लापता है। किसी के पिता, किसी का पति तो किसी का भाई गुम हो गया है।

  • News18India
  • Last Updated: February 10, 2013, 3:18 PM IST
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नई दिल्ली। फिल्मों में अक्सर आपने कुंभ के मेले में दो भाइयों के बिछुड़ने की कहानी देखी होगी लेकिन हकीकत इससे कुछ खास अलग नहीं है। कुंभ के दौरान इतनी भीड़ जुटती है कि कई बार लोग अपने परिजनों से बिछड़ जाते हैं। ऐसे लोगों के लिए अलग-अलग जगहों पर भूले-भटके शिविर बनाए गए हैं जो बिछड़े लोगों को मिलाने के काम में जुटे हुए हैं। आंकड़ों के मुताबिक कुंभ में करीब पौने तीन लाख लोग अब तक अपनों से बिछड़ चुके हैं।

महाकुंभ के दौरान आस्था और भक्ति का सैलाब तो है ही लेकिन वहां कुछ लोग भीगी आंखों के साथ भी मिल जाएंगे। कोई इसलिए रो रहा है क्योंकि उसकी बूढ़ी मां कुंभ की भीड़ में खो गई है। कोई इसलिए रो रहा है कि उसका बच्चा लापता है। किसी के पिता, किसी का पति तो किसी का भाई गुम हो गया और कुछ तो इसलिए बिलख रहे हैं क्योंकि वो जिनके साथ आए थे वो ही कहीं गायब हो गए हैं। आईबीएन 7 जब इन लोगों के पास पहुंचा तो उसके माइक को एनाउंसमेंट माइक समझ कर लोग उन अपनों को पुकारने लगे जो मेले में खो गए थे। सासाराम बिहार की रमैया देवी कहती हैं कि छोटे छोटे बच्चे हैं जिनके पिता खो गए हैं। क्या करें कुछ समझ में नहीं आ रहा है। बाबूजी हमारा बोल दीजिए तो मिल जाएगा। गोपापुर छत्तीसगढ़ की यशोदा कहती है कि मम्मी खो गई हैं। हमारी मम्मी को ढूंढ दो।

कोई उड़िया में बोल रहा था तो कोई बंगाली या किसी और भाषा में। भाषा समझ में आए न आए लेकिन उनका गम समझना मुश्किल नहीं था क्योंकि आंसुओं की भाषा हर देश, हर जगह एक ही होती है। कुंभ नगरी में 10 के करीब खोया पाया केंद्र हैं जो गैरसरकारी तौर पर चलाए जाते हैं। इनमें से एक है भूला बिसरा केंद्र जहां बड़ी संख्या में लोग अपनों की पूछताछ में आते हैं और अपनों के इंतजार में बैठे रहते हैं।



राजाराम जी ने कुंभ में बिछड़ों को अपनों से मिलाने का ये सिलसिला 1946 में माघ पूर्णिमा मेले में शुरू किया था। इसके बाद न जाने कितने कुंभ और अर्धकुंभ गुजर गए। राजाराम जी आज 88 साल के हैं लेकिन उनका सफर आज भी जारी है। वो कहते हैं कि हाथ में टिन का भोंपू लेकर ये काम शुरू किया था। अब तक करीब 16 लाख लोगों को मिला चुका हूं।
14 जनवरी को मकर संक्रांति से शुरू हुए कुंभ में मौनी अमावस्या तक करीब पौने तीन लाख लोग खो चुके हैं। इस आंकड़े में सिर्फ मौनी अमावस के दिन खोए 97 हजार लोग शामिल हैं। अभी भी करीब एक लाख 23 हजार लोग अपनों से बिछड़े हुए हैं। ये आंकड़ा बिछड़ों से मिलने और अपनों से बिछड़ने के चलते बढ़ता और घटता रहता है।
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