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वो 20 काम जिससे साल भर शुद्ध रहेगी दिल्ली की आबोहवा

News18Hindi
Updated: November 7, 2019, 10:16 AM IST
वो 20 काम जिससे साल भर शुद्ध रहेगी दिल्ली की आबोहवा
कैसे साफ होगी दिल्ली की हवा

दिल्ली में सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण (Air Pollution) सड़कों पर उड़ने वाली धूल से होता है. इसलिए आधुनिक तरीके से धूल को उठाने वाली मशीन मंगवानी पड़ेगी

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  • Last Updated: November 7, 2019, 10:16 AM IST
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नई दिल्ली. बेहताशा बढ़ते वाहन और पंजाब-हरियाणा (Punjab-Haryana) में जलाई जा रही पराली (Stubble) तो प्रदूषण के कारण हैं ही, लेकिन इस हालत के लिए सिर्फ इन्हीं को गुनाहगार मानना ठीक नहीं हैं. गुनाहगार आप और हम सभी हैं. हमारी एंटी नेचर गतिविधियों से सबकुछ तहस-नहस हो रहा है. यदि दिल्ली को जहरीली गैस का चैंबर (Air Pollution) बनने से बचाना है तो आप और हमें मिलकर काम करना होगा. इस बारे में डॉक्टरों, पर्यावरणविदों और अरावली को बचाने की जंग लड़ने वालों ने कुछ सुझाव दिए हैं.

क्या है समाधान

>>इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली-एनसीआर में फॉरेस्ट कवर 12 फीसदी से ज्यादा नहीं है. गाजियाबाद में सबसे कम 1.89 फीसदी और सबसे अधिक 11.88 फीसदी दिल्ली में है. इसलिए 33 फीसदी फॉरेस्ट कवर के लिए पौधारोपण बढ़ाना जरूरी है.



>>जैसे हमने घर की जरूरत पूरी करने के लिए वर्टिकल फ्लैट बनाने शुरू किए हैं उसी तरह हमें वर्टिकल फॉरेस्टेशन भी करना होगा. सोसायटी के हर फ्लोर पर कम से कम ऐसे इतने पेड़ लगने चाहिए जो उस फ्लोर पर रह रहे लोगों की ऑक्सीजन जरूरतों को पूरा कर सकें. इटली के मिलान शहर में इस तरह का प्रयोग किया गया है.

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दिल्ली में पीएम 2.5 के स्रोत


>>दिल्ली में सबसे ज्यादा प्रदूषण सड़कों पर उड़ने वाली धूल से होता है. इसलिए आधुनिक तरीके से धूल को उठाने वाली मशीन मंगवानी पड़ेगी.
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>>दिल्ली में प्रदूषण का दूसरा बड़ा कारण है वाहनों से निकलने वाला धुआं. इसलिए डीजल की जगह सीएनजी का इस्तेमाल बढ़ाना होगा. अपनी गाड़ियों में सीएनजी फिट करवाएं.

>>पतअडानी गैस के वाइस प्रेसीडेंट (मार्केटिंग) बातिश ढोलकिया के मुताबिक फरनेस ऑयल और पेटकोक पर प्रतिबंध के बावजूद उद्योगों में इसका इस्तेमाल हो रहा है. औद्योगिक नगरी फरीदाबाद के 17 हजार उद्योगों में से सिर्फ 360 ही गैस से चल रहे हैं.

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दिल्ली में पीएम-10 के स्रोत


>>टूटी फूटी सड़कें ठीक करवाने की जरूरत है. इससे धूल का गुबार उठता है. दिल्ली-एनसीआर में जहां-जहां भी सड़कें टूटी हुई हैं वहां-वहां के नागरिक नेताओं और नगर निगमों पर इन्हें ठीक कराने के लिए आगे बढ़ने की जरूरत है.

>>पर्यावरणविद् एन. शिवकुमार के मुताबिक हर परिवार कम से कम एक पेड़ की धुलाई करवाने की जिम्मेदारी ले. अपने घर के सामने पार्क के एक पेड़ पर लिपटी धूल की पानी से सफाई करें. इससे पेड़ों में प्रदूषण सहने की शक्ति बढ़ेगी. पत्ते साफ रहेंगे तो धूल और धुआं आप पर कम असर करेगा.

>>सेव अरावली के एक्टिविस्ट जितेंद्र भड़ाना कहते हैं कि पौधारोपण के नाम पर सिर्फ गिनती न करें, जिन पौधों को लगाएं उन्हें मुड़कर भी देखें. कोई भी पौधा लगाने की जगह पीपल और नीम के पौधे लगाएं. पेड़ों की सुरक्षा के प्रति सजग रहें, सरकार को भी पेड़ काटने पर जुर्माना और सजा सख्त करने की जरूरत है. साथ ही पेड़ काटने की जगह उसके ट्रांसप्लांटेशन पर जोर दिया जाना चाहिए.

>>कंस्‍ट्रक्‍शन (Construction) पर मॉनिटरिंग बढ़ाई जाए. जिस कंस्ट्रक्शन साइट से धूल उड़े उस पर भारी जुर्माना होना चाहिए. नागरिक सड़कों पर रोजना पानी छिड़कने का नगर निगमों पर दबाव बनाएं. जिससे धूल के कण नीचे बैठे रहें.

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फॉरेस्ट कवर बढ़ने की जगह कम हो गया


>>कोयले और तेलों से चलने वाली इंडस्ट्री पूरी तरह से बंद होनी चाहिए.

>>हॉट मिक्स प्लांट हो सके तो दिल्ली से कहीं दूर शिफ्ट किए जाएं.

>>मेट्रो और हाइवे के लिए जो पेड़ काटे जा रहे हैं उसमें एक के बदले 2 लगाना सुनिश्चित करवाया जाए. काटने के बदले पेड़ दिल्ली-एनसीआर में ही लगाए जाएं.

>>अरावली पहाड़ी में निर्माण पूरी तरह से बैन किया जाए. सरकारी और निजी किसी संस्थान को निर्माण की अनुमति न दी जाए. यहां के सभी अवैध निर्माण तोड़े जाएं.

>>अरावली के संरक्षण के लिए नियम सख्त किए जाएं. उल्लंघन करने पर कम से कम 10 साल की जेल का प्रावधान हो.

>>दिल्ली मे एक अनुमान के मुताबिक निजी वाहनों की संख्या सवा करोड़ के ऊपर है. जबकि ये हर साल 10 लाख की रफ्तार से बढ़ रहा है. कारों की बढ़ती तादाद से सड़कों पर लगने वाला जाम और इन गाड़ियों से निकलते धुएं की वजह से हवा में सांस लेना दूभर हो चला है. इसके बावजूद कभी ये नहीं सोचा गया कि बढ़ती गाड़ियों पर कैसे अंकुश लगाया जाए. हालांकि दिल्ली में कम से कम 10 हजार बसों की जरुरत है लेकिन मौजूद सिर्फ तीन हजार बसें ही हैं.

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दिल्ली में वाहन बड़ी समस्या बन गए हैं (File Photo)


>>केंद्र और दिल्ली सरकार को चीन की तर्ज पर नेशनल एयर क्वालिटी एक्शन प्लान लागू करना चाहिए. साल 2013 में बीजिंग की हवा भी दिल्ली की तरह सांस लेने लायक नहीं बची थी और विकास की दौड़ में बीजिंग प्रदूषण की राजधानी कहलाने लगी थी. लेकिन बीजिंग ने वार्निंग सिस्टम अपनाया और कठोर  कदम उठाकर प्रदूषण में 50 फीसदी की गिरावट दर्ज की.

>>बीजिंग की तर्ज पर ही दिल्ली में उन इलाकों में ऊंचे-ऊंचे एयर प्यूरीफायर बनाए जाएं जहां कि सबसे ज्यादा हवा प्रदूषित हो. ये एयर प्यूरीफायर हवा में मौजूद डस्ट पार्टिकल्स को साफ करने का काम करते हैं. साथ ही खास जगहों पर 500 मीटर चौड़े ग्रीन कॉरिडोर या बफर जोन बनाए जाएं और उसके आसपास किसी भी तरह का कंस्ट्रक्शन नहीं होने दिया जाए. उस कोरिडोर में ऑक्सीजन के लिए लाखों पेड़ लगाए जाने चाहिए.

>>दिल्ली में कंस्ट्रक्शन की वजह से हवा में डस्ट पार्टिकल में सबसे ज्यादा इजाफा होता है. कंस्ट्रक्शन में इस्तेमाल होने वाली निर्माण सामग्री को ढंक कर नहीं रखा जाता है. ऐसे में जरूरी है कि निर्माण सामग्री का इस्तेमाल ढंक कर किया जाए और उसे खुले ट्रकों में लाद कर न लाया जाए. साथ ही दिल्ली सरकार सड़कों पर उड़ती धूल को रोकने के लिए कंस्ट्रक्शन साइट पर पानी की बौछारें छोड़ने को अनिवार्य करे.

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>>दिल्ली में तकरीबन बीस हजार फैक्ट्रियां ऐसी चल रही हैं जिनकी वजह से दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है. जरूरत है कि ऐसी उन तमाम फैक्ट्रियों को बंद किया जाए जिनसे दिल्ली में प्रदूषण फैल रहा है.

>>खुले में कूड़ा जलाने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की जरुरत है. नरेला और बवाना जैसे औद्योगिक इलाकों में खुलेआम कूड़े के ढेर जलाए जाते हैं जिनसे दिल्ली की हवा में जहर घुलता है. यहां कठोर कानूनी कार्रवाई करने की जरूरत है.

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First published: November 6, 2019, 12:55 PM IST
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