'जाटलैंड' की जंग: क्या कामयाब होगी बीजेपी की ये रणनीति?

बीजेपी ने हरियाणा की आठ सामान्य सीटों में से छह पर गैर जाटों को लड़ाया है. सीएम मनोहरलाल खट्टर खुद सबसे बड़ा गैर जाट चेहरा हैं

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: May 12, 2019, 4:04 PM IST
'जाटलैंड' की जंग: क्या कामयाब होगी बीजेपी की ये रणनीति?
जाटलैंड में कांग्रेस ने जाट नेताओं पर ही दांव लगाया है!
ओम प्रकाश
ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: May 12, 2019, 4:04 PM IST
हरियाणा की सभी दस सीटों पर आज वोटिंग हो रही है. साल 2014 की मोदी लहर में बीजेपी ने सात सीटों पर कब्जा किया था. जबकि, यह प्रदेश कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था. इस बार भी पार्टी ने ऐसी रणनीति बनाई है कि कांग्रेस और यहां की क्षेत्रीय पार्टियों को मात दी जा सके. बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में यहां 'जींद उप चुनाव फार्मूला' लागू किया है. जिसके तहत उसने जाटों के क्षेत्र में गैर जाटों को टिकट देकर पोलराइजेशन की उम्मीद की हुई है. मनोहरलाल खट्टर के कार्यकाल में यह पहला लोकसभा चुनाव हो रहा है, जो खुद यहां की सियासत में सबसे बड़ा गैर जाट चेहरा हैं.

हरियाणा के वरिष्ठ पत्रकार नवीन धमीजा कहते हैं, “2014 में मनोहरलाल खट्टर को सीएम बनाने के बाद बीजेपी की छवि गैर जाट पॉलिटिक्स करने वाली पार्टी की बन गई है. ऐसे में खट्टर के सामने जाट बहुल सीट पर कमल खिलाने की सबसे बड़ी चुनौती है. ये चुनौती तब और बढ़ जाती है जब पार्टी के बड़े नेता दबी जुबान से गैरजाट की राजनीति करते नजर आते हैं. हालांकि, जाटों की पॉलिटिक्स करने वाली पार्टी इनेलो बिखर चुकी है.,ऐसे में बीजेपी का पुराना फार्मूला चल सकता है.” (ये भी पढ़ें: चुनावी चक्रव्यूह में फंसी हरियाणा के तीनों 'लालों' की नई पीढ़ी!)



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धमीजा कहते हैं, “जाट आरक्षण आंदोलन के बाद से ही हरियाणा जाट बनाम नॉन जाट वाली पॉलिटिक्स की प्रयोगशाला के तौर पर उभरने लगा था. हालांकि, बीजेपी ने जाट समाज से आने वाले सुभाष बराला को अपना प्रदेश अध्यक्ष बनाकर उन्हें भी साधने की कोशिश की हुई है. मनोहरलाल कैबिनेट में इसी समाज के कैप्टन अभिमन्यु और ओम प्रकाश धनकड़ को जगह मिली हुई है तो केंद्र में जाट समाज से बीरेंद्र सिंह मंत्री हैं. फिर भी बीजेपी की छवि गैर जाट पॉलिटिक्स करने वाली पार्टी की ही बनी हुई है.”

यह उसके टिकट वितरण में भी दिखा है. यहां की आठ सामान्य सीटों में से छह पर पार्टी ने गैर जाटों पर ही भरोसा जताया है. सिर्फ भिवानी-महेंद्रगढ़ और हिसार सीट पर उसने जाट प्रत्याशी उतारे हैं. उसने जाटलैंड में गैर जाट का कार्ड ही चला है. हरियाणा में रोहतक जाटों का गढ़ है. कांग्रेस, जन नायक जनता पार्टी और इनेलो ने यहां जाट प्रत्याशी उतारे हैं. लेकिन बीजेपी ने यहां अरविंद शर्मा के रूप में ब्राह्मण चेहरे पर दांव लगाया है.

इस सीट पर कांग्रेस ने अपने मौजूदा सांसद दीपेंद्र हुड्डा को उतारा है. जिनकी किस्मत आज ईवीएम में कैद हो रही है. वो लगातार 10 साल तक हरियाणा के सीएम रहे भूपेंद्र हुड्डा के बेटे हैं. इनेलो ने धर्मवीर फौजी और जननायक जनता पार्टी-आप गठबंधन ने प्रदीप देशवाल पर भरोसा किया है. बीजेपी छोड़कर सभी ने जाट प्रत्याशी पर दांव लगाया है. बीजेपी को उम्मीद है कि जाट वोट बंटेगा तो उसकी राह आसान हो जाएगी.
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इस सीट पर अब तक दो उप चुनावों को मिलाकर 18 बार लोकसभा इलेक्शन हुए हैं. जिसमें से 11 बार कांग्रेस जीती है. यह हुड्डा परिवार की पारंपरिक सीट कही जा सकती है. दीपेंद्र हुड्डा यहां से तीन बार सांसद बने हैं. चार बार भूपेंद्र हुड्डा ने भी यहां का प्रतिनिधित्व किया. दीपेंद्र के दादा रणवीर सिंह हुड्डा भी यहां से दो बार सांसद बने. ऐसे में देखना ये है कि क्या यहां बीजेपी की रणनीति कामयाब होगी?

जाट बहुल सोनीपत सीट पर भी बीजेपी ने गैर जाट कार्ड ही चला है. पार्टी ने अपने मौजूदा सांसद रमेश कौशिक को फिर मैदान में उतार दिया है. लेकिन उनकी मुश्किल कम नहीं है. कांग्रेस ने यहां अपने सबसे बड़े चेहरे भूपेंद्र सिंह हुड्डा को उतार दिया है जो रोहतक से चार बार सांसद रहे हैं. लगातार एक दशक तक मुख्यमंत्री रहे हैं. यहां एक और बड़ा नाम हैं दिग्विजय चौटाला. जो अपनी जननायक जनता पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं. उन्हें आम आदमी पार्टी का समर्थन है. इनेलो ने सुरेंद्र छिकारा को टिकट दी है. कुल मिलाकर बीजेपी को छोड़कर अन्य सभी महत्वपूर्ण दलों ने जाटों पर भरोसा किया है. यहां भी बीजेपी को यही उम्मीद है कि जाट वोट बंट जाएंगे और उसे इसका फायदा मिलेगा.

हालांकि, बीजेपी प्रवक्ता राजीव जेटली का कहना है कि उनकी पार्टी सबका साथ सबका विकास में विश्वास रखती है. सभी समाजों को साथ लेकर चलती है. पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष जाट है. तीन-तीन बड़े मंत्री हैं. इसलिए जाट समाज के लोग भी हमें वोट कर रहे हैं.

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