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हरियाणा विधानसभा चुनाव 2019: बीजेपी के बड़े जाट नेता क्यों साबित हुए फिसड्डी?

हरियाणा में क्यों बिगड़ी भाजपा के इन जाट नेताओं की हालत

हरियाणा में क्यों बिगड़ी भाजपा के इन जाट नेताओं की हालत

हरियाणा में कैप्टन अभिमन्यु भाजपा का सबसे बड़ा जाट चेहरा हैं. लेकिन नारनौंद सीट से वो पीछे चल रहे हैं. इस समुदाय में अभिमन्यु की अच्छी पैठ मानी जाती है, ऐसे में भाजपा ने उन्हें नारनौंद से टिकट देकर सभी समीकरणों को साधने की कोशिश की थी, पिछली बार वह इसी सीट से चुनाव जीते थे,

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    चंडीगढ़. हरियाणा विधानसभा चुनाव में इस बार भाजपा ने कई दिग्गज जाट नेताओं को मैदान में उतारा है. लेकिन शुरुआती रुझानों में इनकी हालत बिगड़ती नजर आ रह है. नारनौंद विधानसभा सीट से बीजेपी ने कैप्टन अभिमन्यु को मैदान में उतारा है. हरियाणा में कैप्टन अभिमन्यु भाजपा का सबसे बड़ा जाट चेहरा हैं. लेकिन नारनौंद सीट से वो पीछे चल रहे हैं. इस समुदाय में अभिमन्यु की अच्छी पैठ मानी जाती है, ऐसे में भाजपा ने उन्हें नारनौंद से टिकट देकर सभी समीकरणों को साधने की कोशिश की थी, पिछली बार वह इसी सीट से चुनाव जीते थे.

    भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष और जाट नेता सुभाष बराला भी शुरुआती रुझानों में पिछड़ते नजर आ रहे हैं. उनपर खुद की जीत के साथ राज्य में 75 से अधिक सीटें जिताने के लक्ष्य को अंजाम तक पहुंचाने का दोहरा दबाव था. बराला सिरसा लोकसभा क्षेत्र की नौ विधानसभा सीटों में भाजपा के इकलौते विधायक हैं, जिन्हें 2014 में जीत हासिल हुई थी. वह टोहाना सीट से चौथी बार मैदान में हैं. जाट समुदाय में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है.

    खट्टर सरकार से नाराज जाट

    हरियाणा के जाट और दलित मौजूदा खट्टर सरकार से नाराज बताए जा रहे हैं. लोग अनुच्छेद 370 और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर केंद्र सरकार के साथ तो हैं लेकिन हरियाणा में यह वोट में तब्दील नहीं हो पाया. हरियाणा के मतदाता मोदी सरकार से खुश हैं लेकिन प्रदेश सरकार से उनकी नाराजगी है. इसलिए बीजेपी हरियाणा में सत्ता विरोधी लहर का सामना करती दिख रही है. बीजेपी ने जाट फैक्टर को देखते हुए टिकट वितरण नहीं किया, जिसका असर उसे सीटों के घाटे के रूप में दिख सकता है.

    जाटलैंड की कौन-सी सीटें हैं महत्वपूर्ण

    हरियाणा में रोहतक, सोनीपत, पानीपत, जींद, कैथल, सिरसा, झज्जर, फतेहाबाद, हिसार और भिवानी जिले की करीब 30 विधानसभा सीटों पर जाटों का अच्छा प्रभाव है. इसी के चलते इस इलाके को जाटलैंड कहा जाता है. यहां की सीटों पर जाट समुदाय हार-जीत का फैसला करते हैं. जाटलैंड की इन 30 सीटों पर बीजेपी के बड़े दिग्गजों को भी कड़ी चुनौती मिली है.

     

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