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चंडीगढ़ के ‘लंगर बाबा’ जगदीश अहूजा का निधन, PGI के बाहर 21 सालों से लगा रहे थे लंगर

चंडीगढ़ के ‘लंगर बाबा’ जगदीश अहूजा का निधन, PGI के बाहर 21 सालों से लगा रहे थे लंगर

चंडीगढ़ के लंगर बाबा का निधन

चंडीगढ़ के लंगर बाबा का निधन

जगदीश आहूजा भारत-पाकिसतान के बंटवारे के महज 12 साल की उम्र में पंजाब के मानसा शहर आए थे. जिंदा रहने के लिए रेलवे स्टेशन पर उन्हें नमकीन दाल बेचनी पड़ी, ताकि उन पैसों से खाना खाया जा सके और गुजारा हो सके. कुछ समय बाद वह पटियाला चले गए और गुड़ और फल बेचकर जिंदगी चलाने लगे और फिर 1950 के बाद करीब 21 साल की उम्र में आहूजा चंडीगढ़ आ गए थे.

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    चंडीगढ़. पीजीआई के बाहर पिछले 21 सालों से लंगर लगाने वाले जगदीश अहूजा (Jagdish Ahuja) का सोमवार को निधन (Death) हो गया. जगदीश अहूजा लंगर बाबा (Langar Baba) के नाम से जाने जाते थे. जगदीश अहूजा करीब पिछले 21 सालों से pgi के बाहर लंगर लगा रहे थे. उन्हें 2020 में राष्ट्रपति से पद्मश्री अवार्ड भी मिला था. वो रोजाना करीब 4 से 5000 लोगों को लंगर खिलाते थे.

    बता दें कि पीजीआई चंडीगढ़ के सामने जगदीश आहूजा लगातार लंगर लगाते आ रहे थे. इसके लिए उन्होंने अपनी कई प्रॉपर्टी तक बेच दी थी. उनका कहना है कि लंगर सेवा करके उन्हें काफी सुकून मिलता है. पटियाला में उन्होंने गुड़ और फल बेचकर अपना जीवनयापन शुरू किया था. 1956 में लगभग 21 साल की उम्र में चंडीगढ़ आ गए. उस समय चंडीगढ़ को देश का पहला योजनाबद्ध शहर बनाया जा रहा था. यहां आकर उन्होंने एक फल की रेहड़ी किराए पर लेकर केले बेचना शुरू किया.

    चंडीगढ़ में एक रेहड़ी से शुरुआत करने वाले लंगर बाबा के जीवन का सफर आसान नहीं रहा. पीजीआई के बाहर लगने वाले पूरे लंगर की देखरेख खुद करते थे. कैंसर होने से पहले वह खुद गाड़ी में दो से तीन हजार लोगों को खाना खिलाते रहे. आहूजा ने कड़े संघर्ष से चंडीगढ़ और आसपास काफी प्रॉपर्टी बनाई, लेकिन लंगर के लिए अपनी कोठी तक बेच दी.

    कोरोना काल में भी प्रशासन के निर्देशों के कारण सिर्फ सात दिन पीजीआइ के बाहर लंगर को रोकना पड़ा था, आहूजा की इच्छा थी कि वह चंडीगढ़ में जरुरतमंदों के लिए एक सराय का निर्माण करवा सकें, जिसके लिए उन्होंने चंडीगढ़ प्रशासन से जमीन देने की मांग की हुई थी.

    लंगर वाले बाबा ने एक बार बताया था कि जब वो लोगों को भूखे पेट सड़क पर देखता हैं तो बैचेनी होने लगती थी. अपने बेटे के आठवें जन्मदिन पर मैंने 100 से 150 बच्चों को खाना खिलाना शुरू किया. लगभग 18 साल तक सेक्टर-23 में घर के पास लंगर चलाया. उसके बाद 2001 से पीजीआई के बाहर हर दिन लंगर लगाना शुरू कर दिया था.

    Tags: Chandigarh news, Pgi

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