हरियाणा की 10 में से 9 सीटों पर बीजेपी-कांग्रेस में सीधी लड़ाई, क्षेत्रीय दलों का निकला दम !
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हरियाणा की 10 में से 9 सीटों पर बीजेपी-कांग्रेस में सीधी लड़ाई, क्षेत्रीय दलों का निकला दम !
फाइल फोटो

केवल हिसार सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय है. राज्य गठन के बाद 52 साल में यह पहला मौका होगा जब हरियाणा में क्षेत्रीय क्षत्रपों का अस्तित्व संकट में है.

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हरियाणा में लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व संकट में दिखाई पड़ रहा है. राज्य की 10 लोकसभा सीटों में 9 पर बीजेपी-कांग्रेस में सीधी टक्कर देखने को मिल रही है. केवल हिसार सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय है. अपने निर्माण के बाद 52 साल में यह पहला मौका होगा जब हरियाणा में क्षेत्रीय क्षत्रपों का अस्तित्व संकट में है. साल 2014 के मोदी लहर में बीजेपी ने हरियाणा की सात सीटों पर विजय पताका फहराया था. हालांकि, उस वक्‍त बीजेपी का हरियाणा जनहित कांग्रेस के साथ गठबंधन था, जिसका अब कांग्रेस में विलय हो चुका है. पिछले लोकसभा चुनाव में इनेलो ने दो और कांग्रेस ने एक सीट पर जीत हासिल की थी.

बीजेपी इस बार हरियाणा की सभी सीटें जीतना चाहती है. दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी फिलहाल 2 सीटों पर आगे है. 6 सीटों पर उसका नजदीकी मुकाबला है, जबकि सोनीपत और रोहतक में कांग्रेस आगे है. तीन सीटों पर प्रत्याशियों का विरोध बीजेपी के लिए चुनौती बना हुआ है. कांग्रेस ने भी मजबूत कैंडिडेट उतारे हैं. हरियाणा में 25 फीसदी जाट हैं जिनका चार सीटों पर सीधा प्रभाव है.

12 मई को है चुनाव-



हरियाणा में मतदान लोकसभा चुनाव के छठे चरण यानी 12 मई को है. बीजेपी के प्रचार की कमान खुद मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर संभाल रहे हैं. जबकि कांग्रेस के दिग्गज अपनी-अपनी सीट तक सीमित हैं. वे पर्सनल वोट बैंक के बूते लड़ रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्‌डा बाकी सीटों पर प्रभाव डाल सकते थे, लेकिन सोनीपत से टिकट मिलने की वजह से वे एक सीट तक ही सीमित रह गए हैं. वे अपनी जीत के साथ रोहतक में कड़े मुकाबले में फंसे बेटे दीपेंद्र के लिए भी जोर लगा रहे हैं. इस दौरान बीजेपी के पक्ष में तीन फैक्टर काम कर रहे हैं. पहला- आरक्षण आंदोलन के बाद समाज को जाट-नॉन जाट के तौर पर देखा जाना. दूसरा- सीएम की बेदाग छवि और नौकरियों में पारदर्शिता. तीसरा- पीएम मोदी का चेहरा.
इनेलो में टूट का फायदा कांग्रेस को!

रिपोर्ट्स के मुताबिक बीजेपी को सबसे ज्यादा चुनौती सोनीपत और रोहतक में है, जबकि भिवानी और अंबाला में बीजेपी प्रत्याशियों का अंदरखाने में विरोध हो रहा है. इन सीटों पर कांग्रेस बीजेपी को टक्कर दे रही है. सिरसा में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर को डेरे का साथ मिला तो नतीजा चौंकाने वाला हो सकता है. इनेलो की टूट का फायदा कांग्रेस को मिल रहा है. हुड्डा की इच्छा दिल्ली से ज्यादा चंडीगढ़ पहुंचने की है. क्योंकि अक्टूबर में राज्य में विधानसभा चुनाव भी होने हैं. इसलिए वे ‘अपना राज’ लाने की बात याद दिलाना नहीं भूल रहे. मुख्यमंत्री खट्‌टर पंजाबी लीडर की पहचान बना चुके हैं. अब वे नॉन जाट चेहरा बनने के लिए जुटे हैं. लोकसभा का प्रदर्शन ही दूसरी बार मुख्यमंत्री की उनकी कुर्सी पक्की करेगा. शायद यही वजह है कि उनके निशाने पर भूपेंद्र और दीपेंद्र हुड्‌डा सबसे ज्यादा हैं. सभाओं में वे कहते हैं- थाम इस बाबू-बेटे नै सबक सिखा दो, बाकी नै में देख ल्यूंगा.

चुनावी पंडितों का मानना है कि हरियाणा में देहात और शहरी का फर्क जीत-हार का फैसला करता है. बीजेपी शहरी पार्टी के तौर पर जानी जाती है, इसलिए अब बीजेपी गांवों में जनाधार बढ़ाने की जुगत में है. वहीं कांग्रेस जाटों के अलावा परंपरागत वोट बैंक को साधने में लगी है. इनेलो और जजपा में वर्चस्व की लड़ाई है. स्वर्गीय देवीलाल के 3 पड़पोते, बंसीलाल की एक पोती, भजनलाल का एक पोता, बीरेंद्रसिंह और भूपेंद्र हुड्डा के एक-एक बेटे चुनाव मैदान में है. इस बार लहर और ‘जहर’ जैसे जुमले भी हवा में तैर रहे हैं. सबकी निगाहें रोहतक, सोनीपत और हिसार पर टिकी हैं. ये सीटें राजनीतिक परिवारों का भविष्य तय करेंगी. रिपोर्ट के मुताबिक गुड़गांव में केंद्रीय राज्यमंत्री राव इंद्रजीत बढ़त बनाते दिख रहे हैं. फरीदाबाद में केंद्रीय राज्यमंत्री कृष्णपाल गुर्जर को कांग्रेस के अवतारसिंह भड़ाना से कड़ी टक्कर मिल रही है.

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