ANALYSIS: इस वजह से बिगड़ गई कांग्रेस-आप की बात, एक गठबंधन जो हो ना सका

अब ये पूरी तरह से साफ है, ये इस चुनाव में एक ऐसे गठबंधन के तौर पर याद किया जाएगा, जिसकी चर्चा तो बहुत हुई पर जो हो ना सके. बीजेपी का 2019 में चुनावी नारा है, "मोदी है तो मुमकिन है" लेकिन ये नारा भी इस संभावित गठबंधन को जोड़ ना सका.

News18Hindi
Updated: April 22, 2019, 11:35 AM IST
ANALYSIS: इस वजह से बिगड़ गई कांग्रेस-आप की बात, एक गठबंधन जो हो ना सका
हो न सका आप-कांग्रेस का गठबंधन
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Updated: April 22, 2019, 11:35 AM IST
विक्रांत यादव 

2019 के चुनाव के मद्देनजर अलग-अलग राज्यों में कई गठबंधन हुए, लेकिन इस चुनाव को एक ऐसे गठबंधन के लिए भी याद किया जाएगा, जिसकी चर्चा तो खूब हुई लेकिन वो गठबंधन हो ना सका. जी हां ये गठबंधन था, देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस और दिल्ली से उसका सूपड़ा साफ करने वाली सबसे नई पार्टी आम आदमी पार्टी के बीच. चुनाव शुरू होने से पहले से शुरू हुई इन दोनों के बीच गठबंधन की चर्चा चुनाव के दो चरण का मतदान होने तक चलती रही. अब ये पूरी तरह से साफ हो चुका है कि ये गठबंधन नहीं होगा.



दरअसल चुनाव की तारीखों का ऐलान होने से पहले ही ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू, शरद पवार, शरद यादव सरीखे मोदी-विरोधी नेताओं ने इस गठबंधन के लिए कोशिश शुरू कर दी थी. शुरुआत में आप और कांग्रेस दोनों ने ही इस तरह के गठबंधन के प्रति अनिच्छा जाहिर की. लेकिन तमाम राउंड की बातचीत के बाद दोनों दलों के नेताओं को ये समझाया गया कि 2019 का चुनाव किसी हवा या लहर का चुनाव नहीं है, ये अर्थमेटिक का चुनाव है.

राजनीतिक दलों की तरह भी वोटर भी मोदी-समर्थक और मोदी-विरोधी के बीच यानी दो धुरी में बंटे हुए हैं. अगर मोदी-विरोधी राजनीतिक दल एक नया हुए, तो मोदी-विरोधी वोट बंट जाएंगे और उसका सीधा फायदा पीएम मोदी को हो जाएगा. कई राऊंड की बातचीत के बाद इस मुहिम में बड़ी सफलता तब मिलती दिखी जब शरद पवार के घर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल की मुलाकात हुई. दोनों दलों के बीच बर्फ पिघलती हुई दिखाई देने लगी और इसके बाद दोनों दलों के दूसरी पंक्ति के नेताओ के बीच गठबंधन की चर्चा शुरू हो गई.



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आप शुरुआत से चाहती थी कि अगर गठबंधन हो तो वो पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, गोवा और चंडीगढ़ की 33 सीटों पर हो. इन सभी जगह आप का प्रभाव था और उसे लगता था कि अगर सभी जगह मिलकर लड़ेंगे तो मोदी-विरोधी वोटों को 33 सीटों पर बंटने से रोका जा सकेगा. हालांकि पंजाब में कांग्रेस की जीत के सूत्रधार सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने साफ कर दिया कि वो किसी भी सूरत में आप से समझौता नहीं करेंगे. गोवा को लेकर भी बात नहीं बनी. इसके बाद बातचीत शुरू हुई हरियाणा और दिल्ली को लेकर.

आप ने फॉर्मूला दिया कि हरियाणा में आईएलएलडी का सारा वोट बैंक नई बनी पार्टी जेजेपी में स्थानांतरित हो गया है, लिहाजा कांग्रेस, आप और जेजेपी मिलकर चुनाव लड़े. ये तीनों मिलकर बीजेपी को राज्य में हरा सकते हैं. उनके मुताबिक ये बात हाल में हुए जींद के उपचुनाव में साबित हो गई थी. इस उपचुनाव में बीजेपी को करीब 50 हज़ार और अलग-अलग चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस और जेजेपी को करीब 60 हज़ार वोट मिले थे. लेकिन हरियाणा की राज्य इकाई भी गठबंधन और खासतौर से जेजेपी को साथ लेने को तैयार नहीं थी. कांग्रेस का कहना था कि वो राष्ट्रीय पार्टी है और वो हरियाणा की आधी सीट जेजेपी और आप को नहीं दे सकती.

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कई राउंड की बातचीत के बाद आप ने कहा कि वो राज्य में एक सीट पर लड़ने को तैयार है, दो सीट जेजेपी को दे दी जाए और सात पर कांग्रेस लड़े. इसके बदले में कांग्रेस को दिल्ली में 3 सीट दी जा सकती हैं, जहां आप 4 सीटों पर लड़ने को तैयार हो गई. हालांकि इस पर भी बात नहीं बनी, शनिवार यानि 20 अप्रैल की देर शाम तक आप नेताओं को ये समझ आ गया कि कांग्रेस सिर्फ दिल्ली में समझौता चाहती है, वो भी 4/3 के फार्मूले पर और इसके बदले में वो कहीं भी सीट देने को तैयार नहीं है. आप हाई-कमान के मुताबिक इस फार्मूले से उन्हें किसी तरह का फायदा दिखाई नहीं दे रहा था. लिहाजा आप ने  गठबंधन की चर्चा को पूरी तरह से खत्म कर आगे बढ़ने का फैसला किया गया. आप और जेजेपी ने रविवार यानि 21 अप्रैल को अपने हरियाणा के कुछ उम्मीदवारों का भी ऐलान कर दिया.

अब ये पूरी तरह से साफ है, ये इस चुनाव में एक ऐसे गठबंधन के तौर पर याद किया जाएगा, जिसकी चर्चा तो बहुत हुई पर जो हो ना सके. बीजेपी का 2019 में चुनावी नारा है, "मोदी है तो मुमकिन है" लेकिन ये नारा भी इस संभावित गठबंधन को जोड़ ना सका.

 
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