भारतीय राजनीति में महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं सुषमा स्वराज

बीजेपी की दिवंगत नेता सुषमा स्वराज भारतीय राजनीति में महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं. राजनीति में प्रवेश से लेकर विदाई तक उनके अटल विश्वास की कहानी कहती है.

News18 Haryana
Updated: August 7, 2019, 11:29 AM IST
भारतीय राजनीति में महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं सुषमा स्वराज
बीजेपी की दिवंगत नेता सुषमा स्वराज (फाइल फोटो)
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Updated: August 7, 2019, 11:29 AM IST
हरियाणा के अंबाला की रहने वाली बीजेपी की दिवंगत नेता सुषमा स्वराज भारतीय राजनीति में महिलाओं के लिए एक प्रेरणा स्रोत हैं. उनका पूरा जीवन, समर्पण, निष्ठा और महिला उत्थान का जीता-जागता उदाहरण है. 67 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाली सुषमा स्वराज ने कई राजनीतिक मुकाम हासिल किए. राजनीति में एंट्री से लेकर विदाई तक उनके अटल विश्वास की कहानी कहती है.

फाइल


जॉर्ज फर्नांडीज को जिताया चुनाव 

बहुत कम लोग जानते हैं कि इमरजेंसी के दौरान सुषमा स्वराज ने सिर्फ एक तस्वीर दिखाकर जॉर्ज फर्नांडीज को चुनाव जिताया था. ये तस्वीर जॉर्ज फर्नांडीज की गिरफ्तार के समय की थी. हाथों में हथकड़ी में जकड़े हुए 1977 में इमरजेंसी के दिनों में बड़ौदा डायनामाइट केस में फंसे जार्ज फर्नांडीज ने जेल में ही रहकर मुज़फ़्फरपुर से चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया था. चुनाव प्रचार पहले ही जनता पार्टी के लिए बड़ी चुनौती था तब वो सुषमा स्वराज ही थीं जिन्होंने हथकड़ियों में जकड़ी जॉर्ज फर्नांडीज की तस्वीर दिखा कर पूरे क्षेत्र में प्रचार किया था. बहुत कुछ कहती इस तस्वीर ने और सुषमा के ओजस्वी भाषणों ने जैसे सब कुछ बदलकर रख दिया था.जब चुनाव परिणाम आया तो जॉर्ज दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद थे.

दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री 

सुषमा स्वराज के नाम कई रिकार्ड दर्ज़ हैं. सुषमा बीजेपी की राष्ट्रीय प्रवक्ता बनने वाली पहली महिला थीं. वे बीजेपी में पहली महिला महासचिव भी रहीं. सुषमा कैबिनेट मंत्री बनने वाली भी बीजेपी की पहली महिला थीं. वे दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री रहीं. साल 2009 में लोकसभा में विपक्ष की पहली महिला नेता बनीं. भारत की संसद में सर्वश्रेष्ठ सांसद का पुरस्कार पाने वाली पहली महिला भी थीं. उन्हें ये पुरस्कार दो बार दिया गया.

सहजता से चुनौतियां स्वीकार करने वाली 
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सुषमा को कभी भी बदलावों से डर नहीं लगा, बल्कि उनके सहज स्वभाव में ही चुनौतियां स्वीकारना था. 1996 में सोनिया गांधी की राजनीति में एंट्री के बाद 1999 में उन्हें कर्नाटक के बेल्लारी से चुनावी मैदान में उतारा गया. बीजेपी ने जब गांधी परिवार की नई राजनीतिक शाखा को उगते देखा तो एक बार फिर सुषमा स्वराज पर भरोसा जताया और उन्हें सोनिया गांधी के खिलाफ बेल्लारी से उतार दिया. उस वक्त सोनिया बमुश्किल हिंदी के शब्दों का उच्चारण कर पाती थीं. उनके सामने थीं तेज तर्रार और ओजस्वी वक्ता सुषमा स्वराज लेकिन सुषमा ने तीखे शब्दों का इस्तेमाल करने के बजाय कन्नड़ में भाषण देना शुरू कर दिया. में जीत सोनिया गांधी के हिस्से जरूर आई लेकिन जनता के बीच उनकी भाषा के साथ जाने का प्यार सुषमा के हिस्से आया.

सूचना प्रसारण में क्रांतिकारी बदलाव किए 

सुषमा पर पार्टी को इतना भरोसा था कि 1996 में 13 दिन की वाजपेयी सरकार में उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी सौंपी गई. अगली बार सत्ता में वापस लौटने पर पार्टी ने फिर से उन्हें इसी जिम्मेदारी को सौंपा. तब सुषमा स्वराज ने दो ऐतिहासिक निर्णय लिए थे. एक था फिल्मी दुनिया को इंडस्ट्री का नाम देना और दूसरा था लोकसभा की कार्यवाही को दूरदर्शन पर लाइव प्रसारित करना. ये दोनों ही क्रांतिकारी फैसले थे.

खुद चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान किया 

मध्यप्रदेश के विदिशा से दो बार लगातार सांसद रहने के बाद नवंबर 2018 में सुषमा स्वराज ने ये ऐलान किया था कि वो 2019 का चुनाव नहीं लड़ेंगी. जेपी आंदोलन के बाद सुषमा का रुझान राजनीति की तरफ बढ़ा. 25 साल की उम्र में राजनीति में कदम रखा. कानून की पढ़ाई पूरी कर चुकीं सुषमा के राजनीतिक गुरु लाल कृष्ण आडवाणी थे.

7 बार लोकसभा, 3 बार विधानसभा चुनाव जीतीं 

बीते चार दशकों में सुषमा 11 बार चुनाव लड़ीं. तीन बार विधानसभा का चुनाव लड़ीं और जीतीं. सात बार सांसद रहीं.  सुषमा स्वराज मूलरूप से हरियाणा की रहने वालीं थीं. हरियाणा का अंबाला शहर उनकी जन्मस्थली है. देश की राजनीति में नाम कमा चुकी अंबाला की बेटी सुषमा स्वराज के लिए हरियाणा की राजनीति का अनुभव अच्छा नहीं रहा.

सच को सहज भाव से स्वीकर किया 

इस साल 30 मई की शाम राष्ट्रपति भवन के बाहर नरेंद्र मोदी का शपथ ग्रहण समारोह शुरू हुआ. तब ज़्यादातर लोगों की निगाहें अमित शाह और सुषमा स्वराज पर टिकी थीं.अमित शाह पहले ही मंच पर पहुंच चुके थे. सुषमा स्वराज जब सभी का अभिवादन करती हुईं दर्शक दीर्घा में बैठीं तो ये साफ हो गया कि अब वो मोदी सरकार का हिस्सा नहीं होंगी.


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First published: August 7, 2019, 9:44 AM IST
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