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हरियाणा के सबक: तिकड़म, आदर्श या चमत्‍कार नहीं, कांग्रेस को चाहिए जमीनी राजनीति

Piyush Babele | News18Hindi
Updated: October 24, 2019, 4:50 PM IST
हरियाणा के सबक: तिकड़म, आदर्श या चमत्‍कार नहीं, कांग्रेस को चाहिए जमीनी राजनीति
हुड्डा को बमुश्किल एक महीने पहले कमान दी गई. और वे हरियाणा में कांग्रेस को मुकाबले में ले आए.

दो बार मुख्‍यमंत्री रहे भूपेंद्र सिंह हुड्डा (Bhupinder Singh Hooda) ने अपने जीवन के सबसे खराब चुनाव में सबसे अच्‍छा प्रदर्शन करके दिखाया है. कांग्रेस के इस प्रदर्शन के बाद कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्‍व को एक बार फिर सोचना होगा कि उसके तपे हुए नेताओं को पारंपरिक राजनीति के साथ चलना है या फिर राहुल गांधी के उस आदर्शवाद के साथ चलना है, जो चमत्‍कारों की उम्‍मीद लगाता है. ​

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  • Last Updated: October 24, 2019, 4:50 PM IST
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हरियाणा में सरकार किसकी बनेगी अभी यह दावे से कोई नहीं कह सकता. लेकिन इतना सब कह सकते हैं कि दो बार मुख्‍यमंत्री रहे भूपेंद्र सिंह हुड्डा (Bhupinder Singh Hooda) ने अपने जीवन के सबसे खराब चुनाव में सबसे अच्‍छा प्रदर्शन करके दिखाया है. कांग्रेस के इस प्रदर्शन के बाद कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्‍व को एक बार फिर सोचना होगा कि उसके तपे हुए नेताओं को पारंपरिक राजनीति के साथ चलना है या फिर राहुल गांधी के उस आदर्शवाद के साथ चलना है, जो चमत्‍कारों की उम्‍मीद लगाता है. हुड्डा के प्रदर्शन और उसके पहले जिन चुनावों में कांग्रेस ने अच्‍छा किया, उनसे यही पता चलता है कि पुराने चावलों पर भरोसा करने पर ही कांग्रेस स्‍वादिष्‍ट खीर बना पाती है. नातजुर्बेकार नेतृत्‍व कई बार मामले को बिगाड़ देता है.

अगर हरियाणा पर नजर डालें, तो 2014 विधानसभा चुनाव की जबरदस्‍त हार के बाद जब राहुल गांधी कांग्रेस के अध्‍यक्ष बने, तो उन्‍होंने भूपेंद्र सिंह हुड्डा को किनारे करना शुरू किया. राहुल ने दलित तबके से आने वाले युवा और तेजतर्रार नेता अशोक तंवर (Ashok Tanwar) को अध्‍यक्ष बनाया. तंवर को अध्‍यक्ष बनाने का फैसला काफी क्रांतिकारी था. एक तरफ वह जाटलैंड में एक दलित को पार्टी का चेहरा बना रहे थे, तो दूसरी तरफ युवाओं को मौका दे रहे थे. राहुल गांधी इसी तरह का काम पहले सचिन पायलट को राजस्‍थान में प्रदेश अध्‍यक्ष बनाकर और मध्‍य प्रदेश में ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया को आगे करके कर चुके थे.

युवा जोश वाली दवाई भाजपा को तो सूट करती है, कांग्रेस को नहीं
युवाओं को आगे बढ़कर चमत्‍कार की उम्‍मीद पालने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते युवाओं में वह सारा हुनर हो, जो पुराने नेताओं में भी होता है. राहुल यह काम शायद इसलिए भी कर रहे थे कि भाजपा (BJP) में अमित शाह (Amit Shah) बार बार पुराने लोगों को घर बैठाकर नए लोगों को मौका देते हैं और इसमें कामयाब भी रहते हैं. शाह के युवा जोश वाली दवाई भाजपा को तो सूट करती है, लेकिन कांग्रेस को यह कम ही हजम हुई.

पुराना नेतृत्व कांग्रेस को जीत दिलाता है
वहीं पुराने नेताओं के साथ चलकर कांग्रेस को फायदा ही हुआ है. अगर पीछे मुड़कर देखें तो 2018 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने यही किया था. राजस्‍थान में पार्टी को अशोक गहलोत के नेतृत्‍व में जीत मिली, तो मध्‍य प्रदेश में कमलनाथ ने सत्‍ता दिलाई. इन दोनों जगहों पर पायलट और सिंधिया नाराज हुए, लेकिन अंतत: मना लिए गए. छत्‍तीसगढ़ में पार्टी को पुराने नेताओं को आगे करने की जरूरत नहीं थी, क्‍योंकि वहां 2013 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी का तकरीबन सारा नेतृत्‍व नक्‍सली हमले में मारा जा चुका था. अजीत जोगी नई पार्टी बना चुके थे. ऐसे में नए नेतृत्‍व के लिए बनी जगह में भूपेश बघेल ने अच्‍छा काम किया.

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जो काम इन तीन राज्‍यों में हुआ था, वही काम पंजाब में भी 2017 में हुआ था. बल्कि पंजाब का मामला तो बहुत हद तक हरियाणा से मेल खाता है. जिस तरह हरियाणा में हुड्डा किनारे किए जा रहे थे उसी तरह कैप्‍टन अम‍रिंदर सिंह पंजाब में किनारे थे. उनके ऊपर भी बिना पसंद का प्रदेश अध्‍यक्ष थोपा गया था और हरियाणा में भी यही किया गया. विधानसभा चुनाव से पहले कैप्‍टन भी पार्टी छोड़ने तक का दबाव बनाने लगे थे, जैसा कि हुड्डा को करना पड़ा.

बस फर्क यह था कि कैप्‍टन को चुनाव से कम से कम छह महीने पहले पंजाब की कमान मिल गई थी, वहीं हुड्डा को बमुश्किल एक महीने पहले कमान दी गई. छह महीने में कैप्‍टन ने अपना काम कर लिया और प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई, हुड्डा को महीनाभर मिला और वे मुकाबले में आ सके.

गहलोत,  कैप्‍टन और हुड्डा में क्‍या समानता 
यहां सवाल यह है कि गहलोत, कमलनाथ, कैप्‍टन और हुड्डा में क्‍या समानता है और वे क्‍यों युवाओं से बेहतर साबित हुए. तो इसकी वजह यह है कि भारतीय राजनीति जितनी शब्‍दों और कैमरे के सामने होती है, उससे कहीं अधिक मेल मिलाप और धैर्य से होती है. कौन कितना जज़्ब कर सकता है और कितने अधिक लोगों को अपने साथ ला सकता है यह सबसे महत्‍वपूर्ण हो जाता है. इस राजनीति में उत्‍साही आदर्शवाद से ज्‍यादा जरूरत होती है जमीनी समझौतावाद की. इसके अलावा पहली बात यह बनी ही रहती है कि राज्‍य के नेताओं और जनता से नेता का कितना संपर्क है.

अगर कमलनाथ को छोड़ दें, तो ये बाकी तीनों नेता अपने राज्‍य की जनता से भी जुड़े हैं और हर जिले-तहसील में उनके लोग हैं. जब हवाएं प्रतिकूल होती हैं तब ये लोग अपने लोगों को जोड़े रहते हैं और चुनावी हार बरदाश्‍त कर लेते हैं, वहीं जब माहौल अनुकूल होता है तो जनता को अपने साथ लाकर जीत का सिलसिला शुरू करते हैं. यह करते समय वे जाति के समीकरण, धर्म की गांठें, स्‍थानीय नेताओं के मान-अपमान और मुंहजोर कार्यकर्ताओं की लगाम खींचना जानते हैं. राजनीति ऐसे ही चलती है. खासकर वह राजनीति जिसके पास हिंदुत्‍व जैसा आक्रामक नारा न हो और न जिसके पास पाकिस्‍तान को हर समय धूल चटा देने की ललकार हो.

स्थानीय छवि का मिलता है फायदा
इन नेताओं की एक खासियत यह भी है कि इनकी स्‍थानीय छवि है. राज्‍य के लोग इन्‍हें चाहते हैं. जब हालात ऐसे बनते हैं कि राज्‍य में सत्‍ताधारी पार्टी से लोगों का मोहभंग होता है तो वे इन्‍हें विकल्‍प के तौर पर देखते हैं. चूंकि लोकसभा चुनाव में वोट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर पड़ा था, जिनसे इनकी तुलना या मुकाबला नहीं था, इसलिए जनता ने विकल्‍पहीनता महसूस की. दूसरी तरफ राज्‍य के मुख्‍यमंत्री इतने कद्दावर नहीं हैं कि हरियाणा के लोग हुड्डा को विकल्‍प के तौर पर न देख सकें.

हुड्डा ने जातिगत समीकरणों को तरीके से साधा
इस विकल्‍प के साथ ही हुड्डा ने जातिगत समीकरणों को तरीके से साधा. अगर भाजपा ने गैर जाट राजनीति को हरियाणा में पनपाया था तो हुड्डा ठीक इसके उल्टे चले. उन्‍होंने इस चुनाव में जाट, जाटव और मुस्लिम का दांव चला. ये तीनों जातियां बीजेपी से नाराज थीं. हुड्डा ने इन्‍हें एक सूत्र में पिरोया और पार्टी के प्रदर्शन को बीजेपी के मुकाबले में ले आए. इस प्रयोग की कामयाबी को इस बात से समझा जा सकता है कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 60 फीसदी से ऊपर वोट मिले थे जो अब 35 फीसदी के पास आते दिख रहे हैं.

कांग्रेस को क्षत्रपों को मजबूत करके करने के बारे में सोचना होगा
यानी हुड्डा ने विशुद्ध रूप से जनता के बीच की राजनीति की, जो सिर्फ जमीन पर हल चलाने में यकीन करती है, इसमें चमत्‍कार का आसरा नहीं लिया जाता. अब जरूरत इस बात की है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्‍व भी इस बात को समझे. अपने क्षत्रपों को जमीन पर अकेला छोड़ने के बजाय अगर पार्टी सबको एक करने में और केंद्र से मदद देने में लगे तो हालात सुधर सकते हैं. हुड्डा के लिए रैली करने न तो सोनिया गांधी जा सकीं, न ही राहुल या प्रियंका. हुड्डा को खुद इतना कम समय मिला कि वे हर जिले में नहीं जा पाए. अब जब कांग्रेस के पास इंदिरा गांधी या नरेंद्र मोदी जैसा करिश्‍माई नेता नहीं है तो आलाकमान को क्षत्रपों को मजबूत करके पार्टी को मजबूत करने के बारे में सोचना होगा. सोनिया गांधी के लिए यह नया काम नहीं है. 1999 में जब वह कांग्रेस की कमांडर बनीं थीं तब भी उन्‍होंने यही काम किया था. पुराने नेताओं के साथ ही नए नेता सींचे थे और कांग्रेस को सत्‍ता में पहुंचा दिया था. वक्‍त की शायद फिर यही जरूरत है. ​

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First published: October 24, 2019, 4:26 PM IST
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