मानवीय गरिमा और सम्‍मान के साथ पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा करता है नया ट्रैफिकिंग बिल

News18Hindi
Updated: December 19, 2018, 11:53 AM IST
मानवीय गरिमा और सम्‍मान के साथ पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा करता है नया ट्रैफिकिंग बिल
प्रतिकात्मक तस्वीर
News18Hindi
Updated: December 19, 2018, 11:53 AM IST
ट्रैफिकिंग इन पर्सन्‍स (प्रीवेंशन, प्रोटेक्‍शन एंड रीहैबिलिटेशन) बिल, 2018 को जुलाई में ही लोकसभा ने पारित कर दिया था. अब इसका राज्‍यसभा से पारित होना शेष है. यह नया बिल महिलाओं और बच्चों के संरक्षण, सुरक्षा और पुनर्वास के विशेष प्रावधान तो करता ही है, साथ ही इसके जरिए ट्रैफिकिंग के जो शिकार रहे हैं, उनके अधिकारों की रक्षा पूरी मानवीय गरिमा और सम्‍मान के साथ किए जाने की बात करता है.

इसकी खासियत यह है कि इसमें ‘कल्‍याण’ ‘दया’ और ‘खैरात’ वाली बात नहीं है, बल्कि अधिकार वाली बात है. ऐसा पहली बार होने जा रहा है जब इसके माध्‍यम से संविधान की आत्‍मा की रक्षा होगा. यहां पीड़ितों के राहत और पुनर्वास की जरूरत को सही मायने में रेखांकित किया गया है. इसीलिए नया बिल ट्रैफिकिंग के शिकार व्‍यक्तियों के लिए एक वरदान साबित होने जा रहा है.

इस बिल के जरिए भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की मौजूदा कमियों को दूर करने की कोशिश की गई है, ताकि इससे जुड़े कई और भी अपराधों से सख्ती से निपटा जा सके. अब जब यह राज्यसभा में भी पास हो जाएगा तब जाकर यह कानून का रूप ले सकेगा. नोबेल शांति पुरस्‍कार से सम्‍मानित कैलाश सत्‍यार्थी समेत कई स्वयंसेवी संस्थाएं इस कानून की मांग एक अरसे से कर रहे थे.

जानें क्यों जल्द से जल्द पास हो जाना चाहिए मानव तस्करी विधेयक 2018

इस बिल के माध्‍यम से सरकार ने ट्रैफिकिंग के सभी पहलुओं को नए सिरे से परिभाषित किया है. नई परिभाषा के मुताबिक ट्रैफिकिंग के गंभीर रूपों में जबरिया मजदूरी, बंधुआ मजदूरी, भीखमंगी, जबरिया शादी या शादी के लिए छल या विवाह के बाद महिलाओं और बच्चों की ट्रैफिकिंग शामिल हैं.

प्रस्तावित बिल में पीड़ितों, गवाहों और शिकायतकर्ताओं की पहचान को हर स्तर पर गुप्त रखते हुए उनकी सुरक्षा का प्रावधान किया गया है. यदि पीड़ित की पहचान का किसी भी न्यूज एजेंसी, समाचार पत्र या किसी अन्य माध्यम में खुलासा होता है, तो इसे एक आपराधिक कृत्य मानते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान है.

यदि अदालत पीड़ित के सर्वोतम हित में पहचान को उजागर करना चाहती है तो वह अदालत को लिखित में बताना होगा कि इसकी आवश्यकता क्‍यों है और यह कैसे बच्‍चों के हित में है. इस विधेयक के अनुसार ट्रायल की प्रक्रिया के दौरान यह सुनिश्चित किया जाएगा कि पीड़ित का सामना अभियुक्त से किसी भी हाल में नहीं हो सके. ऐसा कर मानवाधिकार की रक्षा का यह बिल एक नजीर पेश करता है.
Loading...

मानव तस्‍करी करने वालों को होगी उम्रकैद, कैबिनेट ने बिल को मंजूरी

पहली बार पुनर्वास कोष की स्थापना से पीड़ितों की मानसिक-शारीरिक देखभाल सुनिश्चित हो सकेगी. इसमें मुकदमों की तेज सुनवाई के लिए प्रत्येक जिले में विशेष अदालत की स्थापना होगी. ट्रैफिकिंग के दोषी को न्यूनतम 10 साल की सजा के साथ आजीवन कारावास का दंड होगा. इसके अतिरिक्‍त न्यूनतम एक लाख रुपये के दंड की व्यवस्था के साथ-साथ अपराधियों की संपत्ति की कुर्की-जब्ती जैसे कठोर दंड की सिफारिश के साथ ही यह बिल ट्रैफिकिंग मुक्त भारत के लिए मील का पत्‍थर साबित होगा.

प्रस्‍तावित बिल से जुड़ी एक याचिका की यह कहकर आलोचना की जा रही है कि इसमें देह व्‍यापार से जुडे लोगों के अधिकारों और उनके उचित पुनर्वास की कोई व्‍यवस्‍था नहीं की गई है. जबकि इस बिल के जरिए देह व्‍यापार से जुड़े लोगों के हितों की भी रक्षा होती है. यदि कोई वयस्‍क महिला जज के सामने इस बात को कुबूल करती है कि वह सेक्‍स वर्कर है और अपनी मर्जी से इस पेशे में आई है, तो उस पर किसी तरह की कार्रवाई नहीं की जाएगी.

बिल में उन सेक्‍स वर्करों के सामाजिक और आर्थिक पुनर्वास की बात भी कही गई है, जो सेक्‍स वर्क को त्‍यागकर कोई दूसरा व्‍यवसाय करना चाहती है. सरकार ‘बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ’, ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा बुलंद करती है. उसी भाव के तहत उसे पीड़ित बच्चों और महिलाओं की समस्या का समाधान करना होगा और इस संभावित कानून को सख्ती से लागू करना होगा.

इस बिल की विशेषता यह है कि इसमें रिसर्च पर जोर दिया गया है. रिसर्च से संबंधित तथ्‍य यह है कि यह कमियों या गैप को भरने में हमारी मदद करता है और समाधान की दिशा में इससे समस्‍याओं की पहचान होती है. दूसरे देशों ने इस प्रणाली को अपनाकर ट्रैफिकिंग जैसी बुराई को दूर करने की दिशा में काफी सफलता प्राप्‍त की है.

बिल में रिसर्च वाले पहलू को जोड़कर सरकार ने सराहनीय काम किया है क्‍योंकि किसी भी कार्रवाई से पहले शोध करने की दरकार होती है. इस संदर्भ में राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने 2002-2004 में ट्रैफिकिंग पर एक राष्ट्रीय शोध किया था और जिसके फलस्‍वरूप 2005 में जो रिपोर्ट आई थी, सरकार ने उसको अपनाया और उसके आधार पर कई सुझाव लागू किए.

भारत सहित विश्व के लगभग सभी देश ट्रैफिकिंग, जबरिया मजदूरी व बंधुआ मजदूरी जैसी सामाजिक बुराइयों का सामना कर रहे हैं, जिससे मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है. दक्षिण एशिया तो इस समस्‍या के हब के रूप में जाना जाने लगा है, जहां इसकी जड़ें काफी गहरी हो चुकी हैं और यह बड़ी चिंता का विषय बना है.

यौन शोषण, देह व्यापार, सस्ती व बंधुआ मजदूरी के लिए ट्रैफिकर्स के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय गिरोह आज सक्रिय हैं. बच्चों की गुमशुदगी और अपहरण की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. गृह मंत्रालय की 2017-18 की एक रिपोर्ट के अनुसार 2015 की तुलना में 2016 में 30 फीसदी की बढ़ोतरी चिंता का विषय है.

अभी तक यही होता आ रहा था कि प्रभावी संस्‍थाओं, प्रक्रियाओं और अधिकारियों के अभाव में ट्रैफिकिंग के शिकार बच्‍चों को मुक्‍त कराने में दुश्‍वारियां पेश आती थी. लेकिन नए कानून में इस कमी की ओर भी पर्याप्‍त ध्‍यान दिया गया है और इसके पर्याप्‍त समाधान भी पेश किए गए हैं. नए कानून के राज्‍यसभा से भी पारित हो जाने और उसके लागू हो जाने से सामाजिक न्‍याय के लक्ष्‍य को आसानी से प्राप्‍त किया जा सकता है.

(लेखक- बीके गोयल  राज्य बाल संरक्षण आयोग, हरियाणा के पूर्व सदस्य)
Loading...

और भी देखें

पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...