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बेटी बचाने के लिए भिवानी के प्राइवेट अस्पताल की अनूठी पहल

बेटी बचाने के लिए भिवानी के प्राइवेट अस्पताल की अनूठी पहल

कहने को केंद्र व प्रदेश सरकार गिरते लिंग अनुपात को लेकर चिंतित हैं. लिंग अनुपात में सुधार के लिए 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' योजना की शुरुआत भी खुद प्रधानमंत्री ने हरियाणा से की, लेकिन बेटियों को बचाने के लिए सरकार से दो कदम आगे बढ़ाते हुए भिवानी के एक निजी अस्पताल ने अनूठी शुरुआत की है.

कहने को केंद्र व प्रदेश सरकार गिरते लिंग अनुपात को लेकर चिंतित हैं. लिंग अनुपात में सुधार के लिए 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' योजना की शुरुआत भी खुद प्रधानमंत्री ने हरियाणा से की, लेकिन बेटियों को बचाने के लिए सरकार से दो कदम आगे बढ़ाते हुए भिवानी के एक निजी अस्पताल ने अनूठी शुरुआत की है.

कहने को केंद्र व प्रदेश सरकार गिरते लिंग अनुपात को लेकर चिंतित हैं. लिंग अनुपात में सुधार के लिए 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' योजना की शुरुआत भी खुद प्रधानमंत्री ने हरियाणा से की, लेकिन बेटियों को बचाने के लिए सरकार से दो कदम आगे बढ़ाते हुए भिवानी के एक निजी अस्पताल ने अनूठी शुरुआत की है.

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कहने को केंद्र व प्रदेश सरकार गिरते लिंग अनुपात को लेकर चिंतित हैं. लिंग अनुपात में सुधार के लिए 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' योजना की शुरुआत भी खुद प्रधानमंत्री ने हरियाणा से की, लेकिन बेटियों को बचाने के लिए सरकार से दो कदम आगे बढ़ाते हुए भिवानी के एक निजी अस्पताल ने अनूठी शुरुआत की है.

आमतौर पर ना केवल निजी बल्कि सरकारी अस्पतालों में भी बच्चे के जन्म पर अस्पताल कर्मचारी शगुन के तौर पर बच्चे के अभिभावकों से मोटी रकम वसूलते हैं. कई बार तो फटे-पुराने कपड़ों में आए गरीब लोग ऐसी वसूली से बेहद परेशान होते हैं, लेकिन भिवानी के एक निजी अस्पताल ने बेटी के जन्म पर शगुन लेने की बजाय बेटी की मां को शगुन देने की अनुठी पहल शुरू की है.

यहां जन्मी हर बेटी को शगुन के तौर पर 1100 रुपए बतौर शगुन नगद दिए जाते हैं. इसके साथ ही उसके परिजनों को मिठाई खिलाई जाती है और बेटी को नए कपङ़े अपनी तरफ से दिए जाते हैं. अस्पताल की महिला डॉक्टर अनिता अंचल ने बताया कि उन्हें यह सीख तब मिली जब नवरात्र के व्रत करने पर खाना खिलाने को लड़कियां नहीं मिली. उन्होंने कहा कि बेटी बचाने के लिए ये उनकी एक छोटी सी पहल है. डॉ. अनिता ने बताया कि बेटी को जन्म देने वाली महिला से वे एडमिशन फीस और ओपीडी फीस भी नहीं लेती.

वहीं बेटी को जन्म देने वाली महिलाएं भी अस्पताल की इस पहल से खुश हैं. सरोज नामक एक महिला ने बताया कि उसकी बेटी के जन्म पर अस्पताल ने उसे व उसकी बेटी को कई तरह से सम्मानित किया. मुंह मीठा करवाया और थाली बजाकर खुशी मनाई.

वास्तव में यह एक अनुठी पहल है जिसे न केवल दुसरे निजी अस्पतालों बल्कि सभी सरकारी अस्पतालों को अपनाना चाहिए, ताकि एक महिला को बेटी के जन्म पर निराशा नहीं बल्कि खुशी महसूस हो. और बेटी को जन्म लेने का अधिकार मिल सके.

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