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कौन आगे बढ़ाएगा चौधरी देवीलाल की राजनीतिक विरासत?

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: October 9, 2019, 1:13 PM IST
कौन आगे बढ़ाएगा चौधरी देवीलाल की राजनीतिक विरासत?
चौधरी देवीलाल की पहचान एक बड़े किसान नेता की थी

Haryana Assembly Election: कभी हरियाणा में चौधरी देवीलाल के परिवार की तूती बोलती थी लेकिन अब यह परिवार बिखर चुका है. इसकी राजनीतिक ताकत खत्म होने की कगार पर है, सभी विरासत के लिए

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  • Last Updated: October 9, 2019, 1:13 PM IST
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नई दिल्ली.  हरियाणा की राजनीति (Haryana Politics) तीन लालों देवीलाल, बंसीलाल और भजनलाल के इर्द-गिर्द घूमती रही है. चौथा बड़ा सियासी परिवार भूपेंद्र सिंह हुड्डा (Bhupinder Singh Hooda) का है. संयोग से इस वक्त जनता ने इन सभी परिवारों को हाशिए पर कर दिया है. तीनों लालों के लाल और खुद हुड्डा अपनी-अपनी सत्ता बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं. इस समय सत्ता आरएसएस के स्वयंसेवक मनोहरलाल खट्टर (Manohar Lal Khattar) के हाथ में है. चुनाव घोषित हो चुका है और माहौल बीजेपी के पक्ष में दिख रहा है, क्योंकि पूरा विपक्ष अपने घर के झगड़ों से ही नहीं उबर पा रहा. चुनावी समर में हम चारों परिवारों की सियासी दशा और दिशा से आपको रूबरू करवाएंगे. पहली कड़ी में पेश है चौधरी देवीलाल (Chaudhary Devi Lal) के परिवार की दास्तान.

आपातकाल विरोधी आंदोलन के बड़े नेता थे चौ. देवीलाल

'कैसे भूलें आपातकाल का दंश' नामक किताब में डॉ. चंद्र त्रिखा लिखते हैं कि " चौधरी देवीलाल आपातकाल विरोधी आंदोलन के क्षेत्रीय आधार स्तंभों में से एक थे. इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित होने के तत्काल बाद जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में कांग्रेस (संगठन), भारतीय लोकदल,  जनसंघ, अकाली दल और सोशलिस्ट पार्टी सहित विपक्ष की नई दिल्ली में बैठक हुई जिसमें हरियाणा के प्रतिनिधि के रूप में चौधरी देवीलाल ने भाग लिया....1977 में हरियाणा विधानसभा के लिए चुनाव कराए गए और चौधरी देवीलाल मुख्यमंत्री बने."

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किसान नेता चौधरी देवीलाल उप प्रधानमंत्री रहे हैं


चौधरी देवीलाल, जिन्होंने वीपी को सौंप दी कुर्सी!


आजादी के आंदोलन से राजनीति में आने वाले वो चौधरी देवीलाल ही थे जिन्होंने दिसंबर, 1989 में आम चुनाव के बाद संयुक्त मोर्चा संसदीय दल का नेता बनने के बाद भी बहुत ही विनम्रता से यह पद वीपी सिंह को सौंप दिया था. यानी उन्होंने विश्वनाथ प्रताप (VP singh) को प्रधानमंत्री बनवाया. खुद उप प्रधानमंत्री बने.
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यह अलग बात है कि बाद में वीपी सिंह ने उसी देवीलाल को अपने मंत्रिमंडल से हटा दिया. इसके बाद चौधरी देवीलाल चंद्रशेखर (Chandra Shekhar) की सरकार में उप प्रधानमंत्री बने. इससे पहले वो दो बार हरियाणा के सीएम रहे. एक वक्त था जब चौधरी देवीलाल की हरियाणा और देश की राजनीति में तूती बोलती थी. उनकी पहचान एक बड़े किसान नेता की थी.

हरियाणा में वंशवादी राजनीति की शुरुआत

जब 2 दिसंबर 1989 को चौधरी देवीलाल वीपी सिंह सरकार में उप प्रधानमंत्री बनाए गए तब उन्होंने हरियाणा की कमान अपने बेटे ओम प्रकाश चौटाला को सौंप दी. उसी दिन चौटाला सीएम बने. यहीं से हरियाणा में वंशवाद की राजनीति की शुरुआत हुई.

देवीलाल 1971 तक कांग्रेस में रहे थे. 1977 में वो जनता पार्टी में आ गए. जबकि 1987 में इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) की स्थापना की. जो इस वक्त हरियाणा विधानसभा में मुख्य़ विपक्षी पार्टी है.

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अजय चौटाला के परिवार ने मिलकर जन नायक जनता पार्टी (JJP) बनाई है


ओम प्रकाश चौटाला

हरियाणा के पूर्व सीएम ओम प्रकाश चौटाला टीचर भर्ती के एक मामले में धांधली को लेकर तिहाड़ जेल में सजा भुगत रहे हैं. हालांकि, जब तक वो सीएम रहे बहुत सख्ती से काम किया. लेकिन उनकी पार्टी की दबंगई वाली छवि उन्हें 2005 में ले डूबी. चौटाला चार बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं. उनके जेल जाने के बाद छोटे बेटे अभय चौटाला और बड़े बेटे के पुत्र दुष्यंत चौटाला खुद को मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट करने लगे. इसी जंग में पार्टी टूट गई. चौधरी देवीलाल की सियासी विरासत को हथियाने की लड़ाई सड़क तक आ गई. फिलहाल इनेलो दो फाड़ हो चुकी है. दोनों गुट खुद को देवीलाल के रास्ते पर चलने वाला बता रहे हैं.

अजय-अभय चौटाला

ओम प्रकाश चौटाला के सीएम रहते इन दोनों भाईयों की तूती बोलती थी. अजय सांसद और विधायक रहे हैं जबकि अभय विधायक. परिवार में पावर सेंटर बनने की लड़ाई की चिंगारी लंबे समय से सुलग रही थी जो 2018 के अंत में ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ी. ओपी चौटाला के दोनों बेटों की सियासी राहें जुदा हो गईं. ओपी चौटाला के बड़े बेटे अजय चौटाला के पुत्र दुष्यंत और दिग्विजय ने मिलकर जन नायक जनता पार्टी (जेजेपी) बना ली. जबकि इनेलो की कमान उनके छोटे बेटे अभय चौटाला के पास ही है. हालांकि, जानकार बताते हैं कि इंडियन नेशनल लोकदल के ज्यादातर अहम फैसले ओम प्रकाश चौटाला जेल से ही लेते हैं.

दुष्यंत चौटाला-दिग्विजय चौटाला

परिवार की अंदरूनी लड़ाई में अजय चौटाला के बेटों दुष्यंत और दिग्विजय को हाशिए पर कर दिया गया था. फिर उन्होंने नई पार्टी की बनाने का फैसला किया. उन्होंने पार्टी बनाने के बाद पहला चुनाव जींद विधानसभा (उप चुनाव) का लड़ा, लेकिन मात खा गए. इसके बाद लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारे.  जेजेपी ने विधानसभा चुनाव के लिए बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन किया, लेकिन अब वो गठबंधन टूट चुका है. बसपा अकेले मैदान में उतरी हुई है. इससे पहले इनेलो ने भी बसपा से गठबंधन किया था लेकिन यह सियासी गठजोड़ भी ज्यादा देर नहीं ठहर सका.

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इंडियन नेशनल लोकदल (INLD) की कमान अभय चौटाला के पास है


जाटों की पार्टी!

इनेलो की पहचान जाटों की एक पार्टी की रही है. जाट 2014 से सत्ता से बाहर हैं. इसीलिए इस वक्त जाटों की एक खाप मिलकर दोनों परिवारों को एकजुट करने की कोशिश में जुटी हुई है. ताकि विधानसभा चुनाव में दोनों एक होकर मैदान में उतर सकें. वरना इनेलो और नई नवेली जेजेपी दोनों का राजनीतिक अस्तित्व खत्म हो सकता है. फिलहाल ऐसी कोशिशें नाकाम रही हैं. इनेलो के दस विधायक पार्टी छोड़कर बीजेपी में जा चुके हैं. उसमें कई चुनाव भी लड़ रहे हैं. 2014 में इनेलो के पास 19 विधायक थे. लेकिन चुनाव होते-होते सिर्फ 3 ही बचे थे. देखना यह है कि इनेलो व जेजेपी अपना वजूद बचा पाती हैं या फिर चौधरी देवीलाल के परिवार की सियासत भगवा लहर में दब जाएगी.

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First published: October 9, 2019, 1:06 PM IST
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