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रिसालदार बदलू सिंह की बहादुरी की कहानी, जिन्होंने तलवार से किया था दुश्मन की मशीनगन का सामना

प्रथम विश्व युद्ध में दिखाई थी बहादुरी

प्रथम विश्व युद्ध में दिखाई थी बहादुरी

Risaldar Major Badlu Singh: मशीन गन पर कब्जा होने के बाद बदलू सिंह के साथियों ने पूरी चौकी पर ही कब्जा कर लिया. अचानक हुए इस अप्रत्याशित हमले से तुर्क सेना घबरा गई और आत्मसमर्पण करने को मजबूर हो गई.

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झज्जर. शहीदों की यादगार में हर साल 23 सितंबर को हरियाणा (Haryana) वीर एवं शहीदी दिवस मनाया जाता है. इस दिन राज्य स्तरीय समारोह के अलावा पूरे प्रदेश में जिला स्तर पर शहीदों को नमन किया जाता है और उनकी बहादुरी से जन-जन को रूबरू कराया जाता है. आज हम एक ऐसे ही महान योद्धा से आपको रूबरू कराने जा रहे हैं, जिन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध (First World War) के दौरान अपने अदम्य साहस और बहादुरी का परिचय देते हुए तुर्की सेना को बुरी तरह से परास्त किया और आत्मसमर्पण करने को मजबूर कर दिया था.

हालांकि दुश्मन सेना के आत्मसमर्पण के तुरंत बाद ये घायल योद्धा भी वीरगति को प्राप्त हो गए थे, जिन्हें मरणोपरांत विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया. हम जिक्र कर रहे हैं झज्जर जिले के ढाकला गांव में पैदा हुए रिसलदार बदलू सिंह की बहादुरी का. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उन्हें और उनकी रेजिमेंट को ब्रिटिश भारतीय सेना ने फिलिस्तीन की जॉर्डन घाटी में तैनात किया.

तुर्की सेना लगातार हमले कर रही थी और उन्हें रोकने के लिए 12वीं केवलरी ब्रिगेड को जिम्मेदारी दी गई, जिसमें बदलू सिंह बतौर रिसलदार शामिल थे. 23 सितंबर 1918 को तुर्की सेना की सातवीं और आठवीं आर्मी के रास्ते को अवरुद्ध करने का काम इन्हें सौंपा गया था. तुर्की सेना के पास अत्याधुनिक हथियारों के अलावा सैनिकों का संख्या बल भी इनसे ज्यादा था. तुर्की सेना की मशीन गन लगातार इनकी रेजिमेंट पर हमला कर रही थी, जिससे काफी सैनिक मारे जा रहे थे. इन्हें जॉर्डन नदी के किनारे स्थित दुश्मन सेना के एक मजबूत ठिकाने पर आक्रमण करने का आदेश मिला.

रिसलदार बदलू सिंह अपने स्क्वाड्रन के साथ अपने लक्ष्य को निशाना बनाकर आगे बढ़ रहे थे. लेकिन इसी दौरान उन्होंने देखा कि इनकी बाई तरफ पहाड़ी पर 200 तुर्क सैनिक सैन्य साजो समान और मशीन गन के साथ मोर्चा संभाले हुए हैं. मशीनगन से लगातार फायर हो रहे थे, जिस कारण इनके कई साथी उसकी चपेट में आ गए, ऐसे हालात से बाहर नहीं निकला जा सकता था, इसलिए बबलू सिंह ने तुरंत एक बड़ा रिस्क लिया.

अपने 6 रैंक साथियों के साथ मिलकर योजना बनाई

उन्होंने अपने 6 रैंक साथियों के साथ मिलकर योजना बनाई और खतरे की परवाह न करते हुए जिधर से गोलियां आ रही थी, उधर ही दुश्मन सेना पर तलवार से आक्रमण कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया और दुश्मन की मशीन गन पर ही कब्जा कर लिया. मशीन गन पर कब्जा होने के बाद बदलू सिंह के साथियों ने पूरी चौकी पर ही कब्जा कर लिया. अचानक हुए इस अप्रत्याशित हमले से तुर्क सेना घबरा गई और आत्मसमर्पण करने को मजबूर हो गई. लेकिन इस दौरान रिसलदार बदलू सिंह भी बुरी तरह से घायल हो गए थे.

अपनी आंखों के सामने दुश्मन को आत्मसमर्पण करते हुए देखा

उन्होंने अपनी आंखों के सामने दुश्मन को आत्मसमर्पण करते हुए देखा. वे बेहद खुश थे, लेकिन खून ज्यादा बहने के कारण मशीन गन पर ही माथा रखकर वीरगति को प्राप्त हो गए. रिसलदार बदलू सिंह की बहादुरी, दूरदर्शिता, हिम्मत और उनके नेतृत्व को देखते हुए उन्हें मरणोपरांत विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया और वहीं पर ही उनका अंतिम संस्कार किया गया. इजिप्ट में बदलू सिंह की समाधि है और तीन साल पहले हरियाणा के तत्कालीन कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ वहां से उनकी यादगार में मिट्टी लेकर आए थे और उसके बाद उनके पैतृक गांव में उनकी समाधि बनाई गई.

वीरगति स्थल से मिट्टी लाई गई 

बदलू सिंह के प्रपौत्र नवीन धनखड़ ने उनके बारे में जानकारी दें और बताया कि किस तरह से 98 साल बाद उनकी वीरगति स्थल से मिट्टी लाई गई और पैतृक गांव में समाधि बनाई गई. हालांकि बदलू सिंह के एक प्रपौत्र भी कारगिल की लड़ाई के बाद शहीद हुए थे और उनकी समाधि भी उनके साथ ही बनाई गई है.

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