आजादी के लिए कभी जेल तो कभी खाई अंग्रजों की लाठियां, अब ऐसे काट रहे आखिरी वक्त

1942 में मुल्तान की जेल में सजा काटी और वहां लाठी खाई. यहां उन्हें इतना मारा गया कि उनका एक टूट गया, लेकिन उसके बावजूद भी ख़ुशी राम अपने साथियों के साथ हर आन्दोलन में कंधे से कंधा मिलाका खड़े रहे.

Namandeep Singh | News18 Haryana
Updated: August 9, 2019, 3:44 PM IST
आजादी के लिए कभी जेल तो कभी खाई अंग्रजों की लाठियां, अब ऐसे काट रहे आखिरी वक्त
स्वतंत्रा सैनानी खुशी राम ऐसे काट रहे जिंदगी
Namandeep Singh | News18 Haryana
Updated: August 9, 2019, 3:44 PM IST
देश को आजाद हुए आज 70 साल से ज्यादा का समय हो चुका है. लेकिन आज की युवा पीढ़ी शायद अभी तक यह नहीं जानती आखिर ये आजादी मिली तो मिली कैसे. कैसा था वो डर, कैसा था अंग्रेजो का जुल्म. यए आप खुद ब खुद समझ जाएंग जब आप करनाल के ख़ुशी राम से मिलकर. ख़ुशी राम जिन्होंने 18 साल की उम्र में जेल में सजा काटी अंग्रेजो की लाठियां खाई लाख जुल्म दर्द सहने के बावजूद हार नहीं मानी. अपने साथियो के साथ मिलकर भारत छोड़ो आन्दोलन में अहम योगदान निभाया, लेकिन मौजूदा दौर में यह शख्स पल-पल घुट-घुट कर जी रहा है.

101 वर्षीय स्वतंत्रत सैनानी खुशी राम आज एक कमरे में बिस्तर पर रहने को को मजबूर हैं. आजादी से पहले का वो दौर याद करके वो आज भी रो देते हैं. उनका कहना है कि जो दौर हमने देखा वो किसी को नहीं पता. कैसे अंग्रेजो के जुल्म थे, कैसे हमारे कुछ साथी उनके साथ मिले हुए थे और कैसे हमें यह आजादी मिली. इसके बारे में हम ही अच्छे से जानते है. ख़ुशी राम की इतनी उम्र हो चुकी है और साथ ही लकवे की समस्या जिससे ख़ुशी राम लम्बे समय से जूझ रहे हैं.



स्वतंत्रता आंदोलनों में लिया भाग

सालवन में जन्मे ख़ुशी राम अपने परिवार के साथ बसंत बिहार में रहते है. उम्र इतनी हो चुकी है की कुछ बाते याद है तो कुछ नहीं. लेकिन वह बताते है की कैसे उस दौर में हमने जेल में सजा काटी है और बहुत पीटने के बाद हमें यह आजादी मिली. जब देश में अंग्रेजो का कब्जा था तब कई क्रांतिकारी युवाओ को इक्कठा करके अलग अलग आन्दोलन चला रहे थे. उसी में से एक आन्दोलन में ख़ुशी राम शामिल हुए. मन्दिर के रसोईऐ ने क्रांतिकारी आन्दोलन में जोड़ा और जुल्म के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की.

कभी हार नहीं मानी

1936 से लेकर 47 तक का समय आसान नहीं था. लेकिन कभी हार नहीं मानी. सभी साथियों के साथ मिलकर अंग्रेजो के जुल्मो के खिलाफ आवाज बुलंद की. गांव सालवन में एक दौर ऐसा था जब गांव वालों ने लगान देने से मना कर दिया था. तब गांव के लोगों पर खूब अत्याचार किए गए और उन्हें मारा पीटा गया जिसमे ख़ुशी राम और उनके साथी भी शामिल थे.
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हैदराबाद की जेल में 6 महीने काटी सजा

ख़ुशी राम ने 18 साल की उम्र में 1939 में हैदराबाद की जेल में 6 महीने की सजा काटी, जब नवाब उस्मान अली अपनी रियासत को अलग रखना चाहता था. उसने हिन्दूओ के खिलाफ चाल चली, मन्दिर बनाने में रोक लगाई. तब हिंदुस्तान से लाखो लोग वहां गए. कई मारे गए तो कईओं को जेलों में बंद कर दिया गया. बस वही से असली आजादी की शुरुआत हुई और उसके बाद अंग्रेजो से कई बार सामना हुआ.



जेल में हुई पिटाई में टूट गया था हाथ

उन्होंने बताया कि 1942 में मुल्तान की जेल में सजा काटी और वहां लाठी खाई. यहां उन्हें इतना मारा गया कि उनका एक टूट गया, लेकिन उसके बावजूद भी ख़ुशी राम अपने साथियों के साथ हर आन्दोलन में कंधे से कंधा मिलाका खड़े रहे. खुशी राम ने भारत छोड़ो आन्दोलन में भी भाग लिया जिसके बाद लाख प्रयासों हजारो बलिदानों के बाद 1947 में हमे आजादी मिली. जेल में अंग्रेजो के मारे हुए लठ का दर्द आज भी ख़ुशी राम को महसूस होता है. लेकीन उसके बावजूद भी उनके चेहरे पर ख़ुशी आ जाती है, जब वह आजादी के उस जश्न को याद करते हैं.

खुशी राम के दो बेटे

ख़ुशी राम के दो बेटे है और दोनों ही उनकी पूरी सेवा करते है और उनके दिखाए मार्ग पर हमेशा से चलते आ रहे है. खुशी राम के बेटे का कहना है की हमारे पिता ने बहुत कुछ देखा है. हमेशा यही कहते है गुलामी में जीना ज्हन्नुम से कम नहीं और आजादी के लिए जान भी जाए तो कम नहीं. पिता जी का आज भी एक हाथ टुटा हुआ है, वह उसे सीधा नहीं कर पाते. क्योंकि इसी हाथ पर लाठियां बरसी थी, जो हमें यह महसूस करवाती है की आजादी के लिए उस समय क्या क्या हुआ होगा.

ताम्रपत्र से नवाजा गया

ख़ुशी राम के बेटे का कहना है इन्होंने देश के लिए अपनी जिन्दगी लगा दी. इन्हें ताम्रपत्र से भी नवाजा गया है. लेकिन आज इनके हाल कुछ ठीक नहीं है. 15 साल से बेड पर है. उनकी उम्र इतनी हो चुकी है शरीर साथ नहीं देता. तो दूसरा बाहर हम इन्हें लेकर नहीं जा सकते क्योंकि हमारे पूरे इलाके में गंदगी का आलम है. सड़क इतनी खराब है कि हमें इन्हें अस्पताल में लेकर जाना पड़ जाए तो बहुत बुरा हाल हो जाए. हम तो यही चाहते है आजादी के इस जश्न में इस बार स्वतन्त्रता सेनानियों के बारे में सोचा जाए, जिन्होंने देश के लिए अपनी पूरी जिन्दगी दे दी सरकारे पता करे आखिर आज वह किस हालत में है.

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First published: August 8, 2019, 12:40 PM IST
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