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दान में दी गई आंखों के कूड़ेदान में मिलने की जांच करेंगे प्रदीप कासनी

दान में दी गई आंखों के कूड़ेदान में मिलने की जांच करेंगे प्रदीप कासनी

रोहतक पीजीआई एक बार फिर विवादों में है। मरने के बाद नेत्र अस्पतालों को जो आंखे दान में दी गईं थीं, उनमें से 2000 आंखें कूड़ेदान में फेंकने का मामला सामने आया था। जिसके बाद स्वास्थ्य मंत्री ने चिकित्सा शिक्षा के सचिव प्रदीप कासनी को जांच की जिम्मेदारी सौंपी है और 15 दिन में जांच पूरा करने के निर्देश दिए हैं। गौरतलब है कि यह मुद्दा संसद में भी काफी उछाला गया है।

रोहतक पीजीआई एक बार फिर विवादों में है। मरने के बाद नेत्र अस्पतालों को जो आंखे दान में दी गईं थीं, उनमें से 2000 आंखें कूड़ेदान में फेंकने का मामला सामने आया था। जिसके बाद स्वास्थ्य मंत्री ने चिकित्सा शिक्षा के सचिव प्रदीप कासनी को जांच की जिम्मेदारी सौंपी है और 15 दिन में जांच पूरा करने के निर्देश दिए हैं। गौरतलब है कि यह मुद्दा संसद में भी काफी उछाला गया है।

रोहतक पीजीआई एक बार फिर विवादों में है। मरने के बाद नेत्र अस्पतालों को जो आंखे दान में दी गईं थीं, उनमें से 2000 आंखें कूड़ेदान में फेंकने का मामला सामने आया था। जिसके बाद स्वास्थ्य मंत्री ने चिकित्सा शिक्षा के सचिव प्रदीप कासनी को जांच की जिम्मेदारी सौंपी है और 15 दिन में जांच पूरा करने के निर्देश दिए हैं। गौरतलब है कि यह मुद्दा संसद में भी काफी उछाला गया है।

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रोहतक पीजीआई एक बार फिर विवादों में है। मरने के बाद नेत्र अस्पतालों को जो आंखे दान में दी गईं थीं, उनमें से 2000 आंखें कूड़ेदान में फेंकने का मामला सामने आया था। जिसके बाद स्वास्थ्य मंत्री ने चिकित्सा शिक्षा के सचिव प्रदीप कासनी को जांच की जिम्मेदारी सौंपी है और 15 दिन में जांच पूरा करने के निर्देश दिए हैं। गौरतलब है कि यह मुद्दा संसद में भी काफी उछाला गया है।

हर बार की तरह पीजीआई ने इस बार भी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। क्षेत्रीय नेत्र विज्ञान संस्थान के एचओडी डॉ. चांद सिंह ढुल ने बताया जो आंखें दान में मिलती हैं, उसमें से 70 प्रतिशत ही कामयाब होती हैं और जो 30 प्रतिशत आंखें जांच में खरी नहीं उतरती। उन्हें स्टूडेंट के रिसर्च और टीचिंग में काम में इस्तेमाल किया जाता है।

पिछले पांच सालों में देश के चार बड़े चिकित्सा संस्थानों में ही आंखे दान की गई थी। उनमें एम्स और पीजीआई चंडीगढ़ प्रमुख चिकित्सा संस्थान हैं।

वैसे तो सरकार नेत्रदान को बढ़ावा देना चाहती है। लेकिन इस तरह के मामलों से सरकार की सकारात्मक नीतियों पर रोक जरूर लग जाती है। साथ ही दान करने वालों में भी कमी आएगी। जिससे जरूरतमंद लोगों को आंखे नहीं मिल पाएंगी।

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