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किसानों के लिये फायदे का सौदा बनी मशरूम, करनाल में इस संस्थान में मिलते हैं खास बीज और प्रशिक्षण

किसानों के लिये फायदे का सौदा बनी मशरूम, करनाल में इस संस्थान में मिलते हैं खास बीज और प्रशिक्षण

आजकल मशरूम की खेती किसानों के लिये फायदे का सौदा बन रही है.

आजकल मशरूम की खेती किसानों के लिये फायदे का सौदा बन रही है.

डॉ. अजय सिंह रीजनल डायरेक्टर बताते हैं कि तीन तरह के मशरूम का उत्पादन होता है, अभी सितंबर महीने से 15 नवंबर तक ढ़िगरी मशरूम का उत्पादन कर सकते हैं, इसके बाद आप बटन मशरूम का उत्पादन कर सकते हैं.

    अमित भटनागर,

    करनाल. देशभर के कई हिस्सों में मशरूम की खेती काफी लोकप्रिय हो रही है. पिछले कुछ वर्षों में भारतीय बाजार में मशरूम की मांग तेजी से बढ़ी है, लेकिन उत्पादन उतना नहीं हो रहा है. ऐसे में किसान मशरूम की खेती कर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं. कम जगह में अधिक से अधिक फायदा देने वाली मशरूम की खेती किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है. किसानों ने परंपरागत खेती से आगे बढ़कर मशरूम की खेती करना शुरू किया है. वहीं सरकार और कई अन्य संस्थान हैं, जो मशरूम की खेती को बढ़ावा देने के लिये इसका प्रशिक्षण दे रहे हैं.

    उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्यप्रदेश जैसे कई इलाके हैं, जहां किसान अच्छे प्रशिक्षण के साथ मशरूम की सफल खेती कर रहे हैं. अब तो हिमाचल प्रदेश, जम्मू- कश्मीर जैसे पहाड़ी इलाकों में भी मशरूम की खेती की तरफ रुझान बढ़ा है. अगर आप भी मशरूम का सफल व्यापार करना चाहते हैं, तो सरकार और संस्थानों द्वारा मिल रहे प्रोत्साहन और कौशल विकास के फलस्वरुप अपने इस सपने को पूरा कर सकते हैं. तो आइए जानते हैं कि आखिरकार कहां से मशरूम की खेती का प्रशिक्षण लिया जा सकता है.

    न्यूज़ 18 की अन्नदाता टीम इस बार किसान भाइयों की जानकारी के लिए हरियाणा के जिले सोनीपत के मुरथल में स्थित महाराणा प्रताप बागवानी विश्वविधालय क्षेत्रीय मशरूम अनुसंधान केंद्र, जहां पर मशरूम का बीज तैयार किया जाता है. बटन मशरूम, ढिंगरी मशरूम (ऑयस्टर मशरुम), दूधिया मशरूम (मिल्की) ऑयस्टर मशरुम, शिटाके मशरूम, व्हते ओएस्टर मशरूम, पोर्टोबेल्लो मशरूम, पिंक ओएस्टर मशरूम ,किंग ओएस्टर मशरूम,मिल्की मशरूम ,पैडी स्ट्रॉ मशरूम, कोर्डीसेप्स मशरूम, ब्लैक ओएस्टर मशरूम ,ऑरिक्यूलरीए मशरूम अदि प्रकार के बीज इस संस्थान में बनाये जाते हैं. उसके बाद किसानो को उचित मूल्ये पर दिए जाते हैं.

    पिछले कई वर्षों से मशरूम की खेती का प्रशिक्षण दे रहे डॉ अजय सिंह रीजनल डायरेक्टर बताते हैं, “तीन तरह के मशरूम का उत्पादन होता है, अभी सितंबर महीने से 15 नवंबर तक ढ़िगरी मशरूम का उत्पादन कर सकते हैं, इसके बाद आप बटन मशरूम का उत्पादन कर सकते हैं, फरवरी-मार्च तक ये फसल चलती है, इसके बाद मिल्की मशरूम का उत्पादन कर सकते हैं जो जून जुलाई तक चलता है. इस तरह आप साल भर मशरूम का उत्पादन कर सकते हैं.

    ऑयस्टर मशरूम की खेती आसान और सस्ती 

    डॉ अजय सिंह बताते हैं, “ऑयस्टर मशरूम की खेती बड़ी आसान और सस्ती है. इसमें दूसरे मशरूम की तुलना में औषधीय गुण भी अधिक होते हैं. दिल्ली, कलकत्ता, मुम्बई एवं चेन्नई जैसे महानगरों में इसकी बड़ी मांग है. इसीलिये विगत तीन वर्षों में इसके उत्पादन में 10 गुना वृद्धि हुई है. तमिलनाडु और उड़ीसा में तो यह गांव-गांव में बिकता है. कर्नाटक राज्य में भी इसकी खपत काफी है. महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, केरल, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में भी ओएस्टर मशरूम की कृषि लोकप्रिय हो रही है.

    ऑयस्टर की खेती के बारे में कहते हैं, “स्पॉन (बीज) के जरिए मशरूम की खेती की जाती है, इसके लिए सात दिन पहले ही मशरूम के स्पॉन (बीज) लें, ये नहीं की एक महीने मशरूम का स्पान लेकर रख लें, इससे बीज खराब होने लगते हैं. इसके उत्पादन के लिए भूसा, पॉलीबैग, कार्बेंडाजिम, फॉर्मेलिन और स्पॉन (बीज) की जरूरत होती है. दस किलो भूसे के लिए एक किलो स्पॉन की जरूरत होती है, इसके लिए पॉलीबैग, कार्बेंडाजिम, फॉर्मेलिन, की जरूरत होती है.”

    10 किलो भूसे को 100 लीटर पानी में भिगोया जाता है, इसके लिए 150 मिली. फार्मलिन, सात ग्राम कॉर्बेंडाजिन को पानी में घोलकर इसमें दस किलो भूसा डुबोकर उसका शोधन किया जाता है. भूसा भिगोने के बाद लगभग बारह घंटे यानि अगर सुबह फैलाते हैं तो शाम को और शाम को फैलाते हैं तो सुबह निकाल लें, इसके बाद भूसे को किसी जालीदार बैग में भरकर या फिर चारपाई पर फैला देते हैं, जिससे अतिरिक्त पानी निकल जाता है.

    प्राकृतिक वातावरण उगाई जाती है मशरूम 

    मशरूम की तुड़ाई प्रतिदिन होती है. छोटे पिनहैड्स (नवजात मशरूम कलिकाएं) आगे कुछ दिनों में बड़े होकर तुड़ाई के योग्य हो जाते हैं. यह तब तक चलता है जब तक एक फसल अवस्था समापन (फ्लश ब्रेक) न आ जाये. इस अवस्था में बैड पर न तो बटन और न ही पिनहेड्स दिखाई देते है. यह अवस्था 3-4 दिन तक रहती है जिसके पश्चात मशरूम पुनः निकलना शुरु हो जाते है. यह चक्र 8-10 सप्ताह तक चलता रहता है. भारतवर्ष में मशरूम की पैदावार में बहुत विभिन्नता है क्योंकि यहां पर काफी मशरूम प्राकृतिक वातावरण में उगाई जाती है. जब तक मशरूम को नियंत्रित वातावरण में न लगाया जाये. इसकी निश्चित पैदावार नहीं ले सकते.

    यहां पर कहीं कहीं खाद भी लम्बी अवधि वाली विधि के द्वारा बनाई जाती है जिसमें अपेक्षाकृत कम पैदावार मिलती है. परन्तु फिर भी यदि खाद व बीज ठीक बने हैं और फसल लेने के दौरान सफाई आदि का पूरा ध्यान रखा जाए तो लम्बी अवधि वाली खाद से 3-4 फ्लश (सिनेमा) में लगभग 10 से 15 किलोग्राम मशरूम प्रति क्विंटल खाद से प्राप्त हो सकते हैं. यदि खाद लघु अवधि वाली विधि से बनाकर मशरूम प्राकृतिक वातावरण में लगाई जाये तो प्रति क्विंटल खाद से लगभग 15 से 20 किलोग्राम मशरूम प्राप्त होते हैं. 100 किलो सूखे भूसे में से ताजा मशरूम की पैदावार को बाईलॉजीकल एफिशिएंसी भी (ठम्ः) कहा जाता हैं.

    Tags: Farming, Haryana news, Karnal news, Mushroom

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