दृष्टिहीनता नहीं बनी इन दोनों की कमजोरी, अपने हुनर से पाल रहे परि‍वार
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न देख पाने की लाचारी के बावजूद दोनों ने परिस्थितियों के आगे कभी हार नहीं मानी. सोहन और बिजेंदर रेड क्रॉस भवन में कुर्सियां बुनने का काम करते है. ये रोजाना एक-एक कुर्सी तैयार करते हैं, उसके बाद कुर्सियों को सरकारी मुख्यालयों तक पहुंचाया जाता है.

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हरियाणा के करनाल में दो दृष्टिहीन व्यक्तियों की चर्चा इन दिनों खूब है. सोहन लाल और बीजेंदर के पास आंख से देखने की क्षमता तो नहीं है, लेकिन वे लोगों को मन की आंख से जरूर पहचान लेते हैं. न देख पाने की लाचारी के बावजूद दोनों ने परिस्थितियों के आगे कभी हार नहीं मानी. सोहन और बिजेंदर रेड क्रॉस भवन में कुर्सियां बुनने का काम करते है. जी हां वही कुर्सियां जो प्लास्टिक की तारों से बुनी हुई सरकारी मुख्यालयों-दफ्तरों में देखी जाती हैं. ये रोजाना एक-एक कुर्सी तैयार करते हैं, उसके बाद कुर्सियों को सरकारी मुख्यालयों तक पहुंचाया जाता है.

रोजाना सुबह 8 बजे अपने घर से निकलकर दफ्तर पहुंचना और शाम 5 बजे तक काम करना,  अगली सुबह यही प्रक्रिया फिर से दुहराना दोनों की जिंदगी का एक रूटीन बन गया है. दृष्टिहीन होने के बावजूद इन दोनों ने कभी जीवन में हार नहीं मानी. दोनों का मानना है आदमी को भगवान के भरोसे नहीं बैठना चाहिए, बल्कि खुद सक्षम बनना चाहिए और काम करना चाहिए. अपनी कमजोरी से हारकर, मुंह छिपाकर रोने की बजाय मेहनत से काम करना चाहिए.

एक दुसरे के सहारे चलना और एक दुसरे के साथ हंसते, बात करते सोहन लाल और बीजेंदर का काम कब खत्म हो जाता है, इन्हें खुद भी पता नहीं लगता. पिछले कई सालों से इनका जीवन इसी तरह चल रहा है. बीजेंदर वसंत विहार में रहता है. पत्नी भी बदकिस्मती से कुछ देख नहीं सकती. इसके बावजूद भी दोनों अपने बच्चों को पढ़ा लिखा रहे हैं, ताकि वे बड़े होकर सफल नागरिक बन सकें. वहीं सोहन लाल की भी कहानी कुछ ऐसी ही है. सोहन की भी पत्नी दिव्यांग है. सोहन दो बच्चों का पिता भी है. सोहन भी अपने बच्चों को पढ़ाने में जुटा है ताकि उनका भविष्य उज्वल रहे.



हालांकि दोनों की प्रशासन और सरकार से एक अपील है कि सड़क किनारे खुले पड़े सीवरेज को बंद किया जाए. क्योंकि खुले में सीवरेज होने के कारण दृष्टिहीन व्यक्तियों के इसमें गिरने का डर बना रहता है.



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