Haryana Lok Sabha Election Result 2019: हरियाणा में चला बीजेपी का गैर जाट फार्मूला, कांग्रेस के सारे दिग्गज आ गए जमीन पर!

बीजेपी ने हरियाणा की आठ सामान्य सीटों में से छह पर गैर जाटों को लड़ाया था. इसी फार्मूले के चक्रव्यूह में फंसकर 10 साल तक सीएम रहे कांग्रेस नेता भूपेंद्र हुड्डा भी चुनाव हार गए हैं

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: June 5, 2019, 12:51 PM IST
Haryana Lok Sabha Election Result 2019: हरियाणा में चला बीजेपी का गैर जाट फार्मूला, कांग्रेस के सारे दिग्गज आ गए जमीन पर!
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ओम प्रकाश
ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: June 5, 2019, 12:51 PM IST
बीजेपी ने हरियाणा में लोकसभा की 10 में से 10 सीटें जीतकर रिकॉर्ड बना दिया है. जबकि, यह प्रदेश कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था. कांग्रेस के सभी दिग्गज जमीन पर आ गए हैं.  साल 2014 की मोदी लहर में पार्टी ने यहां सात सीटों पर कब्जा किया था. लेकिन 2019 के लिए पार्टी ने ऐसी रणनीति बनाई कि कांग्रेस और यहां की क्षेत्रीय पार्टियां सब चारो खाने चित हो गईं. दरअसल, बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में यहां 'जींद उप चुनाव फार्मूला' लागू किया था. जिसके तहत उसने जाटों के क्षेत्र में गैर जाटों को टिकट देकर वोटों का बड़ी आसानी से ध्रुवीकरण करा लिया. मनोहरलाल खट्टर के कार्यकाल में यह पहला लोकसभा चुनाव था, जो खुद यहां की सियासत में सबसे बड़ा गैर जाट चेहरा हैं.

हरियाणा के वरिष्ठ पत्रकार नवीन धमीजा कहते हैं, “ इस प्रदेश में अधिकांश समय जाटों का शासन रहा है. कांग्रेस में कई बड़े जाट लीडर थे और हैं. गैर जाट हमेशा हाशिए पर रहे हैं. चाहे वो नौकरी की बात हो या फिर सियासत की. इसलिए कांग्रेस के इस गढ़ में पैठ बनाने के लिए बीजेपी ने गैर जाट फार्मूला पर काम किया. 2014 में मनोहरलाल खट्टर को सीएम बनाने के बाद बीजेपी की छवि गैर जाट पॉलिटिक्स करने वाली पार्टी की बनकर उभरी. ऐसे में खट्टर के सामने इस चुनाव में जाट बहुल सीटों पर कमल खिलाने की सबसे बड़ी चुनौती थी." (ये भी पढ़ें: चुनाव जीतने के लिए क्या करते हैं बीजेपी के सबसे सफल अध्यक्ष अमित शाह? )

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धमीजा कहते हैं "ये चुनौती तब और बढ़ जाती है जब पार्टी के बड़े नेता दबी जुबान से गैरजाट की राजनीति करते नजर आते हैं. हालांकि, जाटों की पॉलिटिक्स करने वाली पार्टी इनेलो इस चुनाव में बिखर चुकी थी. उसमें दो फाड़ होने के बाद जन नायक जनता पार्टी बन गई. ऐसे में बीजेपी का पुराना फार्मूला आसानी से कामयाब हो गया. कांग्रेस के लीडर आपस में टांग-खिंचाई करते रहे. इसका भी बीजेपी को फायदा मिला है.”

चुनावी विश्लेषक धमीजा कहते हैं, “जाट आरक्षण आंदोलन के बाद से ही हरियाणा जाट बनाम नॉन जाट वाली पॉलिटिक्स की प्रयोगशाला के तौर पर उभरने लगा था. हालांकि, बीजेपी ने जाट वोटरों में भी सेंध लगाने की कोशिश नहीं छोड़ी. इसलिए जाट समाज से आने वाले सुभाष बराला को अपना प्रदेश अध्यक्ष बनाकर उन्हें भी साधने की कोशिश जारी रही. मनोहरलाल कैबिनेट में इसी समाज के कैप्टन अभिमन्यु और ओम प्रकाश धनकड़ को जगह मिली हुई है तो केंद्र में जाट समाज से बीरेंद्र सिंह मंत्री हैं. फिर भी बीजेपी की छवि गैर जाट पॉलिटिक्स करने वाली पार्टी की ही बनी हुई है.”



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हरियाणा की आठ सामान्य सीटों में से छह पर बीजेपी ने गैर जाट प्रत्याशी उतारे. उन सीटों पर अन्य पार्टियों ने जाट प्रत्याशी उतारे. इससे जाट वोटर बंट गए और गैर जाट वोटरों का ध्रुवीकरण हुआ. इस तरह जाटलैंड में गैर जाट का कार्ड चल गया. सिर्फ भिवानी-महेंद्रगढ़ और हिसार सीट पर उसने जाट प्रत्याशी उतारे. हरियाणा में रोहतक जाटों का गढ़ है. कांग्रेस, जन नायक जनता पार्टी और इनेलो ने यहां जाट प्रत्याशी उतारे थे. लेकिन बीजेपी ने यहां अरविंद शर्मा के रूप में ब्राह्मण चेहरे पर दांव लगाया था.

इस सीट पर कांग्रेस ने अपने मौजूदा सांसद दीपेंद्र हुड्डा को उतारा था. जो चुनाव हार गए हैं. वो लगातार 10 साल तक हरियाणा के सीएम रहे भूपेंद्र हुड्डा के बेटे हैं. इस सीट पर इनेलो ने धर्मवीर फौजी और जननायक जनता पार्टी-आप गठबंधन ने प्रदीप देशवाल पर भरोसा किया था. बीजेपी छोड़कर सभी ने जाट प्रत्याशी पर दांव लगाया.  जिससे बीजेपी की राह आसान हो गई.

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इस सीट पर 2019 से पहले दो उप चुनावों को मिलाकर 18 बार लोकसभा इलेक्शन हुए थे. जिसमें से 11 बार कांग्रेस जीती थी. यह हुड्डा परिवार की पारंपरिक सीट कही जा सकती है. दीपेंद्र हुड्डा यहां से तीन बार सांसद बने हैं. चार बार भूपेंद्र हुड्डा ने भी यहां का प्रतिनिधित्व किया. दीपेंद्र के दादा रणवीर सिंह हुड्डा भी यहां से दो बार सांसद बने. ऐसे में इस सीट को बीजेपी के खाते में जाना कांग्रेस के लिए चिंता का विषय है.

जाट बहुल सोनीपत सीट पर भी बीजेपी ने गैर जाट कार्ड ही चला था. पार्टी ने अपने मौजूदा सांसद रमेश कौशिक को फिर मैदान में उतारा था. जबकि कांग्रेस ने यहां अपने सबसे बड़े चेहरे भूपेंद्र सिंह हुड्डा को उतारा था जो रोहतक से चार बार सांसद रहे हैं. लगातार एक दशक तक मुख्यमंत्री रहे हैं. वो हार गए हैं. उनका हारना कांग्रेस के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. यहां एक और बड़ा नाम था दिग्विजय चौटाला. जो अपनी जननायक जनता पार्टी से चुनाव लड़ रहे थे. उन्हें आम आदमी पार्टी ने समर्थन दिया था. इनेलो ने सुरेंद्र छिकारा को टिकट दी थी. कुल मिलाकर बीजेपी को छोड़कर अन्य सभी महत्वपूर्ण दलों ने जाटों पर भरोसा किया था. बीजेपी को यहां भी गैर जाट वोटों के ध्रुवीकरण का फायदा मिला.

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First published: May 23, 2019, 4:28 PM IST
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