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चुनावी चक्रव्यूह में फंसी हरियाणा के तीनों 'लालों' की नई पीढ़ी!

चौधरी देवीलाल को श्रद्धांजलि  देते हुए दुष्यंत चौटाला (file photo)
चौधरी देवीलाल को श्रद्धांजलि देते हुए दुष्यंत चौटाला (file photo)

लोकसभा चुनाव 2019: हरियाणा के सियासी महाभारत में आज भी ‘परिवार पॉलिटिक्स’ पर ही भरोसा, कभी चलता था देवीलाल, बंसीलाल और भजनलाल का सिक्का, अब इनकी नई पीढ़ी है मैदान में

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हरियाणा की सभी 10 लोकसभा सीटों पर 12 मई को वोट डाले जाएंगे. इस चुनावी महाभारत में यहां की सभी प्रमुख पार्टियों ने परिवारवाद पर पूरा भरोसा किया है. चाहे वो छोटी पार्टी हो या बड़ी. यहां की सियासत के तीन प्fिरमुख स्तंभ थे देवीलाल, बंसीलाल और भजनलाल. संयोग से इस बार तीनों 'लालों' की नई पीढ़ी चुनावी मैदान में हैं और बुरी तरह से चक्रव्यूह में फंसे हुए हैं. हिसार में तो तीन राजनीतिक परिवारों के लोग अपनी किस्मत आजमा रहे हैं.

हिसार कभी भजनलाल का गढ़ हुआ करता था. भजन लाल के बाद यहां का नेतृत्व उनके बेटे कुलदीप विश्नोई ने किया.  2005 में जब कांग्रेस ने भजनलाल को सीएम नहीं बनाया तो यह परिवार उससे नाराज हो गया. कुलदीप विश्नोई ने हरियाणा जनहित कांग्रेस (बीएल) बनाई. लेकिन वो पार्टी ज्यादा नहीं चल पाई और विश्नोई उसका विलय करके कांग्रेस में वापस आ गए. अब उनके बेटे भव्य विश्नोई को पार्टी ने हिसार लोकसभा सीट से टिकट दी है. (ये भी पढ़ें: कांग्रेस ने क्या इसलिए काट दी रॉबर्ट वाड्रा के करीबी की लोकसभा टिकट!)

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चौधरी देवीलाल के प्रपौत्र दुष्यंत चौटाला अपनी पार्टी जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) की टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. वो यहां से मौजूदा सांसद हैं. 2014 में वो इनेलो की टिकट पर सांसद बने थे लेकिन परिवार में फूट पड़ी तो उन्होंने जेजेपी नामक नई पार्टी बना ली. देवीलाल देश के उप प्रधानमंत्री रहे थे. यहां परिवारवाद का एक और बड़ा उदाहरण हैं बिजेंद्र सिंह. जो 1998 बैच के आईएएस थे. लेकिन अब नौकरी छोड़कर पारिवारिक विरासत को संभालने राजनीति में उतर आए हैं. वो बीजेपी की टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. वो हरियाणा के बड़े जाट नेता और केंद्रीय मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह के बेटे हैं. तीन बड़े सियासी घराने एक दूसरे के चुनावी चक्रव्यूह में फंसे हुए हैं.
चौधरी देवीलाल के परिवार से दो और लोग लोकसभा के चुनावी रण में हैं. हरियाणा के पूर्व सीएम ओम प्रकाश चौटाला के पुत्र अभय चौटाला के छोटे बेटे अर्जुन चौटाला कुरुक्षेत्र से इनेलो के उम्मीदवार हैं. तो अजय चौटाला के बेटे दिग्विजय चौटाला सोनीपत से जेजेपी उम्मीदवार हैं. अजय चौटाला ओम प्रकाश चौटाला के बड़े बेटे हैं. कुरुक्षेत्र को जीतना बीजेपी की नाक का सवाल बना हुआ है, क्योंकि यहां से उसके सांसद रहे राजकुमार सैनी अब न सिर्फ बागी हो गए हैं बल्कि उन्होंने लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी बना ली है. बीजेपी ने उनकी काट के लिए हरियाणा के श्रम एवं रोजगार राज्य मंत्री नायब सिंह सैनी को उतारा हुआ है. ऐसे में अर्जुन चौटाला की राह आसान नहीं है.

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जहां तक दिग्विजय चौटाला की बात है तो सोनीपत से उनकी राह भी आसान नहीं दिख रही है क्योंकि उनके सामने कांग्रेस से भूपेंद्र हुड्डा खड़े हैं. हरियाणा के तीसरे लाल का परिवार भी चुनाव मैदान में है. भिवानी-महेंद्रगढ़ सीट से कांग्रेस नेत्री किरण चौधरी की बेटी श्रुति चौधरी मैदान में हैं. वो हरियाणा के सीएम रहे बंसीलाल की पौत्री हैं. श्रुति 2009 में यहां से कांग्रेस की सांसद रह चुकी हैं. इस बार भी कांग्रेस ने उन्हें टिकट दी है.

कांग्रेस ने यहां पर पूर्व सीएम रहे भूपेंद्र सिंह हुड्डा के परिवार पर भरोसा जताया है. हुड्डा पिता-पुत्र दोनों मैदान में हैं. रोहतक में दीपेंद्र हुड्डा चुनाव लड़ रहे हैं तो सोनीपत में भूपेंद्र हुड्डा. हालांकि, कांग्रेस ने उन्हें इन दोनों नेताओं को यूं ही टिकट नहीं दी है. दीपेंद्र हुड्डा रोहतक से तीन बार सांसद रह चुके हैं. चार बार भूपेंद्र हुड्डा भी इस सीट से सांसद थे. दीपेंद्र के दादा रणवीर सिंह हुड्डा भी यहां से दो बार सांसद बने थे. सोनीपत सीट भी जाट बहुल है इसलिए कांग्रेस ने यहां खुद भूपेंद्र सिंह हुड्डा को उतार दिया है.

वरिष्ठ पत्रकार नवीन धमीजा कहते हैं, “हरियाणा की सियासत ही ऐसी है कि यहां कांग्रेस और बीजेपी भी कई बार परिवारों को टिकट देने के लिए मजबूर हो जाते हैं. बीरेंद्र सिंह राज्यसभा सांसद और मंत्री हैं, उनकी पत्नी प्रेमलता विधायक हैं और बेटा आईएएस अफसरी छोड़कर सांसद बनने के लिए मैदान में उतरा हुआ है.”

धमीजा कहते हैं, “आज के दो दशक पहले तक हरियाणा में तीन ‘लालों’ ( देवीलाल, बंसीलाल और भजनलाल) का ही बोलबाला था. इन्हीं में से कोई पक्ष में तो कोई विपक्ष में होता था. तीसरे, चौथे किसी पावर की एंट्री नहीं थी. लेकिन भूपेंद्र सिंह हुड्डा के उभार के बाद यह तिलिस्म टूटने लगा. बंसीलाल और भजनलाल की मौत के बाद उनकी अगली पीढ़ी इतनी सशक्त नहीं हुई. हालांकि, देवीलाल की विरासत काफी हद तक ओम प्रकाश चौटाला ने संभाली. हरियाणा की जो लोकल पार्टियां हैं उन्होंने परिवार को बढ़ाया, कार्यकर्ता हमेशा हाशिए पर रहे. यही वजह है कि ऐसी पार्टियां जनाधार खोकर अपने परिवार तक ही सिमट गईं हैं.”

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