पानी की कहानी: यमुना की रेत में अस्थि विसर्जन को मजबूर हुए लोग

हरियाणा के करनाल, सोनीपत और पानीपत में यमुना किनारे बसे गांवों में एक नई परम्परा जन्म ले रही है. यमुना के सूख जाने की वजह से वहां कुछ ऐसा हो रहा है. जिसके बारे में कभी किसी ने सोचा भी नहीं होगा. मामले की पड़ताल के लिए न्यूज18 की टीम उन गांवों का दौरा करने निकली.

  • News18India
  • Last Updated: June 11, 2018, 12:11 AM IST
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एक नदी दम तोड़ रही है. एक नदी धीरे-धीरे रेगिस्तान में तब्दील हो रही है. नदी का रूप ऐसा बदला है कि अब वो नाले की तरह दिखती है. और इसके साथ नदी से जुड़ी परम्पराएं भी बदलने लगी हैं. ये दर्दनाक कहानी हरियाणा और दिल्ली से होकर गुजरने वाली यमुना नही की है. यमुना से सटे कई इलाकों में पानी एकदम सूख चुका है और इसकी वजह से वहां लोग अपने परिजनों की अस्थियों को रेत में दबा रहे हैं. जब कभी यमुना में पानी आए तो उनके अपनों की आत्मा को शान्ति मिल सके.



हरियाणा के करनाल, सोनीपत और पानीपत में यमुना किनारे बसे गांवों में एक नई परम्परा जन्म ले रही है. यमुना के सूख जाने की वजह से वहां कुछ ऐसा हो रहा है. जिसके बारे में कभी किसी ने सोचा भी नहीं होगा. मामले की पड़ताल के लिए न्यूज18 की टीम उन गांवों का दौरा करने निकली.



यमुना में पानी ना होने की वजह से लोग अपने परिजनों की अस्थियों को यमुना की रेत में ही दबा रहे हैं. ताकि जब पानी आए तो धारा के साथ अस्थियां रेत से निकलकर यमुना में प्रवाहित हो जाएं. पानीपत के अलीपुर गांव से गुजरते हुए न्यूज18 की मुलाकात नफे सिंह से हुई. नफे सिंह यहां अपने भाई की अस्थियां यमुना में प्रवाहित करने आए थे. लेकिन यमुना का तो यहां नामो-निशान तक मौजूद नहीं था. लिहाजा उन्होंने रेत में एक गड्ढा खोदा और उसी में अपने भाई की अस्थियां प्रवाहित कर दीं.





नफे सिंह ने अपने भाई की अस्थियों को यमुना के रेत में दबाईं.

मान्यता है कि दाह संस्कार के बाद अस्थियों को नदी में विसर्जित करने से मरने वाले की आत्मा को शांति मिलती है. हजारों सालों से ये परम्परा चली आ रही है, लेकिन आज यमुना की जर्जर हालत ने परम्पराओं को बदलने पर मजबूर कर दिया है. कहानी सिर्फ एक शख्स या किसी एक गांव की नहीं है. यमुना किनारे के गांवों का दौरा करते वक्त हमें कई ऐसे लोग मिले जो नदी की बदहाली की वजह से हजारों सालों से चली आ रहीं परम्पराएं पूरी नहीं कर पा रहे. कभी इस नदी के पानी में लोग आस्था की डुबकी लगाते थे, लेकिन आज नाले की तरह दिख रही यमुना के पानी को हाथ लगाने से भी डर लगता है.



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आस्थावान आज भी यमुना के किनारे धूप-बत्ती करने आते हैं. लेकिन उड़ती रेत में ना तो उनके चढ़ावे सही-सलामत बचते हैं, ना ही भगवान की तस्वीर एक जगह टिकती है. यमुना के वजूद की तलाश में न्यूज18 की टीम आगे निकली तो फिर एक गड्ढे के किनारे कुछ महिलाओं का झुंड दिखाई दिया. ये महिलाएं भी यहां किसी धार्मिक अनुष्ठान को पूरा करने आई हैं, लेकिन पानी को हाथलगाने से पहले दिल पर पत्थर रखना पड़ा.



हरियाणा से दिल्ली की तरफ बहने वाली यमुना नदी पर तकरीबन 500 गांव निर्भर हैं. अब नदी के सूख जाने से गांवों की लम्बे समय से चली आ रहीं परम्पराएं लुप्त हो रही हैं. पानी ना मिलने से फसलों को नुकसान हुआ है, और पशु-पक्षियों की जिंदगी दूभर हो गई है. 60 साल के भोपाल सिंह रोज अपने जानवरों को लेकर यमुना की रेत पर आते हैं. उनके मुताबिक ये बेहद मुश्किल हालात हैं और मजबूरी में लोग रेत में अस्थियां विसर्जित कर रहे हैं.



भोपाल सिंह




हर साल गर्मियों में यमुना में पानी तभी आता है जब हथिनीकुंड बैराज से पानी छोड़ा जाता है, लेकिन इस साल अभी तक पानी नहीं छोड़ा गया है. ऐसे में अन्तिम संस्कार से जुड़े विधि-विधान के लिए कुछ लोग हरिद्वार का रुख कर रहे हैं. लेकिन हर कोई हरिद्वार जाने तक का खर्च नहीं उठा सकता, लिहाजा वो यमुना की रेत से पितरों की आत्मा को शांति देने की अपील कर रहा है.



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यमुना से जुड़ी पौराणिक कथाएं आज भी आम जनमानस के जेहन में गहरे पैठी हैं. इन नदी का रिश्ता भगवान कृष्ण से जोड़ा जाता है. कृष्ण की कई लीलाएं यमुना के किनारे ही हुई हैं, लेकिन अब डर ये है कि कहीं यमुना का वजूद किस्से-कहानियों तक ही ना सिमट जाए.  लिहाजा आम लोगों से लेकर सामाजिक कार्यकर्ता तक और श्रद्धालुओं से लेकर पुजारी तक हर कोई इसी कोशिश में लगा है कि जल्द से जल्द यमुना अपने पुराने रूप में लौट आए.
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