Teachers Day Special: स्ट्रीट लाइट स्कूल ने मिटाया अशिक्षा का अंधकार, 150 बच्चों का भविष्य संवार रहा ये शख्स
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Teachers Day Special: स्ट्रीट लाइट स्कूल ने मिटाया अशिक्षा का अंधकार, 150 बच्चों का भविष्य संवार रहा ये शख्स
स्ट्रीट लाइट की रोशनी में पढ़ते बच्चे

नरेश ने इन प्रवासी मजदूरों के रहन-सहन को देखा और उनसे बच्चों को स्कूल में भेजने की बात कही, लेकिन वे लोग तैयार नहीं हुए.

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रोहतक. 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस (Teachers day) है. हमारे देश में गुरूओं को सम्मान देने के लिए हर साल सरकारी और गैर-सरकारी तौर पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है, शिक्षा के क्षेत्र में बेहतरीन योगदान देने वाले शिक्षकों को सम्मानित भी किया जाता है. हरियाणा (Haryana) के रोहतक (Rohtak) जिले में एक ऐसी शख्सियत है, जो किसी सरकारी या प्राईवेट स्कूल में नहीं, बल्कि स्ट्रीट लाईट में बच्चों को पढ़ाते हैं. इनका स्कूल भी सुबह 7 बजे नहीं, बल्कि शाम को 6 बजे लगता है और एक ही कक्षा में आपको पहली से दसवीं तक के विधार्थी मिल जाएंगे.

रोहतक के सेक्टर-5 में स्थित ये स्कूल पिछले 15 साल से हर शाम स्ट्रीट लाईट के नीचे प्रवासी मजदूरों के बच्चे पढ़ते हैं और उनको पढ़ाने वाले शिक्षक का नाम है नरेश कुमा. दरअसल दूसरे प्रदेशों से आए प्रवासी मजदूर हरियाणा में मजदूरी करने के लिए आते हैं और यहां पर अपने बच्चों के साथ रहते हैं. ज्यादातर अनपढ़ होने के कारण इन्हें शिक्षा में रूचि कम होती है और अपने बच्चों को भी मजदूरी के काम में लगा लेते हैं.

पहले दिन स्कूल में आए थे सिर्फ 3 बच्चे



नरेश ने इन प्रवासी मजदूरों के रहन-सहन को देखा और उनसे बच्चों को स्कूल में भेजने की बात कही, लेकिन वे लोग तैयार नहीं हुए. बाद में उन्होंने खुद ही बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा लिया और उनके घरों में जाकर बताया कि वे शाम को गली में खुद पढ़ाएंगे और आप बच्चों को पढ़ने के लिए भेज दें. पहले दिन सिर्फ तीन बच्चे आए, लेकिन अगले दिन संख्या पांच हो गई और धीरे-धीरे एक-दूसरे को देखकर सिलसिला बढ़ता गया, जिस कारण पिछले 15 साल से तकरीबन 150-200  बच्चे रोजाना नरेश कुमार की कक्षा में आते हैं.
सरकारी स्कूलों में करवाया रजिस्ट्रेशन

नरेश ने सभी बच्चों को मुख्यधारा से जोड़कर सरकारी स्कूलों में रजिस्टेशन भी करा दिया. अब ये बच्चे दिन में स्कूल में पढ़ते हैं और रात को स्ट्रीट लाईट की रोशनी में. इनके मां-बाप भी शिक्षा के महत्व को समझने लगे और अब बच्चों को मजदूरी पर न लगाकर स्कूलों में भेजने लगे हैं.

पति-पत्नी ने मिलकर अंधकार को मिटाने की ठानी

नरेश कुमार पेशेवर शिक्षक नहीं हैं, सिर्फ समाजसेवा करते हैं, उनकी पत्नी शिक्षक है और घर का गुजारा भी उन्हीं की तनख्वाह से चलता है. दोनों पति-पत्नी ने मिलकर इस अंधकार को मिटाने की ठानी है. हर शाम 6 बजे वे अपनी साईकिल से यहां पहुंच जाते हैं. कोई नया मजदूर परिवार आता है तो सभी बच्चे जागरूकता रैली निकालते हैं और उनके घर जाकर बच्चों को पढ़ने के लिए भेजने की गुजारिश करते हैं. हालांकि इनके इस स्ट्रीट स्कूल को भी कई बार बंद कराने का प्रयास किया गया.

8-10 बार बदल चुके हैं जगह

आसपास के लोगों ने शोर होने के कारण दूसरी जगह शिफ्ट करने को बोला है, जिस कारण ये 15 साल में 8-10  बार जगह बदल चुके हैं. फिलहाल रोहतक में दो जगह इनकी कक्षाएं चलती हैं. नरेश कुमार का कहना है कि वे इस स्कूल को बंद नहीं करेंगे, चाहे इसके लिए उन्हें शहर के बाहर चैराहे पर कक्षा क्यों न लगानी पड़े. हालांकि उन्होंने माना कि ऐसे कुछ ही लोग हैं, जिन्हें ये पसंद नहीं है. ऐसे लोग भी हैं, जो इन बच्चों को किताबें, कापियां और स्टेशनरी का सामान दे जाते हैं.

बच्चे बोले- सर कभी नहीं लेते छुट्टी

यहां पढ़ने वाले बच्चों का कहना है कि वे हर रोज शाम को खुले आसमान के नीचे आ जाते हैं और बेशक गर्मी-सर्दी या बारिश आ जाए, वे रोज आते हैं. नरेश सर कभी भी छुट्टी नहीं करते. कोई अपने बच्चों को भी इतना समय नहीं देता, जितना वे हमें देते हैं. सर पहले हमें पढ़ाते हैं और फिर हम छोटे बच्चों को पढ़ाने में उनकी मदद करते हैं.

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