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पत्‍नी अगर 'विवाहेत्तर संबंध बनाने की एक गलती' कर दे तब भी वह भरण-पोषण का दावा कर सकती है: हाईकोर्ट

 पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि 'पत्नी द्वारा विवाहेत्तर संबंध बनाने या ऐसी कोई चूक' उसे भरण-पोषण का दावा करने से वंचित नहीं करेगी.  (File Photo)

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि 'पत्नी द्वारा विवाहेत्तर संबंध बनाने या ऐसी कोई चूक' उसे भरण-पोषण का दावा करने से वंचित नहीं करेगी. (File Photo)

पत्नी ने स्वयं के लिए और अपने तीन नाबालिग बच्चों की ओर से सीआरपीसी की धारा 125 के तहत यह कहते हुए मामला दर्ज कराया था क ...अधिक पढ़ें

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हाइलाइट्स

पत्नी ने अपने व 3 बच्चों के लिए की थी भरण-पोषण भत्ते की मांग
पति ने आरोप लगाया था कि पत्नी 2005 में विवाहेत्तर संबंध में थी
पत्नी ने कोर्ट से कहा- इस बारे में पति को पता था, फिर साथ रहे

चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि ‘पत्नी द्वारा विवाहेत्तर संबंध बनाने या ऐसी कोई एक चूक’ उसे भरण-पोषण का दावा करने से वंचित नहीं करेगी. अपनी इस​ टिप्पणी के साथ रेवाड़ी में एक पारिवारिक अदालत के आदेश को रद्द करने की मांग करने वाले एक व्यक्ति की याचिका को उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया. द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर 2021 में रेवाड़ी परिवार अदालत ने अतिरिक्त सबूत के लिए एक हस्तलेख विशेषज्ञ के माध्यम से अपनी पत्नी के कथित लेखन को साबित करने के लिए याचिकाकर्ता के आवेदन को अस्वीकार कर दिया था. याचिकाकर्ता के मुताबिक उसकी पत्नी ने 2005 में लिखित रूप में अपने ‘विवाहेत्तर संबंध’ के बारे में स्वीकार किया था.

पत्नी ने स्वयं के लिए और अपने तीन नाबालिग बच्चों की ओर से सीआरपीसी की धारा 125 के तहत यह कहते हुए मामला दर्ज कराया था कि उसकी शादी अप्रैल 2004 में याचिकाकर्ता के साथ संपन्न हुई थी. लेकिन याचिकाकर्ता (पति) ने उसकी उपेक्षा की है, उसे और 3 बच्चों को पालने से मना कर दिया. याचिकाकर्ता ने अपनी पत्नी के आरोपों का इस आधार पर विरोध किया कि उसके विवाहेत्तर संबंध थे और उसने मई 2005 में लिखित रूप में इसे स्वीकार किया था. उसने बच्चों का जैविक पिता होने पर भी संशय जताया. याचिकाकर्ता की ओर से मामले में पेश साक्ष्यों को कोर्ट द्वारा एग्जामिन करने के बाद, उसने एक हस्तलेख विशेषज्ञ के माध्यम से पत्नी द्वारा 2005 में लिखे गए पत्र की जांच कराने के लिए आवेदन दिया.

पत्नी के वकील द्वारा इस आवेदन का विरोध किया गया और यह आरोप लगाया गया कि दस्तावेज याचिकाकर्ता के संज्ञान में और उसकी कस्टडी में था. प्रतिवादी के वकील ने कोर्ट से कहा कि उसे (पति) सबूत पेश करने का पर्याप्त अवसर दिया गया और मामले में कमी को भरने के लिए जानबूझकर वर्तमान आवेदन को विलंबित चरण में पेश किया गया है. पत्नी ने अदालत से क​हा कि उक्त पत्र के बाद भी, वह और याचिकाकर्ता (पति) साथ रहे और 2003, 2006, 2017 में तीन बच्चों का जन्म हुआ. प्रतिवादी पक्ष के वकील ने कहा कि विवाहेत्तर संबंध के आरोप पुराने हैं और बाद की घटनाओं से संकेत मिलता है कि याचिकाकर्ता द्वारा उक्त कथित कृत्य को माफ कर दिया गया था.

जज ने मामले में क्या फैसला दिया?
न्यायमूर्ति विवेक पुरी की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि याचिकाकर्ता मामले से अच्छी तरह वाकिफ था. भरण-पोषण के लिए प्रतिवादी के दावे को सेटल करने के लिए इस तथ्य को स्थापित करना आवश्यक था. जज ने कहा कि यहां यह उल्लेख करना अनुचित नहीं होगा कि पत्नी के भरण-पोषण   के दावे को गलत साबित करने के लिए, वह अपने जैविक बच्चों के पितृत्व को विवादित करने की हद तक चला गया है, जो याचिकाकर्ता और प्रतिवादी के साथ रहने के दौरान पैदा हुए. जस्टिस पुरी ने कहा, ‘सीआरपीसी की धारा 125 एक सामाजिक उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए है. यह सामाजिक कानून का एक हिस्सा है, जो उस पत्नी को भरण-पोषण के रूप में संक्षिप्त और त्वरित राहत प्रदान करता है, जो अपना और अपने बच्चों का भरण-पोषण करने में असमर्थ है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘भरण-पोषण से इनकार किया जा सकता है, यदि यह साबित और स्थापित हो जाता है कि पत्नी विवाहेत्तर संबंध में रह रही है. इसका अर्थ है वह अपने पति से अलग, दूसरे व्यक्ति के साथ लगातार रहती है. यह कभी-कभार या एक बार की चूक नहीं हो सकता. पत्नी की एक चूक उसे भरण-पोषण का दावा करने से वंचित नहीं करेगी. पत्नी के विवाहेत्तर संबंध को साबित करने की जिम्मेदारी पति पर होती है. जब तक यह नहीं पाया जाता है कि प्रासंगिक समय पर, पत्नी वास्तव में विवाहेत्तर संबंध में रह रही थी, वह भरण-पोषण का दावा करने से वंचित नहीं है.’ हाईकोर्ट ने कहा कि विवाहेत्तर संबंध अतीत की बात नहीं होनी चाहिए, बल्कि याचिका की प्रस्तुति के समय यह जारी रहनी चाहिए. इस मामले में यह आरोप कि प्रतिवादी (पत्नी) 2005 में विवाहेत्तर संबंध में रह रहा थी, उसके पति को यह बात पता थी, बावजूद इसके दोनों साथ रहे और 3 बच्चों का जन्म हुआ, एक ऐसी परिस्थिति है जिसमें साबित होता है कि उक्त कृत्य के लिए पति ने पत्नी को माफ कर दिया था. इस तरह वर्षों पुराने मामले को आधार बनाकर पत्नी को भरण पोषण भत्ता देने से वंचित नहीं रखा जा सकता.

Tags: Court Comment, Family Court, Haryana News Today

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