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खेती से बंपर मुनाफा चाहिए तो इन 'कृषि क्रांतिकारी' किसानों से लें टिप्स!

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: January 30, 2019, 5:08 PM IST
खेती से बंपर मुनाफा चाहिए तो इन 'कृषि क्रांतिकारी' किसानों से लें टिप्स!
उन किसानों से मिलिए जिन्हें मिलने जा रहा है पद्मश्री

अगर आप घाटे वाली खेती को फायदे में बदलना चाहते हैं तो आपको देश के इन दस किसानों से जरूर मिलना चाहिए, जिन्हें मोदी सरकार दे रही है पद्म पुरस्कार

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  • Last Updated: January 30, 2019, 5:08 PM IST
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कृषि और किसानों को लेकर सरकार विपक्ष के निशाने पर है. आम धारणा बन गई है कि खेती घाटे का सौदा है और किसान हमेशा कर्ज में डूबा रहता है. लेकिन यह पूरा सच नहीं है. देश में हजारों किसान ऐसे हैं जिन्होंने अपने संघर्ष से खेती-किसानी को न सिर्फ मुनाफे का सौदा बनाया है बल्कि लोगों को रोजगार भी दे रहे हैं. ऐसे ही दस किसानों को मोदी सरकार ने पद्मश्री के लिए चयनित किया है. किसानों को पहली बार पद्म पुरस्कार मिलेगा.

इनमें से ज्यादातर किसानों ने रासायनिक खाद छोड़ा है. जैविक खेती से न सिर्फ खुद अच्छा मुकाम किया है बल्कि हजारों लोगों को इसके लिए प्रेरित किया. कुछ किसान पारंपरिक खेती छोड़कर नई फसलों पर काम शुरू करके यह साबित किया है कि खेती-किसानी में कुछ नया करके कैसे आय कई गुना बढ़ाई जा सकती है. आईए मिलते हैं इन किसानों से.

राजकुमारी देवी, बिहार

बिहार की राजकुमारी देवी को इस बार पद्मश्री के लिए चयनित किया गया है. वो मुजफ्फरपुर के आनंदपुर गांव की रहने वाली हैं. उन्होंने साइकिल चाची, किसान चाची, किसानश्री से होते हुए पद्मश्री तक का सफर तय किया है. राजकुमारी देवी ने जब पहली बार घर के बाहर कदम रखा था तो उन्हें समाज के ताने और तिरस्कार से दो-चार होना पड़ा. लेकिन किसानों के बीच क्रांति की अलख जगाने वाली किसान चाची आज हजारों महिलाओं की आदर्श हैं. (इसे भी पढ़ें: देश के इतिहास में किसानों को पहली बार मिलेगा पद्मश्री, 2013 में उठी थी आवाज)

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आर्थिक तंगी की हालत में उन्होंने कुछ नया करने को सोचा. पहले तो राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय से उन्नत कृषि की जानकारी ली. पपीता और ओल की खेती शुरू की. ओल का अचार और आटा बनाकर बनाकर बेचा. साइकिल पर घर-घर जाकर इसकी बिक्री शुरू की. गांव की महिलाओं को जब इसका पता चला तो वे भी सीखने आने लगीं. उनके बनाए अचार की तारीफ अमिताभ बच्चन भी कर चुके हैं.

जगदीश प्रसाद पारिख, राजस्थान
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71 साल के जगदीश प्रसाद पारिख सीकर जिले के अजीतगढ़ निवासी हैं. जैविक खेती में किए जाने वाले नए प्रयोगों के लिए उन्हें देश का चौथा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान मिलेगा. कीटनाशकों के बोलबाले वाले दौर में उन्होंने जैविक खेती का रुख किया. यह आसान नहीं था. पारिख किसान जरूर हैं पर काम कृषि वैज्ञानिक की तरह करते हैं. सब्जियों की नई किस्म विकसित करने में लगे रहते हैं. सामान्य से काफी बड़े आकार की सब्जियां पैदा करके उस भ्रम को तोड़ा है जिसमें यह माना जाता है कि आज के समय में बिना कीटनाशक के सब्जियां नहीं उगाई जा सकतीं. (ये भी पढ़ें: किसानों का अब सहारा बनेगा 'कालिया', हर साल करेगा 10 हजार की मदद!)

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पारिख ने आर्गेनिक खेती की शुरुआत वर्ष 1970 से ही कर दी थी. वो अपने खेत में 15 किलो वजनी गोभी का फूल, 12 किलो वजनी पत्ता गोभी, 86 किलो वजनी कद्दू, 6 फुट लंबी घीया, 7 फुट लंबी तोरई, 1 मीटर लंबा तथा 2 इंच मोटा बैंगन, 3 किलो से 5 किलो तक गोल बैंगन, 250 ग्राम का प्याज, साढ़े तीन फीट लंबी गाजर और एक पेड़ से 150 मिर्ची तक का उत्पादन कर चुके हैं.

कंवल सिंह चौहान, हरियाणा

हरियाणा में सोनीपत के रहने वाले किसान कंवल सिंह चौहान को पद्मश्री के लिए चयनित किया गया है. धान में हुए नुकसान के बाद जैविक खेती अपनाकर अटेरना और मनौली क्षेत्र को बेबी कॉर्न, स्वीट कॉर्न व मशरूम उत्पादन का हब बनाया. इस तरह वो किसानों के लिए प्रेरणा बन गए. उनका लक्ष्य प्रदेश के हर जिले में प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करके किसानों की आय को दोगुना नहीं 5 से 6 गुना करना है, ताकि किसी किसान का सिर कर्ज के पहाड़ के सामने कभी न झुके.

चौहान ने 1978 में धान की खेती शुरू की थी. 1997 में पहली बार बेबी कॉर्न की खेती करना शुरू किया. साल 2000 तक अटेरना गांव के अधिकतर किसानों ने कंवल सिंह की तरह ही बेबीकॉर्न व स्वीटकॉर्न उगाना शुरू कर दिया. अब दर्जनों गांवों के किसान कंवल सिंह चौहान के दिखाए रास्ते पर चलकर न सिर्फ खुद की आमदनी बढ़ा रहे हैं, बल्कि कई लोगों को रोजगार भी मुहैया करा रहे हैं.

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हुकुमचंद पाटीदार, राजस्थान

उम्र काफी हो चली है लेकिन पाटीदार में जज्बा बहुत है. झालावाड़ के मानपुरा गांव निवासी प्रगतिशील किसान हुकुमचंद पाटीदार को भी खेती-किसानी के लिए पद्मश्री दिया जाएगा. उन्होंने डेढ़ दशक पहले एक हेक्टेयर में जैविक खेती की शुरुआत की. पहली बार में उत्पादन घटकर 60 फीसदी रह गया, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. दूसरे साल 40 एकड़ जमीन में जैविक खेती की. जैविक उपज का अधिक दाम मिलता था इसलिए दूसरे किसान भी इसके लिए प्रेरित हुए.

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पाटीदार का मानना है कि रासायनिक खादों के इस्तेमाल से जीव-जंतु नष्ट होते जा रहे हैं, जिससे उर्वरा क्षमता घटती जा रही है. पाटीदार ने अपने खेत पर ही हरी खाद, गोबर खाद, जीवामृत, पंचगव्य रसायन सहित अन्य जैविक दवाइयां तैयार कीं. महाराणा प्रताप कृषि यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर ने उनको कई उपाय बताए जो इस खेती के लिए कारगर रहे. उनके यहां के जैविक उत्पाद आस्ट्रेलिया, जापान, न्यूजीलैंड, जर्मनी और फ्रांस तक जा रहे हैं.

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भारत भूषण त्यागी, उत्तर प्रदेश

बुलंदशहर के बीटा गांव निवासी हैं. जैविक खेती के क्षेत्र में देश मे लोहा मनवा चुके हैं. इन्हें भी इस सम्मान के लिए चुना गया है. जैविक खेती के क्षेत्र में इससे पहले भी उनको कई बार सम्मान मिल चुका है. त्यागी के पास करीब 50 बीघे जमीन है. उनके खेत में अनाज, सब्जी, फल, टिंबर की लकड़ी वाले पौधे, समेत कई 20-25 तरीके की फसलें हैं. ऐसा साल के लगभग हर महीने में होता है वो एक ही खेत में कई-कई फसलें एक साथ लेते हैं. अपने फार्म पर किसानों को मुफ्त में आर्गेनिक एवं उन्नत खेती करने का मुफ्त गुर सिखाते हैं.

रामशरण वर्मा, उत्तर प्रदेश

रामशरण वर्मा बाराबंकी के हरख ब्लॉक में आने वाले दौलतपुर गांव के रहने वाले हैं. टमाटर, केला, मेंथा और आलू की खेती में रामसरन ने नई क्रांति लाने का काम किया. कम लागत में ज्यादा उत्पादन का तरीका खोजा. देश के अलावा विदेशों के भी कृषि वैज्ञानिक, विशेषज्ञ इनकी प्रगतिशील खेती देखने आते हैं. साल 1986 में करीब 6 एकड़ से खेती की शुरुआत की थी. अब 150 एकड़ जमीन पर खेती कर रहे हैं. करीब 50 हजार किसान उनके साथ जुड़े हैं. उन सभी को वर्मा ने केला, टमाटर और आलू की फसल से जुड़ी तकनीक सिखाई है. वर्मा बताते हैं कि वो खेती से गांव के करीब 15 हजार लोगों को रोजगार दे रहे हैं.

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बाबूलाल दाहिया, मध्य प्रदेश

बाबूलाल दाहिया सतना जिले के पिथौराबाद गांव में रहते हैं. खेती-किसानी से पहले वो पोस्टमास्टर थे. नौकरी से रिटायर होने के बाद उन्होंने कृषि को संवारना शुरू किया. उनकी पहचान एक प्रगतिशील किसान की है. उन्हें मोदी सरकार ने पद्मश्री देने का फैसला किया है. हालांकि, वो शिवराज सिंह चौहान की सरकार में एक पुरस्कार को वापस कर चुके हैं. तब उनका मानना था कि एमपी में किसानों की जो स्थिति दिखाई जा रही है वैसी नहीं है. पिथौराबाद गांव में आप देसी धान की तकरीबन दो सौ किस्मों को खेत में लगे हुए देख सकते हैं.

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इनके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते है. यदि आपको लगता है कि देसी धान की किस्मों को बचाना चाहिए तो आपको यहां पर निशुल्क बीज भी मिल सकता है. दाहिया बिना रासायनिक खाद के 8 एकड़ में देशी धान उगा रहे हैं. उनके आसपास के 30 गांवों के किसान धान और मोटे अनाज (कोदो, कुटकी, ज्वार) की खेती कर रहे हैं. दाहिया के मुताबिक देशी धान स्वाद में बेजोड़ होता है, इसलिए दाम भी अच्छा मिलता है. जबकि हाईब्रि‍ड में स्वाद नहीं होता.

इसके अलावा जिन लोगों को यह सम्मान मिला है उनमें गुजरात के वल्लभभाई वासराभाई मारवानिया (आर्गेनिक किसान) शामिल हैं. वल्लभभाई को मधुवन गाजर किस्म के विकास और संवर्धन के लिए पहले ही राष्ट्रपति के हाथों राष्ट्रीय ग्रासरूट इनोवेशन अवार्ड से मिल चुका है. इसके अलाावा ओडिशा की कमला पुझारी भी इस सूची में हैं. जो आर्गेनिक फार्मिंग को प्रमोट करती हैं. वो ट्राइबल एग्रीकल्चर एक्टिविस्ट हैं.

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आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिला निवासी वेंकटेश्वर राव यदलापल्ली को भी आर्गेनिक फार्मिंग के लिए यह सम्मान दिया जाएगा. वो किसानों को इसके लिए प्रेरित भी करते हैं. एक अवॉर्ड एग्रीकल्चर साइंस के लिए बलदेव सिंह ढिल्लन को दिया जाएगा. वो पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर हैं.

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First published: January 30, 2019, 10:41 AM IST
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