विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस को चुकानी पड़ेगी आपसी कलह की कीमत, बीजेपी के आगे विपक्ष पस्त!

लोकसभा चुनाव में हारने के बाद संगठन विहीन कांग्रेस के दिग्गजों में हताशा, चौटाला परिवार में फूट से बिखर चुकी है इनेलो, बीजेपी के सितारे बुलंदियों पर

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: June 5, 2019, 5:17 PM IST
विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस को चुकानी पड़ेगी आपसी कलह की कीमत, बीजेपी के आगे विपक्ष पस्त!
हरियाणा में बुलंद हैं बीजेपी के हौसले
ओम प्रकाश
ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: June 5, 2019, 5:17 PM IST
लोकसभा चुनाव बीतने के बाद अब हरियाणा में विधानसभा की जंग की तैयारी शुरू हो गई है. सीएम मनोहरलाल खट्टर के हौसले बुलंद हैं, क्योंकि बीजेपी ने हरियाणा में लोकसभा की सभी दसों सीटें जीत ली हैं. जबकि कांग्रेसी कुनबा निराशा और आपसी कलह में घिरा हुआ है. हार की जिम्मेदारी कौन ले और आने वाले समय में कौन अगुआई करे, इसका फैसला नहीं हो पा रहा. पांच साल से जिलों में न कोई अध्यक्ष है न ब्लॉक अध्यक्ष. न मासिक बैठक होती है और न जनता की समस्याओं को लेकर संगठन की ओर से कोई धरना-प्रदर्शन. उधर, चौटाला परिवार आपसी कलह में इतना बिखर गया कि एक और पार्टी खड़ी हो गई. कुल मिलाकर बीजेपी की स्थिति विपक्ष ने और मजबूत कर दी है.

बीजेपी की नजर बहुमत से अधिक सीटों पर
विधानसभा चुनाव अगले पांच माह में होने हैं. लेकिन इसके लिए विपक्ष की तैयारियां जीरो हैं. उधर, बीजेपी न सिर्फ जमीनी स्तर पर तेजी से काम कर रही है बल्कि किसानों और युवाओं को लुभाने वाली योजनाएं लागू कर रही है. सीएम मनोहरलाल खट्टर लगभग सभी विधानसभा क्षेत्रों में रोड शो कर चुके हैं. 10 लोकसभा सीटों वाले प्रदेश से मोदी सरकार में तीन-तीन मंत्री बनवाकर बीजेपी ने संदेश दिया है कि उसकी नजर विधानसभा चुनाव में बहुमत से कहीं अधिक सीटें लाने पर है.

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हार से पस्त हैं कांग्रेसी दिग्गज
दूसरी ओर, हरियाणा में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा और उनके पुत्र दीपेंद्र सिंह हुड्डा को लोकसभा चुनाव में बीजेपी के हाथों हार का सामना करना पड़ा. रोहतक जैसे कांग्रेस के गढ़ में बीजेपी का कब्जा हो गया. प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर, पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा, भजनलाल के पौत्र भव्य बिश्नोई, किरण चौधरी की बेटी श्रुति चौधरी चुनाव हार गए. इससे पहले जींद उप चुनाव में पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला भी हार गए थे. ऐसे हालात के पीछे पार्टी की गुटबाजी और जमीनी पर संगठन की गैर मौजूदगी बड़ी वजह मानी जा रही है.
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ऐसे में क्या कर पाएंगे कांग्रेसी?
हुड्डा और तंवर गुट की वर्चस्व को लेकर लड़ाई हरियाणा में किसी से छिपी नहीं है. कांग्रेस की रैलियों में भी दोनों गुटों के कार्यकर्ता अलग-अलग रंग की पगड़ी पहनकर शक्ति प्रदर्शन करते हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस संगठन की यही स्थिति रही तो विधानसभा चुनाव में भी उसे कीमत चुकानी पड़ सकती है. हरियाणा में विधानसभा की 90 सीटें हैं. पिछला चुनाव अक्टूबर 2014 में हुआ था. बीजेपी ने यह चुनाव बिना चेहरे के लड़ा था. पीएम नरेंद्र मोदी की अगुआई में बीजेपी ने कांग्रेस के गढ़ रहे इस प्रदेश में 47 सीटें जीतीं और पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई.

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आरएसएस प्रचारक मनोहरलाल खट्टर को सीएम बनाया गया. तब उन्हें बीजेपी के अंदर और बाहर भी 'नौसिखिया' कहा जाता था, लेकिन खट्टर ने निकाय और लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन करके अपने विरोधियों के मुंह बंद कर दिए. ऐसे में माना जा रहा है कि बीजेपी मनोहरलाल खट्टर के ही चेहरे पर यहां का विधानसभा चुनाव लड़ेगी. जींद उप चुनाव जीतने के बाद बीजेपी के पास 48 सीट हो गईं हैं. इनेलो और कांग्रेस के पास सिर्फ 17-17 सीटें हैं.

बीजेपी और जाट बनाम गैर जाट वाली राजनीति
हरियाणा के वरिष्ठ पत्रकार नवीन धमीजा कहते हैं, "बीजेपी ने एक तरफ गैर जाटों का ध्रुवीकरण करवाया है तो दूसरी ओर जाटों को भी लुभाना नहीं छोड़ा है. उसके छह गैर जाट सांसद जीते हैं तो दो जाट भी हैं. हरियाणा में अधिकांश समय जाटों का शासन रहा है. कांग्रेस में कई बड़े जाट लीडर थे और हैं. गैर जाट हमेशा हाशिए पर रहे हैं. चाहे वो नौकरी की बात हो या फिर सियासत की. इसलिए कांग्रेस के इस गढ़ में पैठ बनाने के लिए बीजेपी ने गैर जाट फॉर्मूले पर काम किया. 2014 में मनोहरलाल खट्टर को सीएम बनाने के बाद बीजेपी की छवि गैर जाट पॉलिटिक्स करने वाली पार्टी की बनकर उभरी है."

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जाट और गैरजाट में बनाया संतुलन
नवीन धमीजा का मानना है, ''जाट आरक्षण आंदोलन के बाद से ही हरियाणा जाट बनाम गैर जाट वाली पॉलिटिक्स की प्रयोगशाला के तौर पर उभरने लगा था. हालांकि, बीजेपी ने जाट वोटरों में भी सेंध लगाने की कोशिश नहीं छोड़ी. इसलिए जाट समाज से आने वाले सुभाष बराला को अपना प्रदेश अध्यक्ष बनाकर उन्हें भी साधने की कोशिश जारी रही. मनोहरलाल कैबिनेट में इसी समाज के कैप्टन अभिमन्यु और ओम प्रकाश धनकड़ को जगह मिली हुई है. फिर भी बीजेपी की छवि गैर जाट पॉलिटिक्स करने वाली पार्टी की ही बनी हुई है. इसलिए वो विधानसभा चुनाव में एक तरफ गैर जाटों का ध्रुवीकरण करवाएगी तो दूसरी ओर जाटों को भी साधने की कोशिश नहीं छोड़ेगी."

इसलिए भी बीजेपी हुई मजबूत!
जाटों की सबसे बड़ी पार्टी इनेलो कही जाती थी लेकिन चौटाला परिवार में कलह के बाद यह पार्टी टूट गई. इनेलो से निकलकर अजय, दुष्यंत और दिग्विजय चौटाला ने जन नायक जनता पार्टी (जेजेपी) नाम से एक नई पार्टी बना ली है. इस बिखराव के बाद जींद उप चुनाव और लोकसभा चुनाव में दोनों पार्टियों का टेस्ट हुआ और पाया गया कि वे अलग होने के बाद काफी कमजोर हो गए. क्योंकि जाट वोट बंट गए.

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दूसरी ओर कांग्रेस जाट नेताओं पर दांव लगाती रही है, लेकिन उसके नेताओं की आपसी खींचतान की वजह से वो भी कमजोर हो चुकी है. इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिल रहा है. बीजेपी प्रवक्ता राजीव जेटली का कहना है कि कुछ पार्टियां अपने परिवार के लिए काम कर रही हैं जबकि हम जनता को परिवार मानकर काम कर रहे हैं. इसलिए जनता विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस, इनेलो, बसपा, जेजेपी और आम आदमी पार्टी को हराकर बीजेपी को कुर्सी सौंपेगी.

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First published: June 5, 2019, 2:57 PM IST
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