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हरियाणा में अपनी ही सरकार को क्यों घेर रहे हैं बीजेपी विधायक, कौन है इसके पीछे?

मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर (image credit: PTI)
मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर (image credit: PTI)

चार साल में यह तीसरा मौका है जब मनोहरलाल खट्टर के खिलाफ उनके विधायकों, नेताओं ने मोर्चा खोला है. पीएम नरेंद्र मोदी की पसंद होने की वजह से बचती रही है खट्टर की कुर्सी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 25, 2018, 6:10 PM IST
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हरियाणा का मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही मनोहरलाल खट्टर 'अपनों' को खटक रहे हैं. एक बार फिर बीजेपी के विधायक उनके खिलाफ मुखर होने लगे हैं, जबकि 2019 का लोकसभा चुनाव सिर पर है. सोमवार को मनोहर सरकार के एक मंत्री सहित चार विधायकों ने अपनी ही सरकार के खिलाफ बगावती तेवर अख्तियार कर लिए. चर्चा है कि इसकी स्क्रिप्ट केंद्रीय राज्य मंत्री राव इंद्रजीत (गुरुग्राम के सांसद) ने लिखी है, जिस पर दक्षिण हरियाणा के विधायकों ने प्रेस कांफ्रेंस करके अपनी ही सरकार के मुखिया को सवालों के घेरे में ले लिया है. खट्टर सरकार के चार साल के कार्यकाल में यह तीसरा मौका है जब दक्षिण हरियाणा के बीजेपी विधायकों ने सरकार को घेरा है. (ये भी पढ़ें: 2019 में बीजेपी के लिए क्यों जरूरी है 'अटल' पॉलिटिक्स)

पटौदी की बीजेपी विधायक बिमला चौधरी ने सोमवार को गुरुग्राम में एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई. इसमें गुरुग्राम की मेयर मधु आजाद, बावल से विधायक एवं मनोहर सरकार में राज्य मंत्री डॉ. बनवारी लाल, कोसली के विधायक एवं पूर्व मंत्री विक्रम ठेकेदार, नारनौल के विधायक ओम प्रकाश मौजूद थे. चौधरी ने सीएम खट्टर पर अनदेखी करने के आरोप लगाए. मंत्री बनवारी लाल एवं दो अन्य विधायकों ने कांफ्रेंस में कुछ नहीं कहा लेकिन बाद में मीडिया से बातचीत के दौरान चौधरी के आरोपों से सहमति जताई. ये सभी विधायक, मंत्री गुरुग्राम से सांसद एवं केंद्रीय राज्य मंत्री राव इंद्रजीत के समर्थक बताए जाते हैं.

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बिमला चौधरी ने कहा कि काफी समय से उनकी अनदेखी की जा रही है. शनिवार को पटौदी के लोकरा गांव में हुई सीएम की रैली में उन्हें बुलाया नहीं गया. सीएम को कई बार फोन किया लेकिन बात नहीं कराई गई. वह राव इंद्रजीत से अपील करेंगी कि उनकी मुलाकात पार्टी हाईकमान से कराएं. उन्होंने बिना किसी का नाम लिए दावा किया कि 24 और विधायकों की उपेक्षा हो रही है. गुरुग्राम की मेयर मधु आजाद ने भी अनदेखी का आरोप लगाया. (ये भी पढ़ें: क्यों 26 साल पहले बर्खास्त की गई थीं बीजेपी की चार राज्य सरकारें?)
हरियाणा के वरिष्ठ पत्रकार नवीन धमीजा कहते हैं कि राव इंद्रजीत सिंह की नजर लंबे समय से सीएम की कुर्सी पर है, इसलिए उनके और खट्टर के बीच किसी न किसी बहाने खींचतान होती रहती है, इसलिए कभी खुद तो कभी अपने समर्थक विधायकों को आगे करके राव इंद्रजीत मनोहरलाल खट्टर को असहज करते रहते हैं. इसकी वजह सिर्फ सीएम की कुर्सी की लालसा भर नहीं बल्कि अहीरवाल में उनके प्रतिद्वंदी नेता माने जाने वाले राव नरवीर को सीएम द्वारा तवज्जो देना भी है. नरवीर मनोहर कैबिनेट में लोक निर्माण एवं वन मंत्री हैं.

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धमीजा के मुताबिक, इंद्रजीत चाहते हैं कि दक्षिण हरियाणा खासतौर से अहीरवाल में उनकी बादशाहत कायम रहे, इसलिए वे नहीं चाहते कि राव नरवीर को तवज्जो दी जाए. इंद्रजीत के पिता राव वीरेंद्र सिंह हरियाणा के सीएम रहे हैं. राव इंद्रजीत 2014 में बीजेपी में आए थे. इससे पहले वे कांग्रेस में थे. यूपीए-1 में वे मंत्री थे, जिस तरह अब खट्टर पर निशाना साध रहे हैं वे 2014 से पहले कांग्रेस में रहते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तत्कालीन सीएम भूपेंद्र हुड्डा को असहज किए हुए थे.

इस बारे में राव इंद्रजीत के निजी सचिव नरेश शर्मा का कहना है कि राव कभी छिपकर कोई काम नहीं करते. जब भी कोई बात कहनी होती है खुलकर बोलते हैं. इन विधायकों की अपनी समस्या होगी इसलिए उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस की.

हालांकि, चार साल में तीन बार पार्टी में मनोहरलाल के खिलाफ आवाज उठने के बाद भी उन्होंने अपनी एक पारी लगभग पूरी कर ली है, क्योंकि उन्हें पीएम नरेंद्र मोदी का समर्थन हासिल है. इसलिए उन्हें अपने खिलाफ उठ रही आवाजों का असर तब तक नहीं होगा जब तक कि विधायक पार्टी न छोड़ दें और ये नौबत अभी दिख नहीं रही है. 90 सदस्यीय हरियाणा विधानसभा में बीजेपी के 47 विधायक हैं. भाजपा प्रवक्ता राजीव जेटली का कहना है कि मनोहलाल खट्टर पर तो दूसरी पार्टियों के विधायक भी कभी अनदेखी का आरोप नहीं लगाते, क्योंकि वे किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करते.

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मार्च 2017 में क्या हुआ था?
मार्च 2017 में बीजेपी के 16 विधायकों ने खट्टर के खिलाफ मोर्चा खोला था. विधायकों ने अलग बैठक कर मनोहरलाल सरकार पर भेदभाव का आरोप लगाया था. उनका कहना था कि नौकरशाह उनकी नहीं सुनते, काम नहीं करते. मुख्यमंत्री इससे पहले भी इसी आरोप पर पार्टी कार्यकर्ताओं से बात कर चुके हैं, लेकिन वे उनकी शिकायत दूर करने में सफल नहीं रहे. विधायकों का आरोप था कि सरकार में नौकरशाह निरंकुश हो गए हैं.

उस वक्त सरकार से नाराज विधायकों में गुरुग्राम के विधायक उमेश अग्रवाल प्रमुख थे. इसके अलावा रेवाड़ी के विधायक रणधीर कापड़ीवास, भिवानी से विधायक घनश्याम सर्राफ, कोसली के विधायक विक्रम ठेकेदार, केंद्रीय इस्पात मंत्री की पत्नी एवं उचाना की विधायक प्रेमलता, कालका की विधायक लतिका शर्मा, मुलाना के विधायक संतोष सारवान, बाढड़ा के विधायक सुखविंद्र श्योरण, बल्लभगढ़ के विधायक मूलचंद शर्मा, बहादुरगढ़ से विधायक नरेश कौशिक, नारनौल के विधायक ओम प्रकाश यादव, पटौदी से विधायक बिमला चौधरी, लाडवा के विधायक पवन सैनी एवं साढ़ौरा से बलवंत साढ़ौरा नाराज विधायकों की सूची में शामिल थे.

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मनोहरलाल के लिए कौन खड़ी करता है परेशानी?
दरअसल, मनोहर लाल उस हरियाणा में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री हैं जहां जाट राजनीति हावी रही है. सीएम पद की दौड़ में गुड़गांव के सांसद एवं केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत, फरीदाबाद के सांसद एवं केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गुर्जर और केंद्रीय मंत्री एवं जाट नेता बीरेंद्र सिंह भी थे. हरियाणा कैबिनेट में शिक्षा मंत्री रामविलास शर्मा, स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज और वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु भी सीएम पद के लिए अपनी दावेदारी ठोक रहे थे.

अनिल विज और मनोहरलाल में तो लंबे समय तक कई मसलों को लेकर टकराव चलता रहा है. राव इंद्रजीत सिंह ने तो जुलाई 2016 में यहां तक कहा था कि ‘चंडीगढ़ में दो कौड़ी के नेता फैसले लेते हैं’. उन्होंने दक्षिण हरियाणा में विकास को मुद्दा बनाकर मुख्यमंत्री के लिए मुश्किल खड़ी की. इससे पहले जब फरवरी 2016 में जाट आंदोलन में पूरा प्रदेश जल उठा था तब मनोहर लाल की कुर्सी खतरे में नजर आ रही थी. उनकी पार्टी के लोगों ने उनके खिलाफ माहौल बनाने की खूब कोशिश की, लेकिन दिल्ली दरबार से वीटो लग गया.

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करनाल के सांसद चोपड़ा भी रहे हैं नाराज
अफसरशाही के मसले पर करनाल से भाजपा सांसद अश्विनी चोपड़ा भी कभी मनोहर लाल खट्टर से नाराज रहे हैं, हालांकि अब उनके बीच पहले जैसी तल्खी नहीं है. मई 2015 में चोपड़ा ने कहा था कि प्रदेश में खट्टर की स्थिति मनमोहन सिंह जैसी है. मनमोहन नेक थे. सीएम भी ईमानदार हैं लेकिन उनके इर्द-गिर्द भ्रष्ट लोग हैं. अफसरशाही हावी है, लेकिन चोपड़ा की नाराजगी को पार्टी हाईकमान ने तवज्जो नहीं दी थी.

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