हरियाणवी विशेष: हरियाणा के संगीत की नवीनता की धुरी रागिणी गायन की शुरुआत कद अर क्योंकर होई, जाणो इस लेख म्ह

हरियाणवी विशेष: हरियाणा के संगीत की नवीनता की धुरी रागिणी गायन की शुरुआत कद अर क्योंकर होई, जाणो इस लेख म्ह
जब जब बाज्जै रागिणी धड़के दिल हर हरियाणवी का

जैसे-जैसे टैम का का बदलाव होता गया तै वैसे ही मनोरंजन के पैमानों का बदलाव होता गया.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 31, 2020, 1:43 PM IST
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पहल्यां हरियाणा म्ह मनोरंजन खातर कुश्ती, कब्बडी, सांग, रागिणी अर बाजीगर के खेल का आयोजन करया जाया करता. हरियाणा की संगीत शैली पारंपरिक ही रही सै. अड़ै के संगीत का जन्म लोक धरा म्ह ही होया था. हर वार-त्योहार, खुशी के मौकों पै, चैत, सामण अर कार्तिक के मौके पै, मौसम का बदलाव होण पै, फसलों की कटाई अर बुवाई के सारे पल शब्दां म्ह पिरोकै संगीतमय बनाए गए. गांव-देहात म्ह शादी-ब्याह,भात, जच्चा के गीत, सामण-भादव कार्तिक के गीत अर भजनां नै संगीत तै नया रुप दिया. महिलाओं के हंसी-मखौल, कढाई, बुनाई, घरेलू काम अर खेती –बाड़ी तक की बातें तुकबंदी की गेल्यां संगीतमय होती चली आई. आज गाए जाण आले पुराने गीत यानि लोकगीत ही संगीत के आरंभिक दौर का प्रमाण सै. धीरे धीरे देहात म्ह साँझी माई के भजन, तुलसी पूजा अर 12 महीनों के त्योहारां के यादगार लम्हें गाकै मनाए जाण लाग्गै थे. हरियाणा के लोकगीत,भजन,रागिणी,शब्दां तै संगीत के दौर की शुरुआत मानी गई सै.

जैसे-जैसे टैम का का बदलाव होता गया तै वैसे ही मनोरंजन के पैमानों का बदलाव होता गया. इसी बदलाव के कारण हरियाणा म्ह नई संगीत शैली का आगमन होया.इस नई शैली तै सांग का नाम दिया गया.

 "एक जनाना एक मर्दाना अड़े मंच पे थे रै



एक सारंगी अर एक ढोलकिया साथ म्ह अड़े थे रै"
ये पंक्तियां बयां रही सैं हरियाणा की सांग विधा नै. सांग यानी की स्वांग, थोड़े और मॉडर्न शब्दों म्ह थिएटर (रंगमंच)  भी कह सके सै.गांव देहात म्ह किसे खुले स्थान म्ह सांझ नै तख्त बिछाकै सांग की तैयारी करी जाया करती.

किस्से, कहानी अर गाथा गाकै ,नृत्य अर अभिनय करया करते.मनोरंजक बात या सै अक सांग म्ह पुरुष ही महिलाओं का अभिनय करते थे.उनकी तरह सजते सँवरते क्योंकि महिलाओं नै गायन अर अभिनय की मनाही थी. शाम के इस टैम का इंतजार हर किसी नै होया करता. मंद मंद रोशनी अर महिलाओं जैसा चमकीला आकर्षक सिंगार पुरुषां नै खूब भाता था. वाद्य यंत्रों म्ह ढोलक, मंजीरा, खड़ताल, सारंगी, घडवा(मटके पर पट्टा बांधकर तैयार किया गया वाद्य यंत्र), बिन ,बैंजु अर हारमोनियम होता था. जिन्हें पक्के साज कहया करते.

सांग करण आले कलाकारां नै "सांगी" कहया करैं. सांगी एकदम खुलकर अभिनय करते , हाव भाव म्ह कदे बोल्डनेस होती तै कदै घूँघट के इशारे होते. उस टैम शायद ही कोई महिला सार्वजनिक मंच पै ऐसा करण की सोच पाती होगी.

फेर सांग धीरे धीरे कम होते गए अर रागिणी शुरू हो गईं. या नई शुरुआत संगीत के बदलाव की मांग तै होई.रागिणी की शुरुआत मटके पै गायन तै होई. हालांकि सांग अर रागिणी म्ह घणा फर्क नहीं सै. सांग म्ह तै कई कलाकार अभिनय करया करै तै रागिणी एकल अर दो भी गा सकै सैं.

पक्के साज तै कच्चे साज पै गायकी ‘रागिणी’

रागणी गायन सांग से थोड़ा अलग सै.इसमें गायन के गेल्यां हास्य व्यंग्य अर  संवाद के कारण सांग तै अधिक मनोरंजन सै.पहल्यां यो गायन शहीद जाट कवि मेहरसिंह नै शुरु करया फेर पंडित जग्गननाथ नै एपन तै यो गायन चौगरदे नै प्रसिद्ध करया.  सांग म्ह पुरुषों के एकाधिकार नै खत्म नहीं करया गया पर रागिणी गायन  म्ह पुरुषों की गेल्यां महिला गायिकाओं नै हरियाणा के संगीत म्ह नवीनता बनाई. जब केवल पुरुष ही नहीं बल्कि महिला गायक भी बोल्ड आवाज अर धाकड़पन तै रागिणी गाण लाग्गी .

धीरे धीरे रागिणी कार्यक्रमों का आयोजन यूपी, हरियाणा और राजस्थान म्ह करवाया जाण लाग्या. रागिणी गाण आली महिलाओं तै समाज नै प्रतिस्ठा पत्र अर चरित्र पत्र हमेशा मांगा.ऐसा इसलिए होया क्योंकि महिलाओं नै गाते, बजाते, नाचते अर बिना घूँघट लिए बोल्ड रूप म्ह इसतै पहले फिल्मां म्ह ही देखा गया अर ईब तै बिल्कुल मंच पर लाइव ही देखण लाग रहे थे.रागिणी कॉम्पीटीशन लाइव तै फेर कैसेट, रेडियो, सीडी और वीसीआर पै भी सुणे जाण लाग्गै.
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