COVID-19: क्या चमगादड़ों की वजह से हिमाचल के 300 साल पुराने इस गांव से हुआ पलायन?
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COVID-19: क्या चमगादड़ों की वजह से हिमाचल के 300 साल पुराने इस गांव से हुआ पलायन?
कांगड़ा के गरली गांव में पेड़ों पर बड़ी तादाद में चमगादड़ रहते हैं.

ग्राम पंचायत गरली के प्रधान तिलक ने बताया कि चमगादड़ों की बजह से धरोहर गांव में कोई पलायन नहीं हुआ है. उन्होंने कहा कि चमगादड़ों के डर से पलायन की खबरें झूठी हैं.

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ब्रजेश्वर साकी

गरली (कांगड़ा). चीन (China) के बुहान से आई खबर से देश का प्रथम धरोहर गांव डर के साये में जी रहा है. एकाएक ऐसे दावे किये जाने लगे कि कोरोना वायरस चमगादड़ों (Bats) से फैला है, लेकिन अभी तक कोई अधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. वहीं हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) के लोग डरने लगे हैं. डर का कारण यह है कि इलाके में यह अफवाह फैला दी गई कि 300 वर्ष पुराने देश के प्रथम धरोहर गांव गरली (Garli) से लोगों का पलायन शुरू हो गया है, जिसका कारण चमगादड़ों (Bats) को ठहराया जाने लगा. इन्हीं अफवाहों का सच जानने जिला कांगड़ा के देहरा में बसे धरोहर गांव गरली न्यूज़-18 हिमाचल की टीम पहुंची.

सूद समुदाय ने किया पलायन
यहां पंडितों द्वारा चमगादड़ों को माँ लक्ष्मी जी का वाहन बताया जाने लगा. यह भी कहा जा रहा है कि यह चमगादड़ मनाये प्रजाति के हैं, जो कि शुभ माने जाते हैं या यूं कहें इन चमगादड़ों का सीधा खजाने से कनेक्शन हो. यहां सूद समुदाय की पुरानी नक्काशी युक्त हवेलियां भी है. सूद समुदाय की गिनती रईसों में की जाती है और व्यापार के चलते यह समुदाय यहां से पलायन कर शिमला जैसे बड़े-बड़े शहरों में बस गया. अब उनकी हवेलियों पर ताले लटके हुए हैं. कुछ हवेलियां टूटकर गिर रही हैं और कुछ हवेलियों को किराए पर भी दिया गया है. यह सच है कि सूद समुदाय का पलायन गरली और परागपुर से हुआ है, लेकिन इसका कारण चमगादड़ों को नहीं ठहराया जा सकता. यहां से पलायन लगभग 40-50 वर्ष पूर्व हुआ था, जिसका मुख्य कारण व्यापार ही रहा है. यह चमगादड़ें भी इस धरोहर गांव जितनी ही लगभग 300 वर्ष पुरानी हैं. हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा के गावं गरली को सन 2002 में धरोहर गावं घोषित किया गया था.
हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा के गावं गरली को सन 2002 में धरोहर गावं घोषित किया गया था.
हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा के गावं गरली को सन 2002 में धरोहर गावं घोषित किया गया था.




सोशल मीडिया पर अफवाह
बीते दिनों किसी ने दी कि कोरोना वायरस इन चमगादड़ों की बजह से फैल रहा है. जिसकी वजह से गांव के लोग पलायन कर रहे हैं. न्यूज़-18 की टीम ने ग्राउंड जीरो पर इसकी पड़ताल की तो यह पाया कि यह केवल मात्र अफवाह है, लेकिन इसके अलावा कई चोंकाने वाले रहस्य भी सामने आए हैं. इसी के चलते यहां काम करने वाले व्यापारी या फिल्मी सितारे हमेशा कामयाबी हासिल करते हैं.

गरली में सोशल मीडिया पर फैली अफवाह फैला.
गरली में सोशल मीडिया पर फैली अफवाह.


फिल्मी सितारें भी गांव के फैन
धरोहर गांव गरली में चमगादड़ों की तरह फिल्मी सितारों का जमावड़ा भी लगा रहता है. हाल ही में नेहा धूपिया भी रियलिटी शो रोडीज़ की शूटिंग के लिए धरोहर गांव गरली आई थी. इससे पहले, आमिर खान, ऋषि कपूर जैसे बड़े कलाकार भी यहां शूटिंग के लिए आ चुके हैं. यहां अक्सर हिंदी, पंजाबी, साउथ के गानों व फिल्मों की शूटिंग चलती रहती है. लेकिन अब कोरोना वायरस की वजह से यहां सबकुछ बंद है.

धरोहर गांव गरली में चमगादड़ों की तरह फिल्मी सितारों का जमावड़ा भी लगा रहता है.
धरोहर गांव गरली में चमगादड़ों की तरह फिल्मी सितारों का जमावड़ा भी लगा रहता है.


यह बोले स्थानीय पंडित
धरोहर गांव गरली के ही पंडित शशि भूषण ने साफ किया कि यह चमगादड़ों की मनाये प्रजाति है, जोकि आज से 300 वर्ष पुराने समय से यहां रहते हैं. यह लक्ष्मी जी का वाहन है ओर जिस स्थान पर रहते हैं, वहां वृद्धि होती है और शास्त्रों में भी इन्हें वृद्धि कारक बताया गया है. चमगादड़ों की छोटी प्रजाति नुकसान देनी वाली होती है, जो कि यहां नहीं पाई जाती है. पंडित शशि भूषण बताते हैं कि चमगादड़ों का झुंड उनके घर के पास ही रहता था, जो कि कुछ समय पहले दूसरी जगह चले गए. इन चमगादड़ों से किसी भी तरह का नुकसान नहीं होता है.

गरली गांव में पेड़ों पर चमगादड़ के झुंड अक्सर देखने को मिलते हैं.
गरली गांव में पेड़ों पर चमगादड़ के झुंड अक्सर देखने को मिलते हैं.


चमगादड़ों से पलायन का कोई कनेक्शन नहीं
सूद समुदाय की नगरी में जब कृष्ण कुमार सूद से पलायन के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि चमगादड़ों से पलायन का कोई कनेक्शन नहीं है. सूद समुदाय के लोग आज से 60 वर्ष पहले ही गरली में अच्छा व्यापार न होने के चलते यहां से जाना शुरू हो गए थे. जब कृष्ण कुमार सूद से यह पूछा गया कि यह धरोहर गांव कैसे बसा तो उन्होंने बताया कि आज से 300 वर्ष पहले सिर्फ शहर ही समृद्ध होते थे, लेकिन उस वक्त से ही गरली गांव समृद्ध है. यह रईसों की बस्ती थी और जो भी विकास हुआ वह सूद समुदाय ने ही करवाया था. उन्होंने बताया कि 1918 में यहां हाई स्कूल हुआ करता था. यहां सबसे पुराना अस्पताल भी सूद समुदाय ने ही बनाया था. यह उस समय की बात है जब हिन्दोस्तान में विकास ना के बराबर था, उसी समय गरली गांव में पीने के पानी की दो स्कीमें हुआ करती थी. कृष्ण कुमार सूद ने कहा कि जब मैं पैदा भी नहीं हुआ था, उससे भी पहले से यहां चमगादड़ों का बसेरा रहा है. चमगादड़ों से किसी को भी कोई खतरा नहीं है.

चमगादड़ों की वजह से आज तक कोई मरीज नहीं आया
डॉ. हरिकृष्ण जोली ने बताया कि वह धरोहर गांव गरली में 45 वर्षों से प्रेक्टिस कर रहे हैं. चमगादड़ों की बजह से इतने सालों में कोई भी मरीज उनके पास नहीं आया है. उन्होंने कहा कि गरली गांव में चमगादड़ों की ही प्रजाति है, जिन्हें हम पहाड़ी भाषा मे मनाये बोलते हैं. डॉ. जोली ने कहा कि इन चमगादड़ों से डरने की जरूरत नहीं है. गरली गांव के स्थानीय शिक्षक मदन जीत ने कहा कि कुछ दिन पहले एक अफवाह फैली थी कि गरली में चमगादड़ों ने डेरा जमाया है जिसकी वजह से लोग पलायन कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि यह सिर्फ अफवाह है.

गांव में पेड़ों पर लटके चमगादड़.
गांव में पेड़ों पर लटके चमगादड़.


गांव में कोई पलायन नहीं: प्रधान
ग्राम पंचायत गरली के प्रधान तिलक ने बताया कि चमगादड़ों की बजह से धरोहर गांव में कोई पलायन नहीं हुआ है. उन्होंने कहा कि चमगादड़ों के डर से पलायन की खबरें झूठी हैं. उन्होंने कहा कि बचपन से हम और हमारे बुजुर्ग इन चमगादड़ों में रहे हैं ओर कोई भी डरने की बात नहीं है. एसडीएम देहरा धनबीर ठाकुर ने भी कहा कि धरोहर गांव में चमगादड़ों की बजह से कोई पलायन नहीं हुआ है. उन्होंने कहा कि अफवाह फैलाने वालों पर कानूनी कार्यवाही की जाएगी.

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