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    छोटे से लालच में हिमाचल प्रदेश के इन जंगलों में हर दिवाली लगा दी जाती है भीषण आग

    हिमाचल प्रदेश के जंगलों में लगी आग. (सांकेतिक फोटो)
    हिमाचल प्रदेश के जंगलों में लगी आग. (सांकेतिक फोटो)

    दिवाली (Diwali) के दिनों में देश के अन्य हिस्सों में हाट-बाजारों, बस्तियों में घरों में आग (Fire) लगने की घटनाएं सामने आनी एक सामान्य बात है, मगर न्यूज़ 18 आज आपसे हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) के जनजातीय क्षेत्रों में आग लगाने की उस धारणा का ज़िक्र करेगा, जिसे सुनकर या पढ़कर आप भी हैरत में पड़ जाएंगे.

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    धर्मशाला. दिवाली (Diwali) के दिनों में देश के अन्य हिस्सों में हाट-बाजारों, बस्तियों में घरों में आग (Fire) लगने की घटनाएं सामने आनी एक सामान्य बात है, मगर न्यूज़ 18 आज आपसे हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) के जनजातीय क्षेत्रों में आग लगाने की उस धारणा का ज़िक्र करेगा, जिसे सुनकर या पढ़कर आप भी हैरत में पड़ जाएंगे. क्योंकि क्या वाकई कोई एक भेड़ या बकरे की ख़ातिर अपने ही क्षेत्र में करोड़ों की वन संपदा समेत दुर्लभ प्रजाति के प्राणियों और करोड़ों जंगली जीवों को आग की भेंट चढ़ा सकता है, तो ये बात बिल्कुल सही है और ऐसा कहीं और नहीं बल्कि हिमाचल प्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों में होता है.

    दरअसल इन दिनों हिमाचल प्रदेश के जिला चम्बा के जनजातीय क्षेत्र भरमौर के घने जंगल आग की चपेट में है. भरमौर का ऐसा कोई पहाड़ नहीं होगा जो इन दिनों आग से अछूता रहा हो. चाहे वो भरमौर वैली हो, होली वैली या फिर भटौड नाग सामरा वैली हो हर तरफ आग ही आग नज़र आ रही है और आग में स्वाह होती करोड़ों की वन संपदा समेत अपनी जिन्दगीं को बचाने के लिये जदोजहद करते जंगली जानवर साफ देखे जा सकते हैं. एमेजॉन के जंगलों की आग को बुझाने के लिये भले ही वहां की सरकारों ने अथक प्रयास किए हैं, मगर जनजातीय क्षेत्रों में वन विभाग इतना सक्षम नहीं कि इस भंयकर आग को काबू में कर सके.

    लालच में लगाते हैं आग
    न्यूज़18 ने जब भरमौर में हर साल लगने वाली इस भंयकर आग को भरमौर के डीएफओ सन्नी वर्मा से जानने की कोशिश की और उनकी ओर से जो तर्क दिया गया है वो वाकई ही हैरान कर देने वाला है, कि क्या वाकई एक बौने से लालच के लिये इंसान इतना नीचे गिर सकता है कि वो हजारों की संख्या में रहने वाली आबादी. अपने हरे-भरे जंगल, बेशकीमती इमारती लकड़ी और दुर्लभ प्रजाति के जंगली जानवरों को आग की भेंट चढ़ा सकता है.
    इसलिए लगवाते हैं आग


    दरअसल भरमौर के कई लोग ऐसे भी हैं जो कि भेड़पालक हैं और आज भी घुमन्तु जीवन जीते हैं जो कि अपने मवेशियों और भेड़रें के झुंडों के साथ साल के 5 महीने मैदानी इलाकों में माइग्रेट कर जाते हैं और जब वो भरमौर की चारागाहों को छोड़कर कर जा रहे होते हैं तो कुछ जानकर स्थानीय लोगों को लालच दे जाते हैं कि वो इन चारागाहों को दिवाली के दिनों में आग लगा दें ताकि दिवाली की आड़ में कोई किसी पर संदेह भी न कर पायेगा और उनका काम भी हो जाएगा और बदले में उन्हें दोबारा वापस आने पर भेड़ या बड़ा सा बकरा दे दिया जायेगा. बताया जाता है कि भेड़पालकों की इसके पीछे धारणा ये रहती हैं कि ऐसा करने से अगली बार नये सीज़न पर जंगलों में उगने वाली घास बेहद ही अच्छी होगी और जब घास अच्छी निकलेगी तो उनका वक़्त भी अच्छा गुजरेगा.
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