पहाड़ के गांधी की जयंती! स्‍मारक बनाने की घोषणा फाइलों में दफन

कृष्णदत्त शर्मा ने बताया कि स्वतंत्रता सेनानी कांशी राम को पहाड़ी गांधी नाम पंडित नेहरू ने दिया था. यही नहीं उन्हें बुलबुल-ए-पहाड़ सरोजिनी नायडू ने कहा था. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी से आहत बाबा ने सारी उम्र काले कपड़े पहनने का प्रण किया. उनकी याद में कुछ न होना, दुखद है.

News18 Himachal Pradesh
Updated: July 11, 2019, 2:55 PM IST
पहाड़ के गांधी की जयंती! स्‍मारक बनाने की घोषणा फाइलों में दफन
हिमाचल के कांगड़ा में पहाड़ी गांधी बाबा कांशी राम का घर.
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Updated: July 11, 2019, 2:55 PM IST
हिमाचल के पहाड़ी गांधी बाबा कांशी राम की आज जयंती है. राज्य स्तरीय जयंती समारोह कांगड़ा जिले के बाबा बड़ोह में मनाया जा रहा है. लेकिन उनके घर को स्मारक बनाने की गत वर्ष की घोषणा आगे नहीं बढ़ी है. अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ने वाले बाबा कांशी राम का जन्म 11 जुलाई, 1882 को कांगड़ा जिले के डाडासीबा की पंचायत गुरनवाड़ में पिता का नाम लखनू राम के घर हुआ था. अंग्रेजी हुकूमत की यातनाओें को सहते हुए बाबा कांशी राम 15 अक्टूबर, 1943 को स्वतंत्रता संग्राम की अमर ज्योति में विलीन हुए.

इंदिरा ने जारी किया था डाक टिकट
बाबा के सम्मान में 23 अप्रैल, 1984 को ज्वालामुखी में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी ने बाबा कांशीराम पर डाक टिकट का विमोचन किया था. 11 जुलाई को एक और वर्ष बीत जाएगा, लेकिन उनकी यादों को सहेजने के लिए की गई घोषणाओं को मुकाम नहीं मिल पाया है. पिछले साल मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने बाबा कांशी राम के घर के जीर्णोद्धार और स्मारक बनाने की घोषणा की थी, लेकिन यह भी कागजों तक ही सीमित रही है. 2007 में भाषा एवं संस्कृति विभाग ने बाबा कांशी राम के स्लेटपोश मकान के अधिग्रहण के लिए उनके परिजनों से की थी, लेकिन नतीजा आजतक शून्य है. हालांकि उनके नाम पर डाडासीबा में राजकीय महाविद्यालय का नामकरण जरूर हुआ है. इस बारे में सुरेश राणा, जिला भाषा अधिकारी का कहना है कि पहाड़ी गांधी बाबा कांशी राम के गांव में स्मारक बनाने के लिए कोई भी आदेश प्राप्त नहीं हुए हैं.

इंदिरा गांधी ने इनके नाम का डाक टिकट जारी किया था.
इंदिरा गांधी ने इनके नाम का डाक टिकट जारी किया था.


गांववासियों में रोष, सरकार ने नहीं उठाया कोई कदम
विनोद शर्मा ने कहा कि 11 जुलाई, 2018 को मुख्यमंत्री ने घोषणा की थी कि बाबा कांशी राम के घर का जीर्णोद्धार किया जाएगा, लेकिन एक साल बीतने पर भी कोई कदम नहीं उठाया गया है. अजय सोनी ने कहा कि मकान अधिग्रहण के लिए भी कोई कार्रवाई नहीं की गई है. बाबा कांशी राम के पोते बाबा कांशी राम ने कसम खाई थी कि जब तक भारतवर्ष आजाद नहीं हो जाता, तब तक वे काले कपड़े धारण करेंगे. देश की आजादी के लिए उन्होंने अपना बलिदान तो दिया लेकिन उन्हें सरकार की ओर से सम्मान नहीं मिला.

नेहरू ने दिया था गांधी नाम
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कृष्णदत्त शर्मा ने बताया कि स्वतंत्रता सेनानी कांशी राम को पहाड़ी गांधी नाम पंडित नेहरू ने दिया था. यही नहीं उन्हें बुलबुल-ए-पहाड़ सरोजनी नायडू ने कहा था. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी से आहत बाबा ने सारी उम्र काले कपड़े पहनने का प्रण किया. उनकी याद में कुछ न होना, दुखद है.

कविताओं के जरिये विरोध
गुलशन चौहान का कहना है कि बाबा कांशीराम ने कविताओं, गीतों तथा भाषणों से आजादी की प्राप्ति के लिए जन जागरण अभियान चलाया था. आजादी का यह परवाना भले ही आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी यादों को सहेजने के लिए कुछ कदम तो उठाने ही चाहिए.

कुछ ऐसा रहा बाबा का जीवन
11 जुलाई, 1882: कांगड़ा जिले के डाडासीबा क्षेत्र की गुरनवाड़ पंचायत में जन्म.
1890: सरस्वती देवी के साथ विवाह.
1893: पिता लखनू राम का देहांत.
1894: माता रेवती देवी का देहांत.
1905: कांगड़ा में भूकंप आया और लाला लाजपतराय के साथ सेवा कार्य किया.
1906: सरदार अजीत सिंह व सूफी अम्बा प्रसाद के साथ लाहौर में भेंट.
1911: दिल्ली दरबार देखा और लॉर्ड हॉर्डिंग पर बम.
1919: सत्याग्रह का हल्फ लेना.
1920: पहली गिरफ्तारी डाडासीबा में.
1920: पहली कविता निक्के-निक्के माहणुआ.
1921-22: धर्मशाला में लाला लाजपतराय के साथ जेल काटी और गुरदासपुर जेल भी लाला जी के साथ काटी.
1924: लायलपुर कांग्रेस इजलास में शामिल.
1927: दूसरी गिरफ्तारी, लाहौर में जेल काटी.
1928: कलकत्ता ऑल इंडिया कांग्रेस इजलास में शामिल.
1930: तीसरी गिरफ्तारी, अटक जेल में काटी.
1931: सरदार भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को फांसी. इसके विरोधस्वरूप 23 अप्रैल, 1931 से काले कपड़े पहनना शुरू किए.
1931-32-34: जुगलेहेड़ (ऊना), दौलतपुर (ऊना) और जनाड़ी कांफ्रेंस में सरोजिनी नायडू ने प्रदान किया बुल-बुले-पहाड़ का खिताब.
1937: गढ़दीवाला होशियारपुर कांफ्रेंस, पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा 'पहाड़ी गांधी' का खिताब देना.
1939: नादौन, सुजानपुर टीहरा और हमीरपुर में कांफ्रेंस.
1939: मंगवाल-धमेटा में कांफ्रेंस.
1940: ज्वालामुखी-कालेश्वर महादेव कांफ्रेंस.
1943: 15 अक्टूबर को देहांत.
(देहरा से ब्रजेश्वर साकी की रिपोर्ट)

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First published: July 11, 2019, 2:35 PM IST
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