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हिमाचल की सियासतः भाजपा ने कैसे और क्यों चुराया कांग्रेस की आंखों का ‘काजल’!

हिमाचल की सियासतः भाजपा ने कैसे और क्यों चुराया कांग्रेस की आंखों का ‘काजल’!

कांगड़ा से कांग्रेस विधायक पवन काजल भाजपा में शामिल.

कांगड़ा से कांग्रेस विधायक पवन काजल भाजपा में शामिल.

Pawan Kajal Joins BJP: 2017 विधानसभा चुनाव में कांगड़ा के 15 विधानसभा क्षेत्रों में से महज तीन सीटों पर जीतने वाली कांग्रेस की एक सीट कांगड़ा के काजल की ही थी. काजल चूंकी ओबीसी से ताल्लुक रखते हैं और उनका खुद का एक बड़ा निजी वोट बैंक माना जाता है. अक्सर उनके निजी कार्यक्रमों में काफी भीड़ नजर आती हैं,क्योंकि वहां उन्हें समाजसेवी के तौर पर भी जाना जाता है.

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धर्मशाला. हिमाचल प्रदेश में मौजूदा समय में काफी ज्यादा सियासी उठापटक देखने को मिल रही है. यहां पर नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं, लेकिन अभी से सियासी पारा चढ़ गया है. आलम यह है कि अब नेताओं के दल बदलने का दौर भी शुरू हो गया है.

खुद को कांग्रेस का सच्चा सिपाही और सियासत न जानने की दुहाई देने वाले कांगड़ा के विधायक पवन काजल ने अब कांग्रेस को गच्चा दे दिया है. यूं प्रतीत हो रहा है कि आज के वक्त की नजाकत के लिहाज से अगर कोई बड़ा सियासतदान है तो वो शायद काजल ही हैं. क्योंकि जिस काजल को कांग्रेस ने कांगड़ा से संसदीय क्षेत्र के चुनावों में उतार दिया, जिस काजल को कांगड़ा जैसे ओबीसी बहुल जनपद का बड़ा नेता करार दिया, प्रदेश का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया था. अब वह भाजपाई हो गया है. यूं कहें कि भाजपा ने कांग्रेस की आंखों का काजल एक तरह से चुरा लिया है.भाजपा को कांगड़ा के साथ भेदभाव करने कि लिये कोसने वाले काजल अब भाजपा में ही शामिल हो गए हैं. काजल को पार्टी में शामिल करवाने के पीछे संगठन मंत्री पवण राणा का बड़ा हाथ है.

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पवन काजल के बीजेपी की सदस्यता लेने के बाद उन्हें कांग्रेस से 6 साल के लिए सस्पेंड कर दिया है.

क्यों भाजपा में लिए गए काजल
पवन काजल 2012 से पहले भाजपा के सदस्य थे. भाजपा के समर्थन से ही उन्होंने स्थानीय चुनाव जीते थे. लेकिन 2012 में जब भाजपा ने विधानसभा चुनाव में उनका टिकट काटा तो वह कांगड़ा से आजाद चुनाव लड़े और जीते. फिर बाद में वीरभद्र सिंह के करीब आए और कांग्रेस में शामिल हो गए. फिर 2017 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा. साल 2012 से पहले पवन काजल भाजपा के ही सिपाही के तौर पर काम कर रहे थे. लेकिन अब उन्हें लगता है कि कांग्रेस धड़ों में बंटी हुई है.

हिमाचल में कांग्रेस में गुटबाजी क्यों हावी है, इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बीते कुछ माह पहले कांग्रेस ने पार्टी के चार एक्टिंग प्रेसिडेंट बनाए थे और कुल 76 लोगों की सूची जारी की थी. दूसरी और भाजपा को भी कांगड़ा से ओबीसी वर्ग से नए चेहरे की तलाश थी. क्योंकि कांगड़ा में ओबीसी वर्ग के वोटरों की बाहुलता है.

भाजपा कांगड़ा से ओबीसी नेता रमेश ध्वाला और सरवीण चौधरी की काट खोज रही है. संगठन मंत्री पवन राणा ने ही पवन काजल से बातचीत की और उन्हें लेकर दिल्ली गए थे. दूसरी ओर काजल खुद को कांग्रेस के किसी गुट के साथ नहीं जोड़ पा रहे थे. क्योंकि कांग्रेस में मौजूदा दौरा में काफी गुट सक्रिय हैं. काजल को भी लगता है कि कांग्रेस के सत्तावापसी की राह मुश्किल है. ऐसे में आने वाले समय में उनका सियासी सफर भंवर में फंस सकता था. हालांकि, बीते दस साल से विधायक काजल के लिए एंटी इनकम्बेंसी बड़ी चुनौती है.

काजल की मजबूत पकड़
2017 विधानसभा चुनाव में कांगड़ा के 15 विधानसभा क्षेत्रों में से महज तीन सीटों पर जीतने वाली कांग्रेस की एक सीट कांगड़ा के काजल की ही थी. काजल चूंकी ओबीसी से ताल्लुक रखते हैं और उनका खुद का एक बड़ा निजी वोट बैंक माना जाता है. अक्सर उनके निजी कार्यक्रमों में काफी भीड़ नजर आती हैं,क्योंकि वहां उन्हें समाजसेवी के तौर पर भी जाना जाता है. फिलहाल, कांग्रेस को कांगड़ा से झटका लगा है और सियासी गलियारों में उसके खिलाफ संदेश गया है.

Tags: Himachal Congress, Himachal Police, Himachal Politics, Himachal pradesh

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