पाकिस्तान को धूल चटाकर जब बोला सेना का जवान, ये दिल मांगे मोर

कारगिल युद्ध के दौरान कै. विक्रम बत्रा. (फाइल फोटो)
कारगिल युद्ध के दौरान कै. विक्रम बत्रा. (फाइल फोटो)

6 दिसंबर 1997 में उन्हें जम्मू के सोपोर में 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के रूप में तैनाती मिली. 1999 में कमांडो ट्रेनिंग के साथ कई प्रशिक्षण भी लिए. 1 जून 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल भेजा गया. इस दौरान पाकिस्तान के साथ युद्ध शुरू हो चुका था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 8, 2017, 9:16 PM IST
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कैप्टन विक्रम बत्रा, जिन्होंने कहा था कि आखिरी चोटी पर तिरंगा फहराकर आऊंगा या फिर तिरंगे में लिपटकर घर जाऊंगा.कारगिल युद्ध में दुश्मनों के दांत खट्टे करने वाले विक्रम बत्रा का नाम भला किसने नहीं सुना है, पहले लिखी बात उन्होंने ही कही थी. उन्हें कारगिल का शेर कहा जाता है.

18 साल की उम्र में अपने नेत्रदान करने का फैसला ले चुके कैप्टन विक्रम बत्रा का जन्म 9 सितंबर, 1974 को पालमपुर, हिमाचल प्रदेश में हुआ था. हमेशा अपने पास आई बैंक का कार्ड रखते थे.

उनके अभिभावकों का नाम जी. एल. बत्रा और कमलकांता बत्रा था. कैप्टन विक्रम बत्रा को शेरशाह , कारगिल का शेर भी कह के बुलाया जाता था । विक्रम बत्रा ने 18 वर्ष की आयु में ही अपने नेत्र दान करने का निर्णय ले लिया था। वह नेत्र बैंक के कार्ड को हमेशा अपने पास रखते थे। कैप्टन विक्रम बत्रा शहीद- 7 जुलाई, 1999 कारगिल) परमवीर चक्र से सम्मानित भारत के सैनिक थे। इन्हें यह सम्मान सन 1999 में मरणोपरांत मिला।



जुडवा भाइयों में से थे विक्रम बत्रा
पालमपुर के जीएल बत्रा और कमलकांता बत्रा के घर दो बेटियों के बाद दो जुड़वां बच्चों का जन्म हुआ. मां कमलकांता की श्रीरामचरितमानस में बड़ी श्रद्धा थी तो उन्होंने अपने जुड़वा बेटों का नाम रखा लव और कुश. लव यानी विक्रम और कुश यानी विशाल.

पालमपुर में डीएवी स्कूल के बाद सेना के छावनी स्कूल में दाखिला

पहले डीएवी स्कूल, फिर सेंट्रल स्कूल पालमपुर में एडमिशन दिलवाई. सेना छावनी में स्कूल में सेना का अनुशासन और पिता से देशभक्ति की कहानियां सुनकर विक्रम में देश प्रेम प्रबल हो उठा. विक्रम शिक्षा के क्षेत्र में ही अव्वल नहीं थे, हां. उन्हें टेबल टेनिस खेलने का शौक था और वह इसके अच्छे खिलाड़ी थे. सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लेते थे. बाहरवीं तक यहां से पढ़ाई करने के बाद विक्रम चंडीगढ़ चले गए.

डीएवी कॉलेज चंडीगढ़ में बीएससी की पढ़ाई शुरू की. इसके अलावा, सीडीएस (सम्मिलित रक्षा सेवा) की भी तैयारी करते रहे. इस दौरान विक्रम को हांगकांग में भारी वेतन में मर्चेन्ट नेवी में नौकरी मिल गई. लेकिन देश सेवा का सपना लिए विक्रम ने इसे ठुकरा दिया. जुलाई 1996 में उन्होंने भारतीय सेना अकादमी देहरादून में प्रवेश मिला.

रेडियो मैसेज में कहा था-ये दिल मांगे मोर

6 दिसंबर 1997 में उन्हें जम्मू के सोपोर में 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के रूप में तैनाती मिली. 1999 में कमांडो ट्रेनिंग के साथ कई प्रशिक्षण भी लिए. 1 जून 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल भेजा गया. इस दौरान पाकिस्तान के साथ युद्ध शुरू हो चुका था. हम्प और राकी नाब स्थानों को जीतने के बाद उसी समय विक्रम को प्रमोट कर कैप्टन बना दिया गया.

इसके बाद श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सबसे महत्त्वपूर्ण 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त करवाने का जिम्मा भी कैप्टन विक्रम बत्रा को दिया गया. बेहद दुर्गम क्षेत्र होने के बावजूद विक्रम बत्रा ने अपने साथियों के साथ 20 जून 1999 को सुबह तीन बजकर 30 मिनट पर साथियों समेत अपने कब्जे में ले लिया. विक्रम बत्रा ने इसी चोटी से रेडियो मैसेज में कहा था ‘यह दिल मांगे मोर’. और हम और इसकी गूंज आज भी सुनते हैं. कारगिल वॉर में मिला था सीक्रेट कोड नेम ‘शेरशाह’.

बता दें कि विक्रम के सीक्रेट कोड नाम शेरशाह था इसलिए उन्हें ‘कारगिल का शेर’ भी कहा जाता है. अगले दिन चोटी 5140 में भारतीय झंडे के साथ विक्रम बत्रा और उनकी टीम का फोटो पूरी दुनिया में छा गया था.

इसके बाद सेना ने चोटी 4875 को भी कब्जे में लेने का अभियान शुरू हुआ. इसकी भी बागडोर विक्रम को दी गई. जान की परवाह न करते हुए उन्होंने लेफ्टिनेंट अनुज नैयर के साथ कई पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतारा. जब यह ऑपरेशन भी अंतिम समय पर था तो कैप्टन अपने साथी लेफ्टिनेंट नवीन को बचाने के लिए लपके.

लड़ाई के दौरान विस्फोट में नवीन के दोनों पैर बुरी तरह जख्मी थेय जब कैप्टन बत्रा उन्हें बचा रहे थे तभी दुश्मनों की गोली उनकी छाती में लगी और वे शहीद हो गए.
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