शहीद सौरभ कालिया: एग्रीकल्चर की पढ़ाई के बाद सेना में गए, 22 दिन झेली पाक की कैद

सौरभ कालिया 29 जून 1976 को पंजाब के अमृतसर में पैदा हुए. पालमपुर के डीएवी पब्लिक स्कूल से 10 वीं कक्षा तक की पढ़ाई की और फिर केन्द्रीय विद्यालय, पालमपुर 12वीं तक पढ़े.

Bichitar Sharma | News18 Himachal Pradesh
Updated: July 17, 2019, 6:27 PM IST
शहीद सौरभ कालिया: एग्रीकल्चर की पढ़ाई के बाद सेना में गए, 22 दिन झेली पाक की कैद
शहीद कैप्टन सौरभ कालिया हिमाचल के पालमपुर के रहने वाले थे.
Bichitar Sharma | News18 Himachal Pradesh
Updated: July 17, 2019, 6:27 PM IST
वीरभूमि हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में जन्मे भारत के वीर सपूत अमर शहीद सौरभ कालिया किसी परिचय के मोहताज नहीं है. शहीद कैप्टन सौरभ कालिया के पैतृक गांव पालमपुर के आईमा गांव का न्यूज़18 की टीम ने दौरा किया.

जानकारी के अनुसार, सौरभ कालिया 29 जून 1976 को पंजाब के अमृतसर में पैदा हुए. पालमपुर के डीएवी पब्लिक स्कूल से 10वीं कक्षा तक की पढ़ाई की और फिर केन्द्रीय विद्यालय, पालमपुर 12वीं तक पढ़े. इसके बाद साल 1997 में एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, पालमपुर से स्नातक की उपाधि प्राप्त की. ब्रिलियंट स्टडीज में फर्स्ट डिवीजन हासिल किया और छात्रवृत्ति भी जीती. जब सौरभ सेना में भर्ती हुए उस वक्त उनकी लंबाई 6 फीट 2 इंच थी.

ट्रैकिंग के शौकिन थे
सौरभ कालिया के पिता के मुताबिक, सौरभ बचपन से ही बर्ड वॉचिंग के साथ-साथ नेचर प्रेमी और खाना पकाने में भी महारथी थे. वह हमेशा अपने पसंदीदा शौक को ट्रैक करते थे. उनके इरादे बचपन से ही बहुत मजबूत थे. वह स्वभाव से बहुत शांत, मृदुभाषी और असाधारण रूप से अच्छे श्रोता भी थे. धार्मिक, दयालु और सभी के लिए हमेशा मददगार जैसी छवि थी. पिता बताते हैं कि दूसरों से किसी भी प्रतिकूल टिप्पणी पर प्रतिक्रिया या समय या ऊर्जा बर्बाद नहीं करते थे और हमेशा आत्म-सुधार को तवज्जो देते थे.

करगिल वॉर में शहीद हुए थे सौरभ कालिया.
करगिल वॉर में शहीद हुए थे सौरभ कालिया.


सीडीएस के जरिये सेना में एंट्री
कंबाइंड डिफेंस सर्विसेज (सीडीएस) के जरिये अगस्त 1997 में भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून में सौरभ का चयन हुआ और 12 दिसंबर 1998 को उन्हें आईसी नंबर 585222 के तहत 4 जाट रेजिमेंट के तहत पहली पोस्टिंग मिली. 31 जनवरी, 1998 को बरेली के जाट रेजिमेंटल सेंटर में रिपोर्टिंग के बाद जनवरी के मध्य में वो सेना में जाकर शामिल हुए. मई 1999 के पहले हफ्ते में, कारगिल के कई क्षेत्रों में तीन बार पैट्रोलिंग ड्यूटी के लिए निकले. उसके बाद कारगिल में पाक सेना के बड़े पैमाने पर घुसपैठ की विस्तृत जानकारी देने के लिए सबसे पहले अधिकारी के रूप में काम किया.
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‘बजरंग पोस्ट’ पर खुद गए
काकसर क्षेत्र में 5 सैनिकों के साथ पाकिस्तानी घुसपैठियों पर नजर रखने के लिए लिए साढ़े 13 से 14,000 फीट की ऊंचाई पर "बजरंग पोस्ट" पर जाने के लिए अपने से बड़े, लेकिन रैंक में जूनियर जवान को न भेजकर खुद जाने का बड़ा फैसला लिया. पाक सेना द्वारा वहां पर गोलीबारी करने से सौरभ समेत पांचों बहादुर जवान कुछ वक्त तक उनसे लोहा लेते रहे.

पालमपुर में है सौरभ कालिया का घर.


पाक सेना ने पकड़ा
लेकिन थोड़ी ही देर के बाद उनका संपर्क अन्य साथियों के साथ बिल्कुल कट गया और वह उस पोस्ट से लापता पाए गए. जब तक उनकी मदद के लिए सेना की कोई दूसरी टुकड़ी पहुंचती कैप्टन सौरभ कालिया 15 मई 1999 को अपने साथियों के साथ पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा जिंदा पकड़ लिए गए. सैनिकों की गश्ती पार्टी पर कब्जा कर लिया.

22 दिन तक पाक सेना की कैद में रहे
वे 22 दिनों तक उनकी कैद में रहे और 9 जून 1999 को पाकिस्तानी सेना द्वारा उनके शव सौंपे गए. लेकिन, जो शव सौंपें गए उनकी हालत विभत्स थी. उन्हें क्रूर यातनाएं दी गई थीं. इन सभी असीमित बर्बरता से गुजरते हुए ये सैनिक नहीं टूटे. यह उनकी देशभक्ति, धैर्य, दृढ़ संकल्प, तप और वीरता को दर्शाता है.

कई यात्नाएं दी गई
पाक सेना ने उनके शरीर को सिगरेट से जलाने, आंखों को फोड़ दिया गया था. ज्यादातर दांतों और हड्डियों को तोड़ने के अलावा सभी प्रकार की शारीरिक और मानसिक यातनाएं दी और उन्हें तड़पते हुए मरने पर मजबूर किया गया. बावजूद इसके देश के इन होनहार और वीर सपूतों ने दुश्मन देश के क्रूर सैनिकों के आगे हथियार नहीं डाले, जो कि अपने आप में ही वीरता का सबसे बड़ा दुर्लभ परिचय था.

इंटरनेशन कोर्ट में है मामला
एनके कालिया, कैप्टन सौरभ कालिया के पिता, का कहना है कि पाकिस्तान ने सभी अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हुए उन्हें ज़िंदा पकड़ लिया, लेकिन भारतीय समकक्षों को उनकी सही स्थिति की जानकारी नहीं दी. पाक सेना ने उन्हें अभूतपूर्व क्रूर यातना देकर जेनेवा कन्वेंशन का उल्लंघन किया. हालांकि अब उनके इंसाफ के लिए लड़ी जा रही लड़ाई अब भी भारत के सर्वोच्च न्यायालय और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में है.

सरकारों से नाराज हैं पिता
कैप्टन सौरभ कालिया के पीड़ित पिता एनके कालिया की मानें तो उस वक्त देश की सरकारों और नेताओं ने इंसाफ देने और दुश्मनों को सबक सिखाने की बात कही थी, लेकिन आज भी वो कहीं न कहीं ढंकोंसला मात्र ही लगती प्रतीत होती हैं.

...और फिर कभी नहीं दिखे वर्दी में
माता-पिता द्वारा सेना में भर्ती हुए अपने 22 साल के जवान गभरू सौरभ कालिया को अमृतसर रेलवे स्टेशन से विदाई देने के बाद दोबारा कभी वापस उसी वर्दी में जिंदा देखने का अवसर हासिल नहीं हुआ, जिसका उन्हें आज भी मलाल है. सौरभ कालिया के जीवन में कुछ इत्तेफाक संजोग भी देखने को मिलते हैं. वह बजरंग बलि के भक्त थे और संयोगवश करगिल युद्ध के दौरान बजरंग पोस्ट से पर ही शहीद हुए.

मां से आखिरी बार यह कहा था
कारगिल जाने से पहले अपनी मां के लिए इस बहादुर सैनिक के अंतिम शब्द थे कि “देखना मां एक दिन आपका बेटा ऐसा काम कर जाएगा कि ये दुनिया हमेशा उसका नाम याद रखेगी.” कैप्टन सौरभ ने करगिल युद्द में महाभारत के अर्जुन की तरह ही अपने शौर्य का परिचय दिया.

ये सम्मान मिले

  1. सौरभ स्मृती काक्षा (एक संग्रहालय).

  2. राजसी धौलाधार रेंज की प्राकृतिक तलहटी में 35 एकड़ के विशाल क्षेत्र में "सौरभ वन विहार."

  3. 3.सौरभ कालिया मार्ग और उनके गृह क्षेत्र का नाम सौरभ नगर.

  4. प्रस्तावित विवेकानंद मेडिकल रिसर्च ट्रस्ट अस्पताल, पालमपुर में एक नर्सिंग कॉलेज (सौरभ कालिया नर्सिंग संस्थान, पालमपुर) सौरभ की शौकीन स्मृति में उठाया जा रहा है.

  5. एक स्व-वित्तपोषण चैरिटेबल ट्रस्ट, कैप्टन सौरभ कालिया वेलफेयर फाउंडेशन, पालमपुर (रेग) को सामाजिक कल्याण गतिविधियों को करने के लिए स्थापित किया गया था.

  6. डीएवी प्रबंध समिति, नई दिल्ली ने स्थानीय डीएवी पब्लिक स्कूल में उनके सम्मान में एक ब्लॉक का नाम रखा.

  7. सौरभ को श्रद्धांजलि के रूप में सैनिक कल्याण संगठन, नई दिल्ली ने उनके नाम पर आगामी 200 फ्लैट आवासीय कॉलोनी (रक्षा क्षेत्र में समर्पित) पालमपुर के रामनगर में रखे हैं.

  8. कारगिल में एक गैर सरकारी संगठन SEWAK, सिविल प्रशासन और सेना और पुरस्कार कैप्टन सौरभ कालिया LOC कप को शामिल करने के लिए अपनी शौकीन स्मृति में हर साल एक क्रिकेट टूर्नामेंट का आयोजन करता है. स्टेडियम का नाम भी कैप्टन सौरभ कालिया के नाम पर रखा गया है.


First published: July 17, 2019, 5:57 PM IST
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