हमीरपुर: 8 बार नेशनल खेल चुके NIS ‘द्रोणाचार्य’ के साथ बेरुखी, अब हाथों में बेलचा

हमीरपुर में मजदूरी करते हुए अनूप राणा.
हमीरपुर में मजदूरी करते हुए अनूप राणा.

अनूप राणा ने कहा कि उन्होंने 2006 में खेल विभाग में खेल आरक्षण कोटे में पंजीकरण करवाया था. 14 साल बाद भी उन्हें नौकरी नहीं मिली.

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हमीरपुर. हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) के लिए 200 मीटर में सबसे तेज दौड़ने वाला खिलाड़ी बेलचा चलाने को मजबूर है. आठ बार नेशनल खेल चुके एथलीट (Athelete) और एनआईएस (पटियाला) कोच अनूप सिंह राणा कोरोना काल में दिहाड़ी लगा रहे हैं, लेकिन सरकार उन्हें अभी तक नौकरी नहीं दे पाई है. कोरोना संकट के दौरान अनूप राणा (Anoop Rana) घर पर ही रह कर परिवार के साथ समय व्यतीत कर रहे है और दिहाडी मजदूरी करके पालन पोषण कर रहे है. अनूप राणा की पत्नी भी खोखो (Kho-Kho) में इंटर यूनिवर्सिटी में सिल्वर मेडल विजेता के साथ बेस्ट प्लेयर आफ टूर्नामेंट भी रही है.

दोनों खिलाड़ियों में रोष
दोनों पत्नी पत्नी की सरकार के द्वारा जमकर अनदेखी होने पर अब दोनों राष्ट्रीय स्तर के खिलाडियों में गहरा रोष बना हुआ है. अनूप राणा ने सरकार से मांग की है कि ग्रास रूट पर मेहनत करके राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने वाले खिलाडियों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए और खिलाडियों को सरकार मान सम्मान के साथ नौकरी दे.

अनूप का इतिहास
बता दें कि अनूप ने वर्ष 1999, 2000 में अखिल भारतीय अंतर विवि एथलेटिक्स प्रतियोगिता में दो बार प्रदेश विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया. वर्ष 2001 से 2007 तक एथलेटिक्स में राष्ट्रीय स्तर पर प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया. वर्ष 2004 में मंडी के पड्डल मैदान में हुई राज्य स्तरीय सीनियर एथलेटिक्स में अनूप राणा ने 100 मीटर दौड़ 10.9 सेकेंड और 200 मीटर दौड़ 22.1 सेकेंड में पूरी कर कीर्तिमान स्थापित किए. 13 वर्षों बाद उन्हीं के शिष्य संदीप कुमार ने वर्ष 2017 में 100 मीटर दौड़ में उनका रिकॉर्ड तोड़ा. 200 मीटर का कीर्तिमान अभी तक अनूप सिंह के नाम बरकरार है. इसके अलावा, 2004 से 2006 तक लगातार तीन बार प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ तेज धावक का कीर्तिमान भी अनूप राणा के नाम रहा. साल 1999 से 2007 तक करीब 70 से भी ज्यादा पदक जीत चुके हैं.



हमीरपुर में मजदूरी करते अनूप राणा.


14 साल बाद भी नौकरी नहीं मिली
अनूप राणा ने कहा कि उन्होंने 2006 में खेल विभाग में खेल आरक्षण कोटे में पंजीकरण करवाया था. 14 साल बाद भी उन्हें नौकरी नहीं मिली और कहा कि ऐसे प्रशिक्षकों को नियुक्तियां दी गईं, जिन्होंने जिला स्तरीय खेलों में प्रतिनिधित्व करने के उपरांत मात्र 42 दिन का प्रशिक्षण लिया था. उन्हें नजरअंदाज किया गया. कोरोना काल के दौरान कई प्रशिक्षुओं को आनलाइन टिप्स भी दे रहे है, ताकि खिलाडी अपनी फिटनेस को बनाए रखे.
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