Assembly Banner 2021

ह‍िमाचल में यह 6 महीने पानी के अंदर और बाहर रहने वाला एकमात्र महाभारतकालीन मंद‍िर, जानें इसके इतिहास से जुड़ी हर बात

सदियों पहले निर्मित इस तीर्थस्थल के सालभर में 6 माह तक पानी के अंदर समा जाने के उपरांत भी इसकी नक्काशी को कोई फर्क नहीं पड़ा है

सदियों पहले निर्मित इस तीर्थस्थल के सालभर में 6 माह तक पानी के अंदर समा जाने के उपरांत भी इसकी नक्काशी को कोई फर्क नहीं पड़ा है

Himachal News: जब यह तीर्थ स्थल पानी से बाहर होता है तो काफी संख्या में पर्यटक इस स्थल को देखने आते हैं, लेकिन बहुत ही कम लोग इसका इतिहास जानते हैं.

  • Share this:
हिमाचल प्रदेश में कई अद्भुत तीर्थ स्थल हैं, जोकि किसी पहचान के मोहताज नहीं है. ऐसा ही तीर्थ स्थल कांगड़ा के मण्ड इलाके से गुजरने वाली पौंग झील के बीचोंबीच में पांडवों द्वारा अज्ञातवास के दौरान निर्मित बाथू की लड़ी भी है. पौंग झील का जलस्तर बढ़ने के कारण 6 महीने तक झील में समाया रहता है और 6 महीने तक पानी के बाहर नज़र आता है. इस स्थल पर एक सीढ़ीनुमा ऊंची गोलाकार मीनार खड़ी है और साथ में मन्दिर, प्रवेशद्वार, निकासीद्वार और पास में एक गहरा कुआं भी है.

जब यह तीर्थ स्थल पानी से बाहर होता है तो काफी संख्या में पर्यटक इस स्थल को देखने आते हैं, लेकिन बहुत ही कम लोग इसका इतिहास जानते हैं. एक किवदंती के मुताबिक बताया जाता है कि इस तीर्थ स्थल का निर्माण पांडवों द्वारा अज्ञातवास के दौरान स्वर्ग को जाने के लिए किया गया था. इस बाथू की लड़ी का निर्माण एक ही रात में करना था तो पांडवों ने 6 माह की एक रात बनाकर इसका कार्य शुरू किया. स्वर्ग तक पहुंचने के लिए अभी अढ़ाई पौढियां ही शेष बची थीं कि साथ ही में कोल्हू पर तेल निकाल रही तेलिन चिल्ला कर बोली कि मैंने 6 माह का काम कर लिया है लेकिन रात खत्म ही नहीं हो रही है.

इसके साथ ही सीढ़ियां गिर गईं तथा पांडव इसको अधूरा छोड़कर आगे चलते बने. पांडवों द्वारा इसके अंदर शिव मंदिर भी आराधना के लिए बनाया गया था. पेयजल व स्नानादि के लिए कुआं निर्मित किया था. इस स्थल में पौंग बांध बनने से पहले द्रोपदी के हाथों से कढ़ाई की गई शॉल भी थी तथा एक काफी बड़ा गेहूं का दाना भी था. सदियों पहले निर्मित इस तीर्थस्थल के सालभर में 6 माह तक पानी के अंदर समा जाने के उपरांत भी इसकी नक्काशी को कोई फर्क नहीं पड़ा है.



Mahabharat period Temple in Himachal
कांगड़ा के मण्ड इलाके से गुजरने वाली पौंग झील के बीचोंबीच में पांडवों द्वारा अज्ञातवास के दौरान निर्मित बाथू की लड़ी भी है

तीर्थस्थल को देखने के लिए काफी पर्यटक आते हैं बावजूद इसके न तो यहां का स्थानीय प्रशासन इसके संरक्षण में कोई बड़ा कदम उठा पा रहे हैं और न ही जन हितैषी नेताओं का इससे कोई लेना देना नज़र आता है. हां सरकार हर साल बजट में पर्यटन स्थलों के विकास के लिये करोड़ों खर्च करने की बात करती है. मगर संरक्षण के नाम पर अभी भी स्थिति ढाक के तीन पात ही नज़र आती है. अगर आज भी इस ख़ूबसूरत धार्मिक स्थल को संरक्षित कर लिया जाए तो दुनिया का पानी के अंदर और बाहर रहने वाला इकलौता मन्दिर विश्वभर के मानचित्र में दुनिया को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है. आज ये तीर्थस्थल सरकार प्रशासन की उदासीनता के चलते धीरे-धीरे अपना अस्तित्व को खो रहा है.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज