हिमाचल के इस शिव मंदिर में दो धर्मों के लोग एक साथ आस्था प्रकट करते हैं

त्रिलोकनाथ धाम में हिन्दू धर्म के मानने वाले ही नहीं बल्कि बौद्ध धर्म से जुड़े लोग भी अपनी आस्था प्रकट करने पहुंचते हैं.

News18 Himachal Pradesh
Updated: August 12, 2019, 9:07 AM IST
हिमाचल के इस शिव मंदिर में दो धर्मों के लोग एक साथ आस्था प्रकट करते हैं
इस धाम में केवल हिन्दू धर्म के मानने वाले ही नहीं बल्कि बौद्ध धर्म से जुड़े लोग भी अपनी आस्था प्रकट करने पहुंचते हैं.
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Updated: August 12, 2019, 9:07 AM IST
हिन्दुओं व बौद्ध धर्म के संयुक्त आस्था का प्रमुख केन्द्र त्रिलोकनाथ धाम में श्रदालुओं के आने का सिलसिला लगातार जारी है. चिनाब नदी के वाम तट पर स्थित केलांग के प्रचीनतम धाम तक पहुंचने के लिए बसों का उचित प्रबन्ध किया गया है. इस धाम में केवल हिन्दू धर्म के मानने वाले ही नहीं बल्कि बौद्ध धर्म से जुड़े लोग भी अपनी आस्था प्रकट करने पहुंचते हैं. यहां देश ही नहीं विदेश से भी लोग आते हैं. यहां भूटान और नेपाल से भी बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म से जुड़े लोग पहुंचते हैं.

जंसखर, लेह और लद्दाख से भी भारी मात्रा में श्रद्धालु पहुंचते हैं

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त्रिलोकनाथ धाम में भूटान और नेपाल से भी बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म से जुड़े लोग पहुंचते हैं.


यहां जंसखर, लेह और लद्दाख से भी भारी मात्रा में लोग पहुंचते हैं. त्रिलोकनाथ धाम को हिन्दू भगवान शिव का निवास स्थान मानते है जबकि बौद्ध धर्म के लोग अवलोतकेश्वर के रूप में मानते हैं. संभवत: पूरी दुनिया में ही शायद ही ऐसा कोई मंदिर हो जहां दो धर्मों के लोग एक साथ पूजा अर्चना करते हैं और अपने अपने आराध्य देवता से मन्नत मांगते हैं.

इस मंदिर से जुड़ी है ये किवंदती

इसके बारे में कहा जाता है कि त्रिलोकनाथ के जंगल में सप्तधारा नामक स्थान में टीरू का चारवाह अपने भेड़ और बकरियों को लेकर चराने जाता है और जब वह वापिस आता तो गांव वाले भेड़ और बकरियों से दूध चोरी की शिकायत करते थे. इसके चलते चारवाह को गांव वालों के सामने शर्मसार होना पड़ता था. एक दिन उसने सप्तधारा नामक स्थान में सात जोगणियों को भेड़—बकरियों से दूध चोरी करते हुए देख लिया पर वह मात्र एक ही जोगणी को पकड़ पाया. दरअसल जिस जोगणी को टीरू पहवाल ने पकड़ा था, वह स्वंय भगवान शंकर थे तथा वह जोगणियों के वेश में थे.

टीरू पहवाल ने ही भगवान शंकर को यहां पर स्थापित किया था
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ऐसी मान्यता है कि टीरू पहवाल ने ही भगवान शंकर को मौजूदा स्थान पर लाया था. यहां भगवान शंकर व टीरू पहवाल पत्थर में परवर्तित हो गए. यह मान्यता है कि आज भी यदि नि:सन्तान व्यक्ति टीरू पहवाल के पत्थर की मूर्ति को उठाकर भगवान त्रिलोकनाथ की परिक्रमा करता है तो उसे संतान सुख की प्राप्ति होती है.

यहां 18-22 अगस्त तक पौरा का मेला लगता है

मंदिर के भीतर भगवान शंकर के मूर्ति के सामने दो स्तंभ हैं जिसे धर्म द्वार कहा जाता है. इच्छुक श्रदालु इस द्वार से गुजर कर अपने पुण्य-पाप की परख करते हैं. त्रिलोकनाथ धाम में सबसे बड़ा धर्मिक मेला पौरा का मेला होता है जो आमतौर पर 18 से 22 अगस्त के बीच में होता है. इस मेले को भगवान शिव के विवाह से भी जोड़ कर देखा जाता है.

(केलांग से प्रेम लाल की रिपोर्ट)

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First published: August 12, 2019, 9:01 AM IST
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