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लाहौल घाटी के आराध्य तन्जेर देवता यात्रा पर निकले, सुनेंगे लोगों को दुख-दर्द

News18 Himachal Pradesh
Updated: November 13, 2019, 5:37 PM IST
लाहौल घाटी के आराध्य तन्जेर देवता यात्रा पर निकले, सुनेंगे लोगों को दुख-दर्द
लाहौल के तंजेर देवता गांव की यात्रा पर निकले हैं.

मान्यता है कि सैंकड़ों साल पहले तन्जेर देवता तोग घाटी के सारंग नाम स्थान पर निवास करते थे, यहां पर देवता नर बलि लेते थे.

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केलांग(लाहौल स्पीति). हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) की लाहौल घाटी (Lahaul Valley) में बर्फ से घिरे पहाड और इन्हीं के गोद में बसा है प्यूकर गांव. यहां लाहौल घाटी के आराध्य देवता (God) तन्जेर का वास है. तन्जेर देवता को कई साल से लोग पूजते हैं. क्षेत्र में यात्रा के दौरान तन्जेर देवता को मक्खन की बलि दी जाती है. तन्जेर देवता (God) के स्थाई स्थान और यात्रा के दौरान लोग अन्न और घी का भोग चढ़ाया जाता है. स्थानीय लोग मिल जुल कर इस यात्रा के दौरान गांव-गांव (Village) जाकर लोगों की दुख-दर्द सुनते हैं और उसका निराकरण करते हैं.

यह है मान्यता
मान्यता है कि सैंकड़ों साल पहले तन्जेर देवता तोग घाटी के सारंग नाम स्थान पर निवास करते थे, यहां पर देवता नर बलि लेते थे. कालान्तर में इलाके के लोग देवता के नर बलि से बेहद दुखी थे. उसी दौरान किसी पुरुष ने तनजेर देवता के प्रतीक को भागा नदी में बहा दिया. ऐसा कहा जाता है स्टिंगरी गांव में नीचे भागा नदी में करीब सात दिन तक धुंध छाई रहती थी. इसी दौरान संयोगवश स्थानीय बुजुर्ग भेड़-बकरियां चराते हुए नदी के किनारे पहुंचे. यहां तन्जेर देवता की प्रतीकात्मक चीज मिली और बुजुर्ग अनजाने में उसे अपने घर ले गया.

…और होने लगी अनहोनी

जब से प्रतीकात्मक चीज बुजुर्ग ने अपने घर में रखी, तब से आसपास अनहोनी होने लगी. लोगों ने इस अनहोनी का कारण जानने के लिए पुजारी से सर्म्पक किया गया तो तनजेर देवता के होने की बात सामने आई. तन्जेर देवता ने प्यूकर गांव में जाने की इच्छा जताई, तब से तन्जेर देवता यहीं वास करते है.

मान्यता है कि सैंकड़ों साल पहले तन्जेर देवता तोग घाटी के सारंग नाम स्थान पर निवास करते थे.
मान्यता है कि सैंकड़ों साल पहले तन्जेर देवता तोग घाटी के सारंग नाम स्थान पर निवास करते थे.


दो साल बाद यात्रा पर निकले
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प्रत्येक दो साल के बाद देवता घाटी के यात्रा में निकल पड़ते हैं. यात्रा के दौरान गांव-गांव जाकर लोगों की दुख-दर्द सुनते हैं. यह यात्रा करीब एक माह तक चलती है. स्थानीय लोग मिलजुल कर यात्रा निकालते हैं. तन्जेर देवता को लाहौल घाटी का अधिष्ठाता देव राजा घेपन के ज्येष्ठ के तौर पर पूजते हैं. जब दोनों देवों का मिलन होता है और क्रम में बैठने की बारी आती है तो तन्जेर देवता सबसे उपर बैठते हैं.

(प्रेम लाल की रिपोर्ट)

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First published: November 13, 2019, 5:29 PM IST
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