लंका दहन की प्राचीन पंरपरा के साथ 7 दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा महोत्सव संपन्न

कुल्लू में सालों से दशहरा महोत्सव मनाया जाता रहा है.
कुल्लू में सालों से दशहरा महोत्सव मनाया जाता रहा है.

International Kullu Dussehra: देश में एकमात्र कुल्लू दशहरा उत्सव में ही रावण के पुतले नहीं जलाए जाते हैं, बल्कि लंका दहन की प्राचीन परंपरा का निर्वहन किया जाता है.

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कुल्लू. हिमाचल प्रदेश के कुल्लू स्थित ऐतिहासिक ढालुपर मैदान में 7 दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय दशहरे (International Kullu Dussehra) का लंका दहन के साथ समापन हो गया. इस मौके पर भगवान रघुनाथ की भव्य रथयात्रा निकाली गई. अस्थाई शिविर से  भगवान रघुनाथ लाव-लश्कर के साथ रथ पर सवार हुए. विधिवत पूजा-अर्चना के बाद लंका दहन के लिए माता हिडिंबा की अगुवाई में बड़ी संख्या में भक्त यात्रा में शरीक हुए.

लंका दहन के लिए रथयात्रा पशु मैदान के अंतिम छोर पर पहुंची, जिसके बाद माता हिडिंबा व राज परिवार के सदस्यों ने व्यास जट पर लंका  दहन की परंपरा का निर्वहन किया. जिसके बाद देवी- देवताओं ने भगवान रघुनाथ से विदाई ली. जिसके बाद पशु मैदान से रथयात्रा वापस रथ मैदान पहुंची. रथ मैदान से भगवान रघुनाथ पालकी में सवार होकर रघुनाथपुर अपने मंदिर लौटे. इसके बाद देवी देवताओं ने भी अपने-अपने गांवों की ओर कूच किया.

भगवान रघुनाथ के मुख्य छड़ीबरदार महेश्वर सिंह ने बताया कि 7 दिवसीय दशहरे के आयोजन में सभी परंपराओं को निभाया गया है. लंका दहन से पहले खड़की जांच होती है. जिसके बाद देवमहाकुंभ में लंका दहन के लिए रथयात्रा निकाली जाती है. रथ मैदान से भगवान रघुनाथ को पालकी में पशु मैदान ले जाया जाता है, जहां लंका दहन की परंपरा पूरी की जाती है. अंत में भगवान रघुनाथ की सुल्तानपुर मंदिर में आरती होती है.



बता दें कि पूरे देश में एकमात्र कुल्लू दशहरा उत्सव में रावण के पुतले नहीं जलाए जाते हैं. यहां पर लंका दहन की प्राचीन परंपरा का निर्वहन किया जाता है. व्यास नदी के किनारे लंका वेकर में जाकर बाबड़ी के पास सभी प्राचीन रश्में निभाई जाती हैं.
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