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देश के लिए लाल किले में फांसी पर झूल गए थे मेजर दुर्गामल्ल, आजादी के बाद सरकारों ने नहीं ली सुध

जिस दिलेरी के साथ अंग्रेजों से लोहा लेते हुए मेजर दुर्गामल्ल ने अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया, उसके एवज में आज तक उन्हें सम्मान नसीब नहीं हुआ.

जिस दिलेरी के साथ अंग्रेजों से लोहा लेते हुए मेजर दुर्गामल्ल ने अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया, उसके एवज में आज तक उन्हें सम्मान नसीब नहीं हुआ.

लाल किले पर फांसी पर झूलने के पहले अंतिम मुलाकात में दुर्गामल्ल की पत्नी शारदा देवी बेहोश हो गईं. उन्हें होश आने पर दुर ...अधिक पढ़ें

धर्मशाला. भारत देश को अंग्रेजी हुकूमत से आजाद करवाने के लिए स्वतंत्रता सेनानी शहीद मेजर दुर्गामल्ल (Major Durgamalla) ने हंसते-हंसते दिल्ली के लाल किले में फांसी के फंदे को गले से लगा लिया था. इसी दौरान अंतिम मुलाकात में उनकी पत्नी शारदा देवी के बेहोश हो जाने पर उन्हें होश में लाते हुए कहा— मैं भारत माता की आजादी के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर कर रहा हूं, तुम किंचित भी दुखी न होना. मेरी अनुपस्थिति में करोड़ों भारतीय जनता तुम्हारे साथ होगी. शहीद के ये अंतिम शब्द आजादी के 75 साल बाद भी सवाल पूछने को मजबूर हैं कि क्यों करोड़ों भारतीय उन्हें, उनके मान-सम्मान व उनके परिवार को पूरी तरह से भुला चुके हैं.

जिस दिलेरी के साथ अंग्रेजों से लोहा लेते हुए मेजर दुर्गामल्ल ने अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया, आज तक उन्हें सम्मान नसीब नहीं हुआ. ये आजाद भारत की सरकारों, नेताओं, अधिकारियों व आम जनता के समक्ष एक बड़ा सवाल खड़ा है. भारत अपना 75वां स्वतंत्रता दिवस हर्षोल्लास के साथ मना रहा है. 150 वर्षों के कड़े संघर्ष में भारत को ब्रिटिश हुकूमत से आजाद करवाने के लिए हज़ारों स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था. ऐसे में आजादी के जश्र के बीच आजाद भारत का सपना साकार करने वाले शहीद हुए सेनानियों का वतन के लोगों को नाम लेना जरूरी होता है.

स्वाधीनता संग्राम में अहम भूमिका निभाने वाले वीरभूमि हिमाचल के धर्मशाला के वीर जवान शहीद मेजर दुर्गामल्ल का नाम स्वतंत्रता संग्राम में विशेष रूप से शुमार हैं. देश की आजादी के लिए उन्होंने अपने प्राण तक न्यौछावर कर दिए. लेकिन आज भारत व हिमाचल की सरकारें शहीद मेजर दुर्गामल्ल को सम्मान देना ही भूल गईं हैं. शहीद स्वतंत्रता सैनानी मेजर दुर्गामल्ल को भारत सरकार से 1978 में ताम्र पत्र प्रदान किए जाने के लिए प्रपत्र भेजा गया था, लेकिन अब आजादी के 75 साल बाद भी कोई मान-सम्मान नहीं मिल पाया है. इतना ही नहीं संसद भवन दिल्ली में शहीद मेजर की प्रतिमा का अनावरण वर्ष 2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने किया. उनके परिवार के किसी भी सदस्य को इस विषय में सूचित तक नहीं किया गया. शहीद की प्रतिमाएं तो आज भी उनकी बहादुरी भरे किस्से की दास्तां सुनाती हैं, लेकिन सरकारों ने उनके बलिदान को पूरी तरह से भूला दिया.

उन्होंने देश को ब्रिटिश हुकूमत से आजाद करवाने के लिए आजाद हिंद फौज में शामिल होकर बतौर मेजर अंग्रेजों के छक्के छुड़वा दिए थे. तब अग्रेंजी शासन ने कई तरह के मुकद्दमे चलाकर दिल्ली के लाल किले में 25 अगस्त 1944 में मेजर दुर्गामल्ल को फांसी पर लटका दिया था.

Tags: Dharamshala News, Durgamalla, Freedom Struggle, Himachal pradesh, Independence day, Major Durgamalla, Red Fort History, Sacrifice, मेजर दुर्गामल्ल

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