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Himachal Bypoll: कारगिल के योद्धा ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर और रानी साहिबा के बीच मंड़ी में होगी टक्‍कर, जानें किसमें कितना दम

भाजपा ने ब्रिगेडियर खुशाल सिंह ठाकुर और कांग्रेस ने प्रतिभा वीरभद्र सिंह पर दांव खेला है.

भाजपा ने ब्रिगेडियर खुशाल सिंह ठाकुर और कांग्रेस ने प्रतिभा वीरभद्र सिंह पर दांव खेला है.

Himachal Bypoll: हिमाचल प्रदेश का मंडी लोकसभा उपचुनाव बेहद दिलचस्‍प होने वाला है. भाजपा ने यहां कारगिल युद्ध के हीरो रहे ब्रिगेडियर खुशाल सिंह ठाकुर (Kargil-hero Brigadier Khushal Singh Thakur) पर दांव लगाया है, तो कांग्रेस की तरफ से प्रतिभा वीरभद्र सिंह (Pratibha Virbhadra Singh) मैदान में हैं, जिन्‍हें लोग 'रानी साहिबा' कहकर पुकारते हैं.

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    मंडी. भाजपा (BJP) ने मंडी लोकसभा उपचुनाव में कारगिल युद्ध के हीरो रहे ब्रिगेडियर खुशाल सिंह ठाकुर (Kargil-hero Brigadier Khushal Singh Thakur) पर दांव लगाया है. जबकि उनका मुकाबला प्रतिभा सिंह (Pratibha Singh) से होगा, जो कि हिमाचल के दिवंगत नेता वीरभद्र सिंह की पत्‍नी हैं. देखा जाए तो ये लड़ाई राजपरिवार से संबंध रखने वाली प्रतिभा सिंह और कारगिल युद्ध के हीरो में से एक रहे ब्रिगेडियर के बीच है. यही वजह है कि यह चुनाव बेहद दिलचस्‍प होने वाला है. हालांकि प्रत्‍याशियों के ऐलान से पहले ही भाजपा और कांग्रेस अपनी अपनी जीत का दावा कर रहे हैं, लेकिन लगता है कि ये लड़ाई इस बार किसी के लिए आसान नहीं होगी.

    वहीं, मंडी लोकसभा उपचुनाव के लिए भाजपा के प्रत्‍याशी ब्रिगेडियर खुशाल सिंह ठाकुर ने धूमधाम से अपना नामांकन कर दिया है, जिसमें सीएम जयराम ठाकुर समेत कई दिग्‍गज शामिल रहे. वहीं, प्रतिभा सिंह के नामांकन में कांग्रेस ने पूरी ताकत लगा दी थी. बता दें कि यह सीट भाजपा के पूर्व सांसद रामस्वरूप शर्मा की मौत के बाद खाली हुई थी. वह इसी साल मार्च में अपने दिल्ली स्थित आवास में संदिग्ध अवस्था में मृत पाए गए थे. वहीं, 2014 से ही भाजपा का मंडी लोकसभा सीट पर काबिज रहा है. इस बार भी सीएम जयराम समेत दिग्‍गज नेता अपना पूरा दम लगा रहे हैं. जबकि कुछ केंद्रीय मंत्री भी ब्रिगेडियर की जीत के लिए मंडी में डेरा डाल सकते हैं. वहीं, भाजपा को सत्‍ता में होने का फायदा मिलना तय है.

    कारगिल के योद्धा से राजनीतिक के मैदान तक
    ब्रिगेडियर खुशाल सिंह ठाकुर मूलतः मंडी जिला के द्रंग विधानसभा क्षेत्र के तहत आने वाले नगवाईं गांव के रहने वाले हैं. वह एक सेवानिवृत फौजी हैं और ब्रिगेडियर के पद से सेवानिवृत हुए हैं. 67 वर्षीय खुशाल ठाकुर को कारगिल युद्ध का हीरो कहा जाता है और इन्हें युद्ध सेवा मेडल का सम्मान मिल चुका है. जबकि उन्‍होंने 18 ग्रेनेडियर का कारगिल युद्ध के दौरान नेतृत्व किया था और उसने तोलोलिंग की पहाड़ी पर कब्जा किया था. इसे ही कारगिल युद्ध की जीत का टर्निंग प्वाईंट माना गया. सबसे ज्यादा मेडल 18 ग्रेनेडियर को ही मिले थे. इसके अलावा विदेश में चलाए गए ऑपरेशन खुखरी का भी इन्होंने ही नेतृत्व किया था.

    बता दें कि रिटायर्ड होने के बाद खुशाल सिंह ठाकुर भाजपा में शामिल हेा गए. वहीं, 2014 के लोकसभा चुनावों में इनका नाम टिकट के दावेदारों में शामिल हुआ था, लेकिन टिकट मिला नहीं. उसके बाद ब्रिगेडियर खुशाल सिंह ठाकुर ने फोरलेन प्रभावितों की आवाज बनने का काम किया और फोरलेन प्रभावित संघर्ष समिति के वर्षों तक अध्यक्ष रहे. 2019 के लोकसभा चुनाव में भी उनका नाम भाजपा की तरफ से प्रमुखता से चला, लेकिन वह भाजपा ने कवरिंग कैंडिडेट ही बन सके. वैसे मौजूदा समय में ब्रिगेडियर खुशाल सिंह ठाकुर पूर्व सैनिक कल्याण निगम के चेयरमैन हैं.

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    ‘रानी साहिबा’ की डगर भी है मुश्किल
    कांग्रेस ने मंडी लोकसभा उपचुनाव के लिए प्रतिभा सिंह को अपना प्रत्याशी घोषित किया है. वह पांचवीं बार इस सीट से चुनावी मैदान में उतरेंगी. प्रतिभा सिंह राजपरिवार से संबंध रखती हैं और इसी वजह से उनके समर्थक उन्हें ‘रानी साहिबा’ कहकर संबोधित करते हैं, लेकिन ‘राजा’ की यह ‘रानी’ इस बार उनके बिना ही चुनावी मैदान में उतरने जा रही है. ऐसे में कांग्रेस और प्रतिभा सिंह के लिए ये लड़ाई बेहद कठिन हैं. जब वीरभद्र सिंह जीवित थे, तो यह परिवार पूरे ठाठ-बाठ के साथ चुनावी मैदान में उतरता था. वीरभद्र सिंह के समर्थक उनके परिवार के चुनाव में जी जान लगाकर काम करते थे और प्रत्याशियों को किसी प्रकार की कोई चिंता होती ही नहीं थी. सिर्फ कार्यक्रमों में जाना, लोगों का अभिवादन स्वीकार करना, लोगों की तरफ हाथ हिलाना, संबोधन देना और वीरभद्र सिंह के कामों का जिक्र करके आगे निकल जाना था. इस परिवार के लिए इतना ही काफी होता था, क्योंकि वोट पड़ते थे तो वीरभद्र सिंह के नाम पर, लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा. इस बार रानी साहिबा और उनके पुत्र विक्रमादित्य सिंह को खुद पसीना बहाना पड़ेगा और सारी व्यवस्थाएं भी खुद ही देखनी पड़ेंगी. हालांकि वीरभद्र सिंह की मौत की सहानुभूति कांग्रेस की ताकत बढ़ा सकती है.

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